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रविवार, 27 सितंबर 2009

हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम 'विजयादशमी'


त्योहारों के अपने महत्त्व, अपने इतिहास हैं, अपनी संस्कृति हैं मगर क्या हम वाकई में अच्छाई और बुराई की इन लीलाओं को पूरे मनोयोग से जानते-मनाते हैं! इनके महत्त्व को अपने आचरण में लाते हैं. इन्हीं सब अहम् सवालों-जवाबों पर पढ़िये विजयादशमी के मौके पर यह एक महत्वपूर्ण लेख व् रचना. [उल्टा तीर]

विजयादशमी हमारे आत्म-मंथन का दिन है. हम पराजित किस्म के लोग विजयादशमी मना कर खुश होने का स्वांग भरते रहते हैं. बहुत-कुछ सोचना-विचारना है हमको. कुछ लोग तो यह काम करते है. लेकिन ज्यादातर लोग क्या कर रहे हैं..? ये लोग उत्सव प्रेमी है. उत्सव मनाने में माहिर. खा-पीकर अघाये लोग... उत्सव के पीछे के भावः को समझाने की कोशिश ही नहीं करते.  कोइ भी त्यौहार हो, उसके बहाने छुट्टी का मज़ा लूटेंगे, लेकिन मन को निर्मल करने का कोइ जतन नहीं करेंगे. मन में नफ़रत, घृणा, दुराचार-अत्याचार सब कुछ व्याप्त रहेगा. रावण मारेंगे साहब. उसे ऊंचा भी करते जा रहे है, लेकिन राम बेचारा बौना होता जा रहा है. राम याने मर्यादा पुरषोत्तम. अच्छे लोग हाशिये पर डाल दिए गए है. गाय की पूजा  करेंगे औए गाय घर के सामने आ कर खड़ी हो जायेगी तो गरम पानी डाल कर या लात मार कर भगा देंगे. बुरे लोग नायक बनते जा रहे है. नई पीढी के नायक फ़िल्मी दुनिया के लोग है. राम-कृष्ण, महावीर, बुद्ध, गाँधी आदि  केवल  कैलेंदरो में ही नज़र आते है. यह समय उत्सव्जीवी समय है, इसीलिए तो शव होता जा रहा है. अत्याचार सह रहे है लेकिन प्रतिकार नहीं. प्रगति के नाम पर बेहयाई बढ़ी है. लोक तंत्र असफल हो रहा है. लोकतंत्र की आड़ में राजशाही फ़ैल रही है. देखे, समझें. और महान लोकतंत्र के लिए जनता को तैयार करें. विजयादशमी के अवसर पर एक बार फिर चिंतन करना होगा कि हम और क्या होंगे अभी..? एक लम्बा लेख भी मै लिख सकता हूँ, लेकिन इससे फायदा? लेखक-चिन्तक अपना खून जलाये, लेकिन आम लोग हम नहीं सुधरेंगे की फिल्म देखते रहे...? खैर...फ़िलहाल दशहरे के खास मौके पर प्रस्तुत है एक विचार-गीत. देखे, मेरे मन की पीडा क्या आप के मन की भी पीडा बन सकी है?




बहुत हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम,
मेरे देश की उत्सव-प्रेमी जनता तुझे प्रणाम.
नाचो-गाओ, मौज मनाओ, कहाँ जा रहा देश,
मत सोचो, कहे की चिंता, व्यर्थ न पालो क्लेश.
हर बस्ती में है इक रावण, उसी का है अब नाम....
नैतिकता-सीता बेचारी, करती चीख-पुकार,
देखो मेरे वस्त्र हर लिये, अबला हूँ लाचार.
पश्चिम का रावण हँसता है, अब तो सुबहो-शाम...
राम-राज इक सपना है पर देख रहे है आज,
नेता, अफसर, पुलिस सभी का, फैला गुंडा-राज.
डान-माफिया रावण-सुत बन करते काम तमाम...
मंहगाई की सुरसा प्रतिदिन, निगल रही सुख-चैन,
लूट रहे है व्यापारी सब, रोते निर्धन नैन.
दो पाटन के बीच पिस रहा. अब गरीब हे राम...
बहुत बढा है कद रावण का, हो ऊंचा अब राम,
तभी देश के कष्ट मिटेंगे, पाएंगे सुख-धाम.
अपने मन का रावण मारें, यही आज पैगाम...
कहीं पे नक्सल-आतंकी है, कही पे वर्दी-खोर,
हिंसा की चक्की में पिसता, लोकतंत्र कमजोर.
बेबस जनता करती है अब केवल त्राहीमाम..
बहुत हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम,
मेरे देश की उत्सव-प्रेमी जनता तुझे प्रणाम.  
-
[गिरीश पंकज]
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
  

*-*-*

आप सभी को दुर्गा नवमी और दशहरा की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.
[उल्टा तीर] पर १ अक्टूबर ०९ से भाग लीजिए एक नई सामाजिक ज्वलंत बहस में...  दीजिए अपनी राय! आप भी हो सकते हैं उल्टा तीर के लेखक/लेखिका! बस हमें जल्दी से जल्दी मेल करें या फोन करे.

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

वतन के एक आशिक़ का ख़त "एक चिट्ठी देश के नाम"


मेरे अज़ीज़ वतन, 
मेरी जान-ए-जानां वतन तूने इस बार भी हर बार की ही तरह अपनी आज़ादी का जश्न जोश-ओ-खरोश से मनाया. तुझे ये भी खूब-तर याद है कि तेरे साथ तेरे अत्फालो ने भी इस रोज कितनी खुशिया मनाई, कितना जश्न किया, और हां याद आया इस बार तेरे एक तिफ्ल जो तेरे किरदार को बखूबी निभा रहे हैं "डॉ.मनमोहन सिंह" ने हर बार की तरह तेरी जमीन के एक अदना से तुकडे पर बनी ईमारत जिसे हम "लाल किला" कहते है, उस पर तेरा अलामत "तिरंगा" लहराया, आफताब की तेज चकाचोंद के दरमिया तिरंगा हर बार की तरह ही हसीन और महजबीं लग रहा था.


दिलबर वतन तेरा हाल पूछने की हिमाकत हम नहीं करेंगे क्योंकि हमें भी इल्म है कि तेरी हालत क्या है तू कैसा है फिलहाल के दिनों में, मगर हमें ये बताते हुए काफी सुकून मिल रहा है कि अब हम फिरंगियों के चाकर नहीं रहे है. हम अपने देसी हुकाम्मारानो के चाकर बन गए है. हां ये है वो भी उन गोरो से कुछ कम नहीं अगर हम ये कहे कि तेरी हुकूमत चलाने वाले नेता फिरंगियों से चार कदम बढे लगते है तो इस में कोई हेरानी नहीं होनी चाहिए, पर हर बार की ही तरह कुछ बुरे तो कुछ काबिल नेता इस बार भी तेरे चिराग को तमाम जहाँ में जलाये हुए है.

वतन याद है तुझे वो 14 अगस्त वाली शब्, जब तेरा तिफ्ल "नेहरू" तेरी बाग़-डोर सँभालने के लिए बेकरार थे, सच मानो वतन उस रोज भगत, राज गुरु, सुख देव, लाला लाजपत, चन्द्र शेखर, भाभी दुर्गा, रानी लक्ष्मी बाई, मंगल, सुभास चन्द्र बोस, और तमाम वतन परस्तो की आत्माओं ने फूलो की बरसात की थी, सहर की पहली किरण के साथ ही जब ऐलान हुआ कि तू आजाद हो गया है, तब करमचंद गांधी, वलभ भाई पटेल, साथ में नहरू, जाकीर हुसेन, और हां जिन्ना ने तमाम वतन को मानो घर जा जा कर ये खुशखबरी दी थी, देख वो कितना हसीन दिन था, हां पर 14 अगस्त की सहर की दास्ताँ हमें भुलाए नहीं भूलती जब चंद हुकाम्मारानो ने तेरे दो हिस्से कर दिए थे, वो भी तेरे ही अत्फाल थे जो तुझसे दूर हो गए.

आज भी वही शब् है वही सहर है और साथ में एक लम्बा दौर, एक लम्बा अरसा जिसको बीते हुए आज कु-बा-कु 62 साल का एक लम्बा वक़्त जाते जाते चला गया है, तुझे दिल का हाल बताऊ तो जो दिक्कते तब पेश-ए-खिदमत थी आज वो दिक्कते तो नहीं है मगर और भी बहुत सी मुश्किलें हमारे दरमियाँ आगई है, हां ये भी पुराने वाली दिक्कते अभी यु की यु बरकरार है मगर कुछ जरा सी रियायत भी मिली है इस में कोई दो राय नहीं, और तुझे बताऊ हम भी अब तरक्की की ओर निकल लिए है राह को पकडे पकडे.

बीते 62 सालो में जहाँ हमने बहुत सी कामयाबियाँ पाई, वही हम अपनी अज़ीज़ दिलकशी मान मर्यादा भूल गए है, तुझे बताते हुए तो शर्म के मारे गर्दन जमीं में धसी जाती है कि फिलहाल के ज़माने में इंसानों को valentine Day तो याद रहता है मगर तेरे अलामत तिरंगे में कितने रंग कौन सा कहाँ कहाँ है तक याद नहीं रहता है, कहते हुए एतराज तो है मगर कहना लाजमी है जहाँ आज के बशर पहली जनवरी को त्यौहार सा मानते है वहां तेरी सालगिरा किसी किसी को याद रहती है, सुना है आज कल इंसान ज्यादा मसरूफ रहने लगे है सो तेरे लिए मेरे लिए अब इन के पास वक़्त नहीं ना बचा है. इस गम जदा बात पर ख़याल यूं जोर मारते है और कहते है :-


वो वक़्त खो गया जब इंसानियत का दौर था
हां हमने माना हुजुर वो हेवानियत का दौर था


हां हमें ये बताते हुए भी कोई हर्ज नहीं कि नए ज़माने में जहाँ हम नए नए मुद्दे उठा रहे है, वहां हमारे पास वलीद और अम्मा को देने के लिए चंद पल फुर्सत के निकाले नहीं निकलते. इस ही लिहाज से ख़याल किया जा सकता है कि फिर हम कहाँ तेरे लिए सोचने की भी जहमत उठाते होंगे, कहते हुए शर्म आती है मगर ये सवाल चीख चीख कर कह रहा है कि ये कैसी मसरूफियत है जो हमें सब से दूर किये जा रही है और हमारे पास कोई जादू की कलम नहीं जो हम लिखे और वो हो जाए, हमारे पास है तो बस एक इन्तजार जिसको करो और बस करते जाओ की कभी तो हर बशर को अपना राहबर मिलेगा और उन्हें अपना अहम् मकसद तलाश करने में मदद करेगा :-


मेरे अज़ीज़ हिंदोस्ता को बचा ले अब कोई
उन शहीदों सी आग सीने में लगा ले अब कोई 

वतन, अब और तब में शब् और सहर सा अंतर आगया है, जहाँ इंसान आज़ादी का दिन बड़े धूम धाम से मनाया करते थे आज वही नए ज़माने के इन्सान इस रोज आराम करने और छूटी का मजा उठाने की सोचते है, तब जहाँ हर घर से एक देश भक्त, एक भगत, एक अशफुल्ला, निकला करता था मौत को गले लगाने हस्ते हस्ते, आज उन्ही घरो के दर-ओ-दरवाजे 14 अगस्त की सहर ढलते ही बंद हो जाया करते है, जो खुलते है तो बस बाजार से कुछ साज-ओ-सामान लाने के लिए, अब मरने मिटने की बात पर लोग हँसी उडाया करते है, साथ ही साथ पागल दीवाना होने का तमगा भी माथे पर लगा दिया करते है.

मेरे अहबाब, मेरे अज़ीज़, मेरे वतन ये सब बताने की हिम्मत तो में जुटा ना पता गर् तेरी माटी में पैदा ना हुआ होता तो, मेरे दोस्त, मेरे हमदम, मुझे इतना मान, इतना इश्क, इतना प्यार देने के लिए हम बड़े शुकरगुजार है तेरे, मेरे दिलबर, मेरे प्यारे वतन देख हम मानते है सच कड़वा होता है मगर होता सच ही है, देख मेरी इस नादानी से नाराज ना हो जाना कही, बस हमने जरा सा पर्दा खोला है उस रोज की आज़ादी का और इस रोज की आज़ादी का और इस में उस में क्या क्या अंतर आये है, ये माना अच्छे से ज्यादा कुछ बुरा सा ही हुआ है मगर हमने आजाद होकर बहुत सी तरक्किया पाई है उन सब का तुझे बखूबी इल्म है कि हम किन दस्तावेजो से तुझे मुखातिब करा रहे है.

यूं तो शब् का पिछला पहर चल रहा है मगर तेरे इस ख़त को मुक्कम्मल करने के लिए हमने भी जिगर में लो सी बाली हुई है जो इस सर्द रात में भी हमें इस ख़त को मुक्कम्मल करने की हिम्मत दे रही है. फिर से तुझे याद दिलाना चाहता हूँ कि हम तेरे बहुत शुक्रगुजार है कि तूने हमें अपनी माटी नसीब होने दी वरना हम तो इंसान होने के भी लायक नहीं थे, बस खुदा-ए-परवर, भगवान्, वाहे गुरु, से ये ही दुआ है की तू " हिन्दुतान" मेरे प्यारे, अज़ीज़, दिलबर, जान-ए-जानां वतन हमेशा खुशियों से लाबा लब रहे, तेरे दरख्तों पर शब्-ओ-सहर नए बर्ग-ओ-बार आये, तू गुलाब की तरह महकता रहे, तेरा नाम तमाम जहान में बड़े ही अदब से हमेशा लिया जाए, तू हम सब के दिलो पर रहता है, रहता था, और रहमत-ए-खुदा हमेशा रहेगा भी, ए वतन तेरे जवाब का इन्तजार बड़ी बेसब्री से रहेगा...


अब तेरे जवाब का बेसब्री से इन्तजार रहेगा
जियें या मर जाए फिर भी तुझसे प्यार रहेगा



जल्द ही इस ख़त का जवाब लिख भेजना मेरे अज़ीज़, मेरे प्यारे वतन, तेरे ख़त के इन्तजार में, तेरा अत्फाल, तेरा आशिक...

[दीपक पंवार "बेदिल"]
लेखक का ब्लॉग:  एज़ाज-ए-बेदिल
 

*-*-*
उल्टा तीर पर "एक चिट्ठी देश के नाम" कड़ी में दीपक पंवार 'बेदिल' की यह आखिरी चिट्ठी पढिये और अपनी अमूल्य राय दीजिए! इस चिट्ठी का हर सवाल आपसे जवाब मानंगे की एक अपील है! आशा है हम हमारे देश को  उत्तरित करेंगे! [उल्टा तीर]

सोमवार, 21 सितंबर 2009

आज ईद है...[उल्टा तीर]

आज ईद है. मुबारक हो सबको. हर धर्म हमें प्यारा हो हम ईद भी मनाये, दीवाली भी बड़ा दिन भी सब त्यौहार हमारे है मैंने कभी रमजान पर लिखा था, दो शेर ही याद रहे है. देखे- रोजा इक फ़र्ज़ मुसलमान के लिए/ तकलीफ जो सहते है रमजान के लिए/ बाद मरने के ही ज़न्नत मिलेगी/ थोडी तो हिद्दत सहो दय्यान के लिए.. दय्यान यानि स्वर्ग का वह आठवा दरवाज़ा जो रोजेदारों के लिए खुलता है बहरहाल, ईद पर बिल्कुल ताज़ा रचना पेश है, इस विश्वास के साथ की हम सकल्प ले की जाती-धर्म की दीवारे तोडेंगे मिलजुल कर रहेंगे ऐसा समाज बनाना है, जहा लोग कहे-सुबह मोहब्बत, शाम मोहब्बत /अपना तो है काम मोहब्बत / हम तो करते है दोनों से / अल्ला हो या राम मोहब्बत / देखिये मेरे शेर ईद मुबारक....मीठा खाए, मीठा बोलें...जीवन में हम मिसरी घोलें। 


~!~आज ईद है~!~


 आओ, सबको गले लगाओ आज ईद है
सेवई खाओ और खिलाओ आज ईद है
बैर कोई दिल में पालो मेरे भाई
दुश्मन को भी पास बुलाओ आज ईद है
कोई इक त्यौहार किसी का नही रहे अब
सारे बढ़ कर इसे मनाओ आज ईद है
रोजे रख कर हुई इबादत देखो भाई
सुबह-शाम केवल मुस्काओ
आज ईद है
ईद, दीवाली, होली सब त्यौहार हमारे
पागल दुनिया को समझाओ
आज ईद  
*-*-*
उल्टा तीर की ओर से आप सभी को ईद की बहुत-बहुत मुबारकबाद. 

"एक चिट्ठी देश के नाम" की अगली और इस बार की आखरी चिट्ठी कल प्रकाशित होगी" पढिये और अपनी राय भी दीजिए. [उल्टा तीर]

शनिवार, 19 सितंबर 2009

बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग "एक चिट्ठी देश के नाम"

 



[प्रेम परिहार] दिल्ली दूरदर्शन.
सदियों से हमारी फिजा में संवाद की प्रक्रिया विद्धमान है. एक चिट्ठी देश के नाम लिखना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है, फिर भी अपनों से संवाद बनाना मनुष्य की आदत का एक अंग है. चिट्ठियों के इतिहास काफी पुराना है. ख़त-ओ-खिताबत की इस अदा ने सारी वसुधा को अपने अंक में समेटकर रखा है. चिट्ठी देश के नाम लिखने का विनम्र प्रयास कर रहा हूँ. पाठकों के साथ मेरा तीन दशक का निजी सम्बन्ध है और आजीवन उनकी मुहब्बत ही मेरा संबल है. मेरे तुम्हारे निजी ताल्लुकात में, पूरे देश को समेटना ही टेडी खीर है फिर भी विनम्र प्रयास आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.

१५ अगस्त १९४७ में हमारे देश को आजादी की सौगात मिली. जिसकी वर्ष्गांठ ६२ वर्षों से पूरे मनोयोग से मनाते आ रहे हैं.


आज़ादी की वर्षगाँठ है लेकिन कुछ भी पास नहीं है
मावस बीत गई है कब की, पूनम का विश्वाश नहीं है
अमिट छाप छोडी है हमने, युग-युग की प्रतिछाया में
राजनीति ने हमें घुसेड़ा, अजब-गजब इस माया में.


समय के खाइयों को पार करते हुए हम २१ वीं सदी के ९ वर्ष पार कर चुके हैं. स्वतन्त्रता दिवस का समारोह हममें देशप्रेम की भावना भरता है. शहीदों को याद करने का यह एक अविस्मरनीय दिवस है. देश के नागरिकों के साथ हम हपनी बात बाँट लेने में कोई हर्ज महसूस नहीं करते. जीवन के झंझावातों से उलझती हमारे देश की जनता दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है. हम अपने मन की बात किससे कहें कोई सुनने को ही तैयार नहीं है. और हमारे देश की गुणवत्ता के चर्चे समाचार पत्रों एवं दूरदर्शन एवं निजी चैनलों पर बखूबी प्रस्तुत किए जाते हैं.



मुख्य-मुख्य बिन्दुओं पर ध्यान आकर्षित करना जरूरी समझता हूँ.

युवाओं की भारत में स्तिथि- युवा हमारे देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है. युवाओं में शिक्षा का स्तर अमीरों, राजनेताओं और उद्ध्योग्पतियों के लिए ही ठीक है. आम आदमी एक लिए बच्चों की शिक्षा और पूरे परिवार एक लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं. बेरोजगारी से हमारे देश का अधिकतम युवा झूझ रहा है. शहरी युवा और ग्रामीण युवा दोनों की समस्याएँ अलग-अलग प्रकार की हैं. शिक्षा के स्तर पर समाज का बड़ा हिस्सा आज भी दूर है. प्रजातंत्र के बड़े मंदिर में हम अपने भविष्य को क्या परोस रहे हैं? युवक और युवती अनेकों समस्याओं से जूझ रहे हैं. छ दशकों से हम अपनी महिलाओं के लिए अप्नेकों योजनाओं का प्रचालन कर चुके हैं परन्तु फिर भी ये सुविधाएं ऊँट के मुंह में जीरा कहावत को चरितार्थ करती हैं. भारत सरकार, प्रदेश सरकार एवं स्थानीय प्रशासन आंकडों का जिक्र करते हैं और हकीकत में सारी योजनाओं का वजूद ही नहीं है. अखबारों एवं चैनलों में दिखने वाली घटनाएं, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों से बहुत कम होते हैं. 

बुजुर्गों की स्तिथि- शरीर पर स्वच्छ कपडे तो अब सभी के शरीर पर दिखाई देते हैं पर मानसिक स्तर पर हमारी दशा, दिशा और सम्भावना सोचनीय है. अपने ही बच्चों द्वारा अपन्मानित होना, सभी के लिए सोचने का विषय  है. वरिष्ठ नागरिकों के नाम भी अनेकों योजनायें bantee हैं परन्तु सभी का लाभ उन तक नहीं पहुँच पता. शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर बुजुर्ग होना मुश्किलों से दो-दो हाथ करने के लिए ही है.


बच्चों की दयनीयता- कल के देश के नागरिक ही आज के बच्चे हैं. इस देश में लाखो बचे तो पैदा होने से पूर्व ही गर्भ में ही गर्त में गिरा दिए जाते हैं. बच्चे ठीक से पैदा हो पाए इसके लिए आधी आबादी (महिलायें) का अधिकतम हिस्सा भूख से ही जूझता है और बच्चों को ठीक से जन्म लेने से पूर्व ही मौत के साये में चले जाते हैं. बचपन की गवाही महानगरों एवं बड़े शहरों में छोटे-छोटे बच्चे मांगकर, गाकर, करतब दिखाकर भीख मांग रहे हैं. लाखों बच्चे देश की आजादी के ६२ वर्ष बाद भी पढाई जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से परे रहते हैं.


पुण्यभूमि भारत देश आज अपने ही राजनेताओं, उद्ध्योपतियों एवं अपराधियों के चंगुल में फंस गया है. आमजन के जीवन से खुशियाँ आज भी हजारों कोस दूर खादी हैं. अपने से अपनी बात करना हमरा स्वाभाव है. मन की गुत्थियां खोलने पर हमें कोई समाधान मिल सकता है. "उल्टा तीर" के माध्यम से अपने मन के भावों को आप सबसे बांटकर हल्का महसूस कर रहा हूँ. आपके मन में भी हजारों भाव आते-जाते रहते होंगे, जहां समस्या है मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वाश है कि वहाँ समाधान भी होते ही हैं. समग्र चिंतन से ही युग सम्रद्धि अभियान को दशा, दिशा एवं सम्भावना प्रदान की जा सकती है.

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लेखक के बारे में- लेखक अपनी साहित्यिक सक्रियता के लिए चिर परिचित हैं। दिल्ली दूरदर्शन में कार्यरत व कई सामाजिक संगठनों के संचालक हैं.
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प्रिय पाठको, लेखकों आपके अपने मंच उल्टा तीर पर चिट्ठियों के प्रकाशन के अंतिम पढ़ाव की यह पहली चिट्ठी पढिये और अपनी राय दीजिए. अगर आप उल्टा तीर के लेखक/लेखिका बनाना चाहते/चाहती हैं तो जल्द से जल्द हमें मेल करें. 

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

मेरे प्रिय भारत देश "एक चिट्ठी देश के नाम"

मेरे प्रिय भारत देश,
सादर नमन
क्या कहें और कैसे कहें क्योंकि आज तक हम तुमसे कुछ न कुछ लेते ही रहे। तुम्हें देने की जब भी बात आई हम स्वयं को कतार में सबसे पीछे खड़ा पाते रहे। यह तो तुम्हारी उदारता और महानता है कि इसके बाद भी तुम हमें अपने प्यार से सराबोर करते रहे।

अभी हमने आजादी का जश्न मनाया। जश्न तो मनाया पर समझ नहीं सके कि जश्न किसकी आजादी का था; तुम्हारी आजादी का या अपने आजाद होने का? सन् 1947 में तुम्हारे कुछ सपूतों की शहादत काम आई; उन वीरों की कुर्बानियाँ काम आईं जो वर्षों वर्षों से तुम्हारी सेवा में लीन रहे। अंग्रेजों के हाथों से छूटे तो भारतीय लाटसाहबों के शिकंजे में फँस गये। आजाद तो हुए मगर लहुलुहान हो गये। कुछ स्वार्थ, कुछ लोभ, कुछ अहं और बस हम तैयार हो गये तुम्हें बाँट देने को; काट कर बाँट देने को। तुम्हारा बहता लहु किसी ने न देखा, बस बहते लहू को हिन्दू का लहू, मुस्लिम का लहू समझा। तुम्हारे घाव को किसी ने न देखा, किसी को भारत का घाव लगा किसी को पाकिस्तान का।

आज इतने वर्ष बीत गये आजादी के हमने स्वयं को स्वतन्त्र तो समझा पर तुम्हें स्वतन्त्र समझने का, स्वतन्त्र करने का प्रयास नहीं किया। किसी न किसी रूप में आजादी के बाद हम तुम्हारी प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाते रहे; कभी दंगों के रूप में, कभी आतंकवाद के रूप में। तुम्हारे ऊपर कभी हम हमला करते रहे, कभी हमें कमजोर देखकर बाहर वाले हमला करते रहे। हर हमले के बाद हम कहते रहे कि हम पहले से अधिक ताकतवर होकर उभरे हैं; हमें कोई ताकत झुका नहीं सकती; हम हर नापाक ताकत को मुँहतोड़ जवाब देंगे, इसी तरह की बयानवाजी करते रहे।

हम अधिक ताकतवर होकर तो उभरे मगर हथियारों की मदद से। हमने स्वयं को शक्तिसम्पन्न किया पर नाजायज तरीकों से। तुम्हारी गोद में पढ़े लिखे और अपनी मेधा को, अपने ज्ञान को, अपनी शिक्षा को दूसरे देशों में लगाते रहे। तुम्हारे खजाने को लूट-लूट कर विदेशों में पहुँचाते रहे। शायद हम उस पानी को सुखा चुके हैं जो 15 अगस्त 1947 को तिरंगा फहराते समय हमारी आँखों से बहा था? अपनी उस शपथ को भुला बैठे हैं जो तुम्हें शान से इठलाते देखकर, शान से लहराते तिरंगे को देखकर ली थी?

ऐसा नहीं है कि तुम्हारे सभी बेटे-बेटियों ने तुम्हें दुखी किया हो। तुम्हारे कुछ सपूत तुम्हारे लिए सर्वस्य न्यौछावर करने को तत्पर रहे। तुम्हारी शान को विश्व में सर्वत्र रोशन किया। धरती के साथ साथ आकश की ऊँचाइयों को नापा तो सागर की गहराई तक को कदमों तले रौंदा। खेलों में तुम्हारे तिरंगे को विदेशों तक में लहराने दिया तो विज्ञान के बूते पर संसार को नतमस्तक कराया। अंतरिक्ष रहा हो या परिवहन; खेल रहा हो शिक्षा; विज्ञान रहा हो या तकनीक; चिकित्सा हो या फिर व्यापार; राजनीति हो या फिर समाजसेवा सभी में तुम्हारे लिए कुछ भी कर गुजरने वालों की कमी नहीं रही। तुम्हारे धवल वस्त्र को और भी रजतमय बनाने का प्रयास होता रहा। तुम्हारे सर्वोच्च पदों पर पहुँचने के लिए तुम्हारा आशीष हमेशा लिया। इन्हीं लोगों की सहायता से तुमने हमें क्या-क्या न दिया।

तुमने हमें क्या क्या न दिया पर हम शायद तुम्हारे इस कर्मठ सपूतों का न पहचान सके और न ही तुम्हारे दिए को पहचान सके; सँभाल सके। यत्र तत्र बिखरी रियासतों को एक कर गणतांत्रिक स्वरूप हमें तुमसे ही मिला। समता, बंधुत्व, समाजवाद से ओतप्रोत संविधान हमें तुमसे ही मिला है। आर्थिक तरक्की के रास्ते खोलते कारखाने, बड़े-बड़े बाँध हमें तुम्हीं ने दिये। सम्पूर्ण विश्व को अपनी बुद्धि से नतमस्तक करा देने वाले शिक्षण संस्थान तुम्हीं ने दिये। धरती से अंतरिक्ष तक की यात्रा को आसान बनाने की कला तुम्हीं ने सिखाई। विश्व को ज्ञान और देह का अद्भुत साम्य तुम्हीं ने सिखाया। संस्कृति की विविधता के मध्य भी एकता का अनुपालन करना तुम्हीं ने सिखाया। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमें अपने से बाँधे रखा। कल-कल करती नदियाँ, धवल, रजत पर्वत, फलों से लदे बाग-बगीचे, खाद्यान्नों के हरे-भरे खेत हमें तुमने ही दिये।

हाय इसके बाद भी हम पता नहीं किस स्वार्थ में लिप्त रहे? तुम्हें ही मिटाने में लगे रहे, घाव पर घाव देने में लगे रहे। साम्प्रदायिक हम होते हैं पर भूल जाते हैं कि कष्ट तुम्हें होगा। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में सब भाई-भाई कहकर तुम्हें बहलाते हैं पर मौका पड़ने पर इन्हें कत्ल करने से भी नहीं चूकते हैं। भारतीयता हमारा धर्म होना चाहिए किन्तु हम मूर्तियों, इमारतों को अपना धर्म बताते हैं। जात-पात, क्षेत्र में बाँटकर हम स्वयं को महान साबित करते हैं।

ओ मेरे देश, तुम्हें क्या क्या बतायें, सब तो तुम्हें मालूम है। तुम्हारी आँखें बन्द नहीं हैं और न ही तुम उन्हें बन्द किये हो बस हम ही उनसे बहते आँसू, रिसता लहू नहीं देख पा रहे हैं। दुःख हमने तुम्हें बहुत दिये हैं पर तुमने तो हमें सुख ही सुख दिये हैं। हमें माफ कर दो कि हम तुम्हारे सच्चे सपूत न बन सके। क्षमा कर दो हमें कि हम तुमसे सुखों की चाह रखते रहे और तुम्हें कोई सुख न दे सके। क्षमा कर दो उन्हें भी जो तुम्हारे विकास के लिए, तुम्हें सुख देने के लिए चुन-चुन कर प्रदेश-प्रदेश में और केन्द्र में आते रहे। वे भी तुम्हारा नहीं अपना ही विकास करते रहे। उनके साथ साथ हमें भी माफ कर दो क्योंकि उन्हें हम ही वहाँ पहुँचाते रहे। माफ कर दो उन्हें भी जो नैतिकता, संस्कार, सिद्धांतों के स्थान पर तुम्हारे विकास के लिए अस्त्र-शस्त्र, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, जात-पात को प्रमुख मानते रहे।

हम समझ सकते हैं कि तुम्हें चोट बहुत अधिक पहुँची होगी। हम मानते हैं कि तुम्हें मर्माहत करने में हम पीछे नहीं रहे। हम यह स्वीकार करते हैं कि तुम्हारे बहते हुए लहू के लिए हम ही जिम्मेवार हैं पर तुम्हारे बेटे-बेटी होने के कारण हम तुमसे ही क्षमा की उम्मीद कर सकते हैं। तुम्हें यह पत्र इसी कारण से लिख रहे हैं कि हम कहीं न कहीं अपनी गलती स्वीकार कर प्रायश्चित करना चाहते हैं। तुम्हारे सच्चे सपूतों का अनुसरण कर तुम्हारे लिए कुछ करना चाहते हैं।

मेरे देश क्या तुम हमें हमारी गलतियों के लिए माफ कर सकोगे? यही एक सवाल है जो मन को व्यथित कर रहा है और इस पत्र का कारक है। आशा है कि तुम हमेशा की तरह हमें क्षमा कर अपनी पावन गोद में शरण दोगे, अपने प्यार भरे आँचल की शीतल छाँव दोगे, अपनी विराट विरासत का हमें भी अंग बनने का एक और अवसर प्रदान करोगे।
तुम्हारा बेटा
[डा. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर]
*-*-*
बिना भूमिका की यह चिट्ठी खुद में  एक मुक़म्मल सा दस्तावेज है जिसके बारे में मैं इशारों से कोई बात नहीं करना चाहता था...अब आपने इस "एक चिट्ठी देश के नाम" को पढ़ लिया है तो लिख दीजिए बेझिझक अपनी बात!
एक जलते हुए मग़र हवाओं और तूफानों से बुझते हुए दीप को कई जलाए रखने के लिए एक हाथ से बढ़कर कई हाथ मिल जाएँ तो यकीनन रौशनी थमी रहेगी और दीप जलता रहेगा, आंधी-तूफानों को लौट जाना होगा! थम जाना होगा! [उल्टा तीर]
*-*-*  
 लेखक का परिचय-
१९७३ में उत्तर प्रदेश के नगर उरई में जन्मे डा. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने लेखन की शुरुआत १९८२-८३ में एक कविता (प्रकाशित) होने के साथ की और अभी तक लेखन कार्य में सक्रिय हैं. सेंगर जी के हिन्दी भाषा के प्रति विशेष लगाव ने विज्ञान स्नातक होने के बाद भी हिन्दी साहित्य से परास्नातक और हिन्दी साहित्य में ही पी-एच0डी0 डिग्री प्राप्त की। लेखन के साथ-साथ पत्रिकारिता में भी हस्तक्षेप रखने वाले कुमारेन्द्र सिंह सेंगर की रचनाओं का प्रकाशन देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में होता रहता है. रचनाओं में विशेष रूप से कविता, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा, आलेख प्रिय हैं। अभी तक एक कविता संग्रह (हर शब्द कुछ कहता है), एक कहानी संग्रह (अधूरे सफर का सच), शोध संग्रह (वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में सौन्दर्य बोध) सहित कुल दस पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है।

युवा आलोचक, सम्पादक श्री, हिन्दी सेवी, युवा कहानीकार का सम्मान प्राप्त डा0 सेंगर सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’, शोध संस्था ‘समाज अध्ययन केन्द्र’ तथा ‘पी-एच0 डी0 होल्डर्स एसोसिएशन’ के साथ-साथ जन-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान का संचालन व सम्प्रति एक साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ का सम्पादन कार्य कर रहे हैं। एक शोध-पत्रिका का भी सम्पादन किया जा रहा है।  सेंगर जी ने इंटरनेट पर लेखन की शुरुआत ब्लाग के माध्यम से की। अपने ब्लाग के अतिरिक्त कई अन्य ब्लाग की सदस्यता लेकर वहाँ भी लेखन करते हुए शीघ्र ही एक इंटरनेट पत्रिका का संचालन करने की योजना भी बना रहे हैं. 
लेखक का ब्लॉग: कुमारेन्द्र 

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

"स्वतंत्रता के छ: दशक- क्या खोया क्या पाया?" एक चिट्ठी देश के नाम

वर्ष से जादा की स्वतन्त्रता में हमने क्या खोया क्या पाया, इस तरह के तमाम सवाल हैं जो हिन्दुस्तानियों के ज़ेहन में अक्सर द्वंद करते होंगेइन सबका एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्यों हम इतने वर्षों में भी आज तक इन तमाम सवालों को उत्तरित नहीं कर सके! तरक्की के तमाम आयामों को पार करने के बाद भी आज हम बहुत से मामलों में इतने पराधीन हैं कि मुंह ताकने तक की स्तिथि जाती है! क्यों? इसी तरह के तमाम सवालों से अटी यह "एक चिट्ठी देश के नाम" दिल्ली से देश और समाज के जागरूक युवा [राजीव तनेजा'] ने [उल्टा तीर] को भेजी हैहम-आप सभी मिलकर इस चिट्ठी के कई अहम् सवालों के जवाब तलाशेंगे और अमल करेंगे, ऐसा विश्वास राजीव तनेजा जी का ही नहीं हम सबका होना चाहिए! प्रस्तुतु है "एक चिट्ठी देश के नाम" -

कहने
को तो आज साठ साल से ज़्यादा हो चुके हैं हमें पराधीनता की बेड़ियाँ तोड़ आज़ाद हुए, लेकिन क्या आज भी हम सही मायने में आज़ाद हैं? मेरे ख्याल से नहीं। बेशक!...हमने छोटे से लेकर बड़े तक...हर क्षेत्र में खूब तरक्की की है लेकिन क्यों आज भी हम इटैलियन पिज़्ज़ा खाने को तथा सिंगापुर, मलेशिया, बैंकाक तथा दुबई और मॉरिशस में छुट्टियाँ मनाने को उतावले रहते हैं?

* संचार क्रांति की बदौलत हमारे देश में मोबाईल धारकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है लेकिन मोबाईल सैट अभी भी क्यों बाहरले देशों से ही बन कर आते हैं?

* आज सैंकड़ों देसी चैनल हमारे मनोरंजन के लिए उपलब्ध हैं लेकिन उनकी ब्राडकास्टिंग दूसरे देशों द्वारा उपलब्ध कराए गए उपग्रहों द्वारा ही क्यों होती है?

* ये सच है कि हमारे कल-कारखानों में एक से एक उम्दा से उम्दा आईटम तैयार होती है लेकिन फिर भी हम खिलौनों से लेकर कपड़े तक और प्लाईबोर्ड से लेकर रैडीमेड दरवाज़ों तक हर सामान को चीन से आयात कर गर्व तथा खुशी क्यों महसूस करते हैँ?

* क्यों आज हम में से बहुत से लोग हिन्दी जानने के बावजूद अँग्रेज़ी में बात करना पसन्द करते हैँ?

* हिन्दी के राष्ट्रीय भाषा होने के बावजूद क्यों हम अँग्रेज़ी के गुलाम बने बैठे हैँ?

* आज हमारे देश का आम आदमी अपने देश के लिए काम करने के बजाय क्यों बाहरले देशों में बस अपना भविष्य उज्जवल करना चाहता है?

* आज दुनिया भर के होनहार लोगों के होते हुए भी हमें आधुनिक तकनीक के लिए बाहरले देशों का मुँह ताकना पड़ता है तो क्यों?

* आज हमसे हमारी ही संसद में सवाल पूछने के नाम पे पैसा मांगा जाता है तो क्यों?

* क्यों खनिज पदार्थों के अंबार पे बैठे होने के बावजूद हमें बिजली उत्पादन के लिए यूरेनियम से लेकर तकनीक तक के लिए अमेरिका सहित तमाम देशों का पिच्छलग्गू बनना पड़ता है?

* आज अपनी मर्ज़ी से हम अपना नेता अपनी सरकार चुन सकते हैँ लेकिन फिर भी किसी वोटर को चन्द रुपयों और दारू के बदले बिकते देखना पड़ता है तो क्यों?
लेखक का ब्लॉग: हँसते रहो
*-*-*

आइये हम सब मिलकर सवालों की जंजीरों से जकड़े हिन्दुस्तान को मुक्त करें!
अपनी राय जरूर लिखें, हो सकता है आपकी राय ही किसी बड़े सवाल का हल हो!
[उल्टा तीर]

सोमवार, 14 सितंबर 2009

एक बूढी औरत 'हिन्दी दिवस'

"एक चिट्ठी देश के नाम" प्रकाशित न करके उल्टा तीर पर आज मात्र भाषा हिंदी दिवस के मौके पर जाने-माने पत्रकार व लेखक [गिरीश पंकज ]जी की एक व्यंग कविता प्रस्तुत है. हिंदी की यथार्थवादी दशा और दिशा पर लिखी यह कविता की भूमिका लिखना मुझे कविता को सीमित करने जैसा लग रहा है, बस आप पढिये और अपनी राय भी दीजिए-


वह
एक बूढी औरत

*-*-*
एक बूढी औरत....
राजघाट पर बैठे-बैठे रो रही थी
जाने किसका पाप था जो
अपने आंसुओं से धो रही थी।
मैंने पूछा- माँ , तुम कौन?
मेरी बात सुन कर
वह बहुत देर तक रही मौन
लेकिन जैसे ही उसने अपना मुह खोला
लगा दिल्ली का सिंहासन डोला
वह बोली-अरे, तुम जैसी नालायको के कारण शर्मिंदा हूँ,
जाने अब तक क्यो जिंदा हूँ।
अपने लोगो की उपेक्षा के कारण
तार-तार हूँ, चिंदी हूँ,
मुझे गौर से देख...
मै राष्ट्रभाषा हिन्दी हूँ
जिसे होना था महारानी
आज नौकरानी है
हिन्दी के आँचल में है सद्भाव
मगर आँखों में पानी है।
गोरी मेंम को दिल्ली की गद्दी और मुझे बनवास।
कदम-कदम पर होता रहता है मेरा उपहास
सारी दुनिया भारत को देख कारण चमत्कृत है
एक भाषा-माँ अपने ही घर में बहिष्कृत है
बेटा, मै तुम लोगों के पापो को ही
बासठ वर्षो से बोझ की तरह ढो रही हूँ
कुछ और नही क्रर सकती इसलिए रो रही हूँ।
अगर तुम्हे मेरे आंसू पोंछने है तो आगे आओ
सोते हुए देश को जगाओ
और इस गोरी मेम को हटा कर
मुझे गद्दी पर बिठाओ
अरे, मै हिन्दी हूँ
मुझसे मत डरो
हर भाषा को लेकर चलती हूँ
और सबके साथ
दीपावली के दीपक-सा जलती
-

लेखक के बारे में- लेखक सद्भावना दर्पण के सम्पादक साहित्य अकादमी नई दिल्ली के सदस्य एवं जाने-माने पत्रकार लेखक हैंलेखक के नए उपन्यास मिठलबरा के बारे में कुछ -
संपादको के चेहरे बेनकाब करने वाले उपन्यास मिठलबरा का दूसरा संस्करण तेलुगु में भी प्रकाशित:
पत्रकारिता की आड़ में मालिको की दलाली करने वाले संपादको की असलियत जाननी हो तो रायपुर में पिछले तीस सालो से सक्रीय पत्रकार गिरीश पंकज के उपन्यास मिठलबरा की आत्मकथा ज़रूर पढ़नी चाहिए। इस उपन्यास का नया संसकरण मिठलबरा शीर्षक से दिल्ली से प्रकाशित हो गया है. ये उपन्यास अब तेलुगु में भी अनूदित हो गया है. इस उपन्यास की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि इस कृति का उड़िया भाषा में भी पहले अनुवाद हो चुक है. मिठलबरा पर पं. रविशकर शुक्ल विस्वविद्यालय, रायपुर का एक छात्र शोध कार्य भी कर चुका है. इस उपन्यास के लिए गिरीश पंकज को मानसिक यातनाए भी झेलनी पड़ी. लेकिन इस उपन्यास के लिए उन्हें भोपाल में करवट सम्मान भी मिल गया. पत्रकारिता- माफिया ने आरोप लगाया था कि यह उपन्यास किसी पत्रकार विशेष पर लिखा गया है, जबकि गिरीश पंकज का साफ़ कहना है कि उपन्यास पत्रकारिता के भीतर चल रहे उस खेल को बेनकाब करता है, जो पत्रकारिता के मूल्यों के खिलाफ है. और जो दिल्ली से लेकर रायपुर या किसी भी शहर में खूब खेला जा रहा है. संपादक और कुछ पत्रकार मालिको की दलाली को ही पत्रकारिता समझ कर ईमानदार पत्रकारों को नौकरी से हटाने का, खेल करते रहते है. कुछ संपादक कोशिश करते है के उनके मालिक को पद्मश्री मिल जाये. बाते बड़ी-बड़ी करते है औए कंडोम का आधे-आधे पेज के विज्ञापन तथा शादी से पहले क्या सम्भोग उचित है, इस विषय पर पूरा पेज काला करते रहते है. मिठलबरा छत्तीसगढही भाषा का शब्द है, जीसका अर्थ होता है, ऐसा आदमी जो मक्कारी का खेल तो खेलता है मगर मुस्कराहट के साथ. मिठलबरा में ऐसे संपादको की खबर ली गयी है. पता चला है कि अब तो मिठलबरा का पार्ट-टू भी आ रहा है, लेकिन इसे गिरीश पंकज नहीं, दिल्ली के पत्रकार एवं फिल्म लेखक पंकज शुक्ल लिखेंगे. और यह उपन्यास होगा इलेक्ट्रानिक मीडिया में राज कर रहे मिठलबराऔ पर. मीडिया के जुझारू लोगो को इंतजार रहेगा मिठलबरा के पार्ट-टू भी.
*-*-*

हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं है, न हिंदी सिर्फ हिन्दुस्तान की एक संस्कृति है। हिंदी हिन्दुस्तान की भाषा और संस्कृति से कहीं बढ़कर है। हिन्दुस्तान के ९० % से भी जादा बच्चे माँ के पेट से जनम लेने के बाद पहला शब्द जो बोलते हैं वह है हिंदी। जिस ज़ुबां का अनुसरण करते हैं वह अहसास और वह मातृत्व एक ऐसे अस्तित्व का पिरोया है जिससे हम किन्हीं भी कारणों से दूर नहीं जा सकते! इस जगत में प्रवेश का रूप माँ से जुडी हिंदी को शायद इसीलिए मात्र भाषा कहा गया है। तो गुप्त होती मात्र भाषा हिंदी को बचाया रखना हम सभी का नैतिक धर्म है। आइये हम अपनी माँ की तरह अपनी मात्र भाषा को अनपे आचरण में रखें।
पूरे देश को हिन्दी दिवस की हार्दिक वधाइयां
"एक चिट्ठी देश के नाम" का सिलसिला कल से जारी रहेगा!
[उल्टा तीर]

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"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका १५ अगस्त 8th march अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti Binny Binny Sharma boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage DGP dharm ya jaati Domestic Violence Debate-2- dongre ke 7 fere festival Friends With Benefits friendship FWB ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex SHADI PAR BAHAS shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)