अमित जी की जारी बहस "फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स" को आगे बढाते हुए;
[सुनीता शर्मा]
अमित जी,आपने "फ्रेडसविदबेनीफिटस" से जो बहस शुरू की है वह होनी भी चाहिए थी तभी समाज में रह रहे तरह -तरह के लोगों के विचारों का पता चलता है. मैने अपने आलेख "लिव-इन-रिलेशनशिप" में बताया भी है.
इस तरह के रिश्तों के बारे में जो अधिकतर अभी तक महानगरों में है पर देर सवेर इनका असर छोटे शहरों पर भी दिखने लगेगा इसमें कोई अतिशयोक्ति नही है. क्योंकि लोग अपनी सहूलियत के लिए मिसाल ढूंढ लेते है कि वो भी तो ऎसा कर रहा फिर हम क्यों नही करे क्योंकि संस्कृति कैसी भी हो कही न कही उसका स्थान्तरण दूसरे स्थानों पर भी हो ही जाता है।
जों लोग बिना किसी भावना के सिर्फ दोस्ती के नाम पर शारारीरिक सबंध बना लेते है, उनका उददेश्य परिवार जैसी संस्था में नही होता. वो केवल अच्छी जिन्दगी जीने के लिए ही ऎसा करते है। उन लोगो में भावनाए अहम नही होती उन्हे केवल इनजायमेंट करना होता है या फिर बहुत से ऎसे भी होते है जो अपनी व्यस्ताओ के चलते परिवार नही रख पाते है। शेष फिर आगे की पोस्ट में-
