*-*
देश से बहार निकला तो यह खबर हुई
कि मेरे देश की हालत खस्ता बहुत हुई
चंद पैसों की खातिर बन गए हैं दुश्मन सभी अपने
कि गैरों की बात क्या करें, अपनों की हद हुई
लगता है ज़रुरत पड़ेगी अब फरिश्तों की
मसीहा खुद ही लूट रहे हैं अस्मत जो ज़मीं की
मेरे करने से कौन सा फर्क पड़ेगा?
हर एक नौजान की सोच आखिर ऐसी क्यूँ हुई?
बिक गया है देश सियासी खेल के हाथों
क्या आज की जनता को यह खबर भी ना हुई?
अब यूँ ही बैठना तो मुमकिन नहीं होगा
कोशिश करे कोई तो क्या हासिल नहीं होगा
पर कोशिश करने की कोशिश ही भला क्यूँ कम हुई?
जय हिंद
*-*
लेखिका का ब्लॉग: स्वतंत्र...खोज
देश से बहार निकला तो यह खबर हुई
कि मेरे देश की हालत खस्ता बहुत हुई
चंद पैसों की खातिर बन गए हैं दुश्मन सभी अपने
कि गैरों की बात क्या करें, अपनों की हद हुई
लगता है ज़रुरत पड़ेगी अब फरिश्तों की
मसीहा खुद ही लूट रहे हैं अस्मत जो ज़मीं की
मेरे करने से कौन सा फर्क पड़ेगा?
हर एक नौजान की सोच आखिर ऐसी क्यूँ हुई?
बिक गया है देश सियासी खेल के हाथों
क्या आज की जनता को यह खबर भी ना हुई?
अब यूँ ही बैठना तो मुमकिन नहीं होगा
कोशिश करे कोई तो क्या हासिल नहीं होगा
पर कोशिश करने की कोशिश ही भला क्यूँ कम हुई?
जय हिंद
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लेखिका का ब्लॉग: स्वतंत्र...खोज
आपकी प्रतिक्रया ही नहीं आपकी सवेदना का बहुत छोटा सा टुकड़ा भी अपने देश के योगदान में जाकर आपको गर्व महसूस करा सकता है! [उल्टा तीर]
