दोस्तों, काफी दिनों के बाद [उल्टा तीर] पर इस बार हम “शादी” जैसे एक अलहदे मुद्दे पर चर्चा करेंगे! जिसके सन्दर्भ में भूमिका के तौर पर बस इतना ही कहूंगा कि दो लोगों के बीच के इस उम्र भर के बंधन में बंधने की प्रक्रिया ही लड़के और लड़की के लिए आज के दौर में जटिलता बनती जा रही है. जिंदगी का इक़ पढ़ाव पार करने के बाद भावी पति-पत्नी के रूप में जीवन साथी के साथ इक़ नए जीवन में प्रवेश का अहम फैसला व एक सही जीवन साथी को चुनना इस दौर में कई तरह से जटिल सा हो गया है. बड़े शहरों, महानगरों में शादी करना मतलब एक प्रायोजित किसी घटना या सभा को एक अंजाम देने की प्रक्रिया सा है. जिसको सम्पूर्ण आकर देने के लिए अपनी-अपनी विधा के तमाम कार्यकारियों की सेवायें लेना आज की जरूरत बन गई है. भारत के बड़े शहरों, महानगरों में जहां पश्चिमी सभ्यता ने विवाह बंधन की प्रक्रिया में अपनी मौजूदगी दी है वहीं लड़के या लडकी को अपने मन मुताबिक़ जीवन साथी चुनने की आजादी भी...हांलांकि यह मेरा बेहद उथला बयान है.
तमाम राज्यों के देहात-गाँव में जब दशकों पहले शादियाँ होती थीं तो संभवतः लड़के या लडकी को सुहागरात वाले दिन ही इक-दूसरे का चेहरा देखने को मिलता था, जान-पहचान या स्वभाव की बातें दूर की बातें थीं. हांलांकि आज के समय में थोड़ा बदलाव आया है मगर गाँव शहर नहीं हुए हैं. यह होना जरूरी है या नहीं, यह विषय हमारा कतई नहीं.
बहुत हद तक चीज़ें वैसी ही हैं जैसे कि पिछले काल में बिना कंप्यूटर के भी सभी काम होते थे, मगर आज नहीं होते! हम पहले भी जीते थे मगर आज हमारी जिंदगी में बहुत सी चीज़ें इस क़दर प्राथमिक हो चुकी हैं कि हम 'इनके बिना' जीने की कल्पना तक नहीं कर पाते! वैसे ही, जहां चाँद को हाथ से पकड़कर देख लेने जैसी उपलब्धियां हमने पा ली हैं वहीं जीवन के तमाम छोरों पर हमने नई जटिलताएं और चुनौतियां भी पाई हैं. मेरे ख्याल से इतने भर को भी मध्य-ए-नज़र रखा जाए तो हम इस विषय पर चर्चा करना लाज़मी पते हैं कि- शादी की सही प्रक्रिया और जीवन साथी का सही चुनाव कैसे हो? क्या शादी से पहले लड़के और लड़की के बीच बातचीत होनी चाहिए? जीवन के इतने बड़े फैसले (शादी करना) को अमली जामा किस तरह से पहनाया जाना चाहिए?
बहुत हद तक चीज़ें वैसी ही हैं जैसे कि पिछले काल में बिना कंप्यूटर के भी सभी काम होते थे, मगर आज नहीं होते! हम पहले भी जीते थे मगर आज हमारी जिंदगी में बहुत सी चीज़ें इस क़दर प्राथमिक हो चुकी हैं कि हम 'इनके बिना' जीने की कल्पना तक नहीं कर पाते! वैसे ही, जहां चाँद को हाथ से पकड़कर देख लेने जैसी उपलब्धियां हमने पा ली हैं वहीं जीवन के तमाम छोरों पर हमने नई जटिलताएं और चुनौतियां भी पाई हैं. मेरे ख्याल से इतने भर को भी मध्य-ए-नज़र रखा जाए तो हम इस विषय पर चर्चा करना लाज़मी पते हैं कि- शादी की सही प्रक्रिया और जीवन साथी का सही चुनाव कैसे हो? क्या शादी से पहले लड़के और लड़की के बीच बातचीत होनी चाहिए? जीवन के इतने बड़े फैसले (शादी करना) को अमली जामा किस तरह से पहनाया जाना चाहिए?
मुझे यह समस्या गाँव-देहातों की तरफ की ज्यादा दिखती है. बेशक शहरों से नई डिजायन के कपडे, चश्मे, मोबाइल, बोलियाँ, आधुनिकता, सेक्स, सेक्स, सेक्स की जानकारी, तरीके-, परिवेश जैसी तमाम चीज़ों ने गाँव और शहरों तक के सफ़र के द्वारा पलायान किया है. चीज़ें बदलीं हैं, मगर दूसरे अन्य बदलाओं को भी खडा किया है? प्रश्न की तरह?
मैं आप लोगों को एक छोटी सी कहानी सी (मगर हकीकत) बताता हूँ, जिनके कहने और जिनकी शादी में हो रही समस्या ने ही इस विषय को उठाने की प्रेरणा दी है. असल में.
मेरे मित्र हैं डोंगरे. मूलतः मध्य प्रदेश के एक जिला से हैं. ३ वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं. एक राष्ट्रीय अखबार में काम कर रहे हैं. उम्र पूरी तरह से 'शादी' करने की हो गई है. अब समस्या यह है कि उन्हें अपने समुदाय में अपने राज्य के आस-पास के जिले में काफी मशक्कत के बाद भी अब तक प्रोफेसनल लडकी नहीं मिली, जिससे भावी जीवन की थोड़ी सी चर्चा करके वो यह ज्ञात कर सकें कि यह लड़की उनके अच्छी जीवन साथी बन सकती है और फिर वो शादी कर ही लें. यही प्रतिक्रिया वो लड़की की और से भी चाहते हैं कि उनसे शादी करने से पहले लड़की उनसे भावी जीवन के बारे में, उनके या उनके स्वभाव, इत्यादी के बारे में बात करे और उसके बाद फिर निर्णय करे कि क्या वो लड़का उसके लिए ठीक है...आदि...इत्यादी! अंग्रेज़ी भाषा में या पश्चिमी सहूलियत से इसे 'डेटिंग' कहिये! मगर यह स्वच्छंदा की हद कतई नहीं, कमसे कम इक बार की, घंटे भर तक की बातचीत तक तो होनी ही चाहिए! मगर तमाम रिश्तों की पड़ताल के बाद यही पाया- लड़की के माँ-बाप इसके लिए तैयार नहीं! वहीं इक दिलचस्प बात यह है कि जो लडकियां ठीक-ठाक पढ़-लिखकर नौकरी पेशा हैं, और जो अब तक अविवाहित हैं- दबी जुबान में उनका मानना है कि शादी करने से पहले उनका भावी पति शादी की प्रक्रिया में अगर उनसे खुलकर बात करे तो उन्हें बेहद खुशी होगी, और वो काफी सहज महसूस करेंगीं- मगर ऐसा नहीं होता!
मैं आप लोगों को एक छोटी सी कहानी सी (मगर हकीकत) बताता हूँ, जिनके कहने और जिनकी शादी में हो रही समस्या ने ही इस विषय को उठाने की प्रेरणा दी है. असल में.
मेरे मित्र हैं डोंगरे. मूलतः मध्य प्रदेश के एक जिला से हैं. ३ वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं. एक राष्ट्रीय अखबार में काम कर रहे हैं. उम्र पूरी तरह से 'शादी' करने की हो गई है. अब समस्या यह है कि उन्हें अपने समुदाय में अपने राज्य के आस-पास के जिले में काफी मशक्कत के बाद भी अब तक प्रोफेसनल लडकी नहीं मिली, जिससे भावी जीवन की थोड़ी सी चर्चा करके वो यह ज्ञात कर सकें कि यह लड़की उनके अच्छी जीवन साथी बन सकती है और फिर वो शादी कर ही लें. यही प्रतिक्रिया वो लड़की की और से भी चाहते हैं कि उनसे शादी करने से पहले लड़की उनसे भावी जीवन के बारे में, उनके या उनके स्वभाव, इत्यादी के बारे में बात करे और उसके बाद फिर निर्णय करे कि क्या वो लड़का उसके लिए ठीक है...आदि...इत्यादी! अंग्रेज़ी भाषा में या पश्चिमी सहूलियत से इसे 'डेटिंग' कहिये! मगर यह स्वच्छंदा की हद कतई नहीं, कमसे कम इक बार की, घंटे भर तक की बातचीत तक तो होनी ही चाहिए! मगर तमाम रिश्तों की पड़ताल के बाद यही पाया- लड़की के माँ-बाप इसके लिए तैयार नहीं! वहीं इक दिलचस्प बात यह है कि जो लडकियां ठीक-ठाक पढ़-लिखकर नौकरी पेशा हैं, और जो अब तक अविवाहित हैं- दबी जुबान में उनका मानना है कि शादी करने से पहले उनका भावी पति शादी की प्रक्रिया में अगर उनसे खुलकर बात करे तो उन्हें बेहद खुशी होगी, और वो काफी सहज महसूस करेंगीं- मगर ऐसा नहीं होता!
अब आप लोग अपनी अपनी राय दीजिये! आपको क्या लगता है! आपके लेख-आलेख भी आमंत्रित हैं!
[उल्टा तीर के लिए]
अमित के सागर
अमित के सागर

