
इसमें कोई संदेह नही कि सम्प्रति हिन्दी का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है. हिन्दी बाज़ार की भाषा भी बन रही है. हिन्दी ग्लोबल भी हो रही है. बावजूद इसके क्या हमारे अपने देश में हिन्दी को बतौर राष्ट्र भाषा समुचित सम्मान मिल पा रहा है? आज भी ख़ुद हिन्दी भाषियों को कहीं न कहीं लगता है कि अगर अंग्रेजी को वो नही अपनाएंगे तो समय की तेज़ रफ्तार- चाल में वे पिछड़ जायेंगे. ऐसा क्यों है कि आज भी हमारा समाज अग्रेजी को ही उन्नति की भाषा मानता है. क्या हिन्दी की दुर्दशा का दोषी ख़ुद हिन्दी भाषी ही है. उल्टा तीर में इस पूरे महीने बहस में भाग लीजिये. इस बार बहस का विषय है- "क्या केवल अंग्रेजी से ही हमारा समाज उन्नत हो सकता है?"
“आज़ादी” पर बहस का निष्कर्ष पढने के लिए "उल्टा तीर निष्कर्ष" पढ़ना न भूले ।