किस काम के क़ानून?
"उल्टा तीर" इस बार फ़िर हाज़िर है एक नई बहस के साथ। 'क़ानून' जिससे हम सब का वास्ता है, कानून जिससे हमारा सीधा सम्बन्ध है। लेकिन येसे ही कितने क़ानून हैं जो समय के साथ अपना अर्थ खोते जा रहे हैं।
नए समय में क्या ये ज़रूरी हो चला है कि क़ानून में भी आमूल-चूल बदलाव हों?
उल्टा तीर पर इस बार पूरे महीने उन नियमों की, उन कायदों की खुली बहस जो आज के परिप्रेक्ष्य में आप्रसंगिक हो चुके हैं लेकिन फ़िर भी कायम हैं क़ानून की किताबों में, हमारे जीवन में।पिछली बहस की बाबत उल्टा तीर (निष्कर्ष) जरुर पढिये। और भाग लीजिये इस नई बहस में खुलके। क्योंकि बहस अब शुरू हो चुकी है मेरे दोस्त...
आपका;
अमित के. सागर
(उल्टा तीर)
अमित के. सागर
(उल्टा तीर)