* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. धन्यवाद.
**१ अप्रैल २०११ से एक नए विषय (उल्टा तीर शाही शादी 'शादी पर बहस')के साथ उल्टा तीर पर बहस जारी...जिसमें आपका योगदान अपेक्षित है.*[उल्टा तीर के रचनाकार पूरे महीने भर कृपया सिर्फ और सिर्फ जारी [बहस विषय] पर ही अपनी पोस्ट छापें.]*अगर आप उल्टा तीर से लेखक/लेखिका के रूप में जुड़ना चाहते हैं तो हमें मेल करें या फोन करें* ULTA TEER is one of the well-known Hindi debate blogs that raise the issues of our concerns to bring them on the horizon of truth for the betterment of ourselves and country. आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं! *आपका - अमित के सागर | ई-मेल: ultateer@gmail.com
reasons of domestic violence लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
reasons of domestic violence लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

औरत है तू...!!!



औरत है तू, तूझे तो दु:ख देखने ही हैं, हमारे समाज में यह धारणा कितनी गलत है कि एक महिला को बस परेशानियां ही मिलती हैं. विवाह उपरान्त दहेज के लोभी उसे जला डालते है तो वह यदि वह अपना करियर बनाना चाहें तो वहां भी उसे उत्पीडन का शिकार होना पडता है, सबसे बडा उदाहरण रूचिका का मामला है जिसे सभी जानते है।

पढी-लिखी महिला तो इसका मतलब यह नही कि बस उसकी तकलीफे कम हो गयी, वह घर से बाहर काम भी करे घर में भी करे और दोनो मे सन्तुलन बनाने के चक्कर मे चक्करघिन्नी बन गयी है । दहेज के लालची उसे कही जला डालते है तो कही मासूम लडकियां हवस का शिकार बन जाती हैं। आखिर क्यों कब तक अपनी तकलीफों से आजिज़ आ कर एक पढी लिखी महिला ने कहा अच्छा करते हैं लोग अपनी बेटियों का कोख मे ही मरवा देते हैं. ऎसी मानसिकता वह भी उच्चशिक्षित महिलाओ में फिर अनपढ तो कही ज्यादा जागरूक होती है, अपने अधिकारों के प्रति।

दहेज के लोभी अपनी वधुओ को इसलिए जला देते हैं ताकि उन्हे उससे छुटकारा मिल जाये और वह दुबारा विवाह कर किसी और से दहेज रूपी धन की उगाही कर सके, ऎसा होता है अपने रोब व धन बल पर यह लोग सजा से भी बच जाते हैं और फिर अन्यत्र विवाह कर दहेज प्राप्त कर लेते हैं.  कुछ लोग तो धन दौलत देख कर विवाह करते है ताकि आजीवन उन्हे लडकी के मायके से भी लाभ मिलता रहे.  कितने तो ऎसे होते है जो दहेज रूप मे मिली सुख सुविधा के दम पर जीवन यापन करते हैं, उनके विवाह का मकसद आसानी से प्राप्त होने वाली सुख सुविधा व धन प्रप्ति ही तो था जो लडकी वाले अपने लडकी को धन से सुखी नही कर पाते उनकी लडकियों को ससुराल में ताने व दुख ही मिलते हैं यदि ससुराल वालो ने पैसों के मकसद से विवाह किया ओर जब उनकी मांगे पूरी नही हो पाती तो उस महिला का जीना मुशकिल हो जाता है दहेज के लालची तरह-तरह के बहानो से ज्यादा से ज्यादा लडकी के मायके वालो  से लाभ उठाना चाहते है क्यों शादी करके उन्होने अहसान जो किया है.

कभी रस्मो का बहाना बनाया जाता है कभी त्यौहारों का कभी किसी अवसर का बहाना तो कभी अन्य मकसद एक ही किसी भी तरह वधु के मायके से कुछ न कुछ मिल जाये आखिर बिना किसी मेहनत के जब इतना कुछ मिलता हो तो कोन न लेना चाहेगे। जब किसी की उम्मीदे पूरी नही हो पाती तो वह वधु उनके किस काम की जो धन उगाही का साधन न बन पायी वह उनके खीज उतारने का तानों का पर्याय तो बन ही सकती है उसे जला कर इन बातो से छुटकारा दे दिया जाता है तकि किसी और से वह धन का अपना मकसद तो पूरा कर सके कभी परेशान हो काई ब्हाता खुद की इहलीला समाप्त कर इस अत्याचार से मुक्ति पा लेती है।

समाज की इन्ही विसंगतियों से परेशान बेटी को कोख में मरवा देता है हमारा यह सभ्य समाज एक लडकी के माता-पिता बन तकलीफें सहन करने से अच्छा  समझता है  कोख में ही मार दो उसे जन्म ले का भी अधिकार नही जो ऎसा करते कभी उनके दिल में झांक कर देखो वह ऎसा कयों करते है? 

लडकी के माता-पिता चाहते हे उनकी लडकी विवाह उपरान्त सुखी रहे इसके लिए वह पर्याप्त कोशिशे भी करते है पर क्या वह ससुराल में दहेज लोभियों से बच पाती है मै यह नही कहती सभी ऎसे होते हैं.  यह सिर्फ उन लोगो के लिए हे जो विवाह को लेन देन का जरियां मानते है वह दहेज की चाहत रखते है।  

इन्ही कारणों कितनी की लडकियां ऎसी भी हे जो विवाह की इच्छुक नही होती यदि किसी महिला पर अत्याचार होता है तो चाहे वह किसी भी बात को लेकर हो तब समाज का क्या रोल होता है वह केवल मूकदर्शक ही होता है यदि काई किसी का प्रताडित करता भी है तो उसे तमाशा बन न देखे रोकने की कोशिश करे युवावर्ग मे बहुत शक्ति होती हे यदि वह थोडा सा भी इस ओर ध्यान दे तो बहुत हद तक रोक लग सकती है पर ऎसा होता बहुत कम है आज के युवा का अपने स्टाइल,फैशन,इन्टरटेनमेन्ट,गर्लफेंन्डस ,बायफ्रेंडस व डेटिगों से फुर्सत ही कहां जो वह इस ओर ध्यान दे वह काई समाज सुधारक थोडे ही है फिर किसी के मामले में पडकर उनका नुकसान ही होगा किसी के मैटर में हम क्यों पडें यही भावनायें है जो युवा शक्ति को किसी बहन, बेटी, बहु,बुजुर्ग पर होते अत्याचार को देखते ही रहने पर मजबूर कर देता है   काश सब यह सोचे कि यह सब किसी के साथ भी हो सकता उनके अपने अजीजों  के साथ भी।   कुछ जो महिलाये दूसरी महिला के साथ ईष्या वश पुरूष को दुसरी महिला को प्रताडित करने का भाव रखती है उसे भी यह सोचना चाहिए ऎसा  उसके अपने के साथ भी हो सकता है।व्यवहार व माहौल भी इन बातो को हवा देता है। इसी तरह महिलायें शोषण का दहेज का घरेलू हिसां का यौन शोषण का शिकार होती है ,होती रही है, होती रहेगी जब तक हम देखते रहेगे केवल तमाशाबीन  बनकर। 
सुनीता शर्मा 
स्वतंत्र पत्रकार 

सोमवार, 9 नवंबर 2009

घरेलू हिंसा के कारण- कब तक और क्यों ? Violence Debate- 5



महिलाओं पे घरेलु हिंसा का इतिहास पूरी दुनिया मे पुराना है। भारत में शायद अन्य मुल्कों से कुछ अधिक (पाकिस्तान में उससे भी अधिक हो सकता है)

कई कारण रहे हैं इसके। जैसे-

Ø      सबसे मुख्य कारण: पितृप्रधान व्यवस्था लडकी ब्याह के बाद ससुराल आती है। ( केरल तथा गुजरात में कुछ टपके हैं, जहाँ लड़का ससुराल आता है, माता पिता की देखभाल करनेकी ज़िम्मेदारी लडकी पे होती है.)

ससुराल आते ही उसपे उस घर के रीती रिवाज तुंरत अपनाने के लिए थोपे जाते हैं.। उसका अलग अस्तित्व किसी को मंज़ूर नही होता।

Ø      औरत का आर्थिक दृष्टी से आत्म निर्भर ना होना एक और कारण बन जाता है। उसे शारीरिक मानसिक हिंसा को भयंकर से रूप बर्दाश्त करना पड़ता है।

अक्सर मानसिक हिंसा को हिंसा माना ही नही जाता। लडकी को समर्पण भाव का उपदेश दिया जाता है। बचपन से यही बात सिखाई जाती है कि वो 'पराया धन' है। जहाँ वो पली बढ़ी वही घर उसके लिए पराया बन जाता है। ऐसे हालातों में पति और उसके परिवार को यकीन होता है कि उसे कहीं पनाह नही मिलनेवाली। माता पिता की आर्थिक हालत तथा सामजिक प्रतिष्ठा पे आँच आने की संभावना से ही उसके मायके वाले डर जाते हैं। अन्य भाई बहन के ब्याह में मुश्किल होगी ये डर रहता है। पढ़े-लिखे और आर्थिक रूपसे मज़बूत परिवारों मेभी यही विकृत मानसिकता दिखाई देती है। (एक सवाल तुम करो' इस ब्लॉग पर पढें " अर्थी तो उठी' इस शीर्षक तहत लिखा हुआ आलेख. गर अमित जी इजाज़त दें तो उसे उल्टा तीर पे पोस्ट कर दूँगी)

Ø      सवाल ये उठता है कि औरत की सुरक्षाके लिए क़ानून बने हैं, फिर भी हिंसा पे कोई रोक नही। जवाब यह है कि हिंसा का बयाँ गर पुलिस ठाणे में दर्ज कराया जाता है (लडकी द्वारा), तो उसके लिए ससुराल के दरवाज़े तो तुंरत बंद हो जाते हैं. मायकेवाले भी समझौता करवाने में अधिक विश्वास रखते हैं। साठी औरत गर कमाती ना हो, तो बच्चों के लालन पालन की ज़िम्मेदारी कौन निभाएगा, ये बड़ा सवाल होता है। ज़ाहिरन, ससुराल वाले इस बात का दुरूपयोग करते हैं। लडकी को घर छोड़ना है तो छोडे, बच्चे नही मिलेंगे, ये धमकी दी जाती है। ये इमोशनल blackmail ही तो है! बच्चों की खातिर एक माँ बहुत कुछ बर्दाश्त कर जाती है।

            थाने में जब तक रिपोर्ट नही लिखवाई जाती, आगे की कोई कार्यवाही मुमकिन नही। इसी कारण, पुलिस थानों में कौटुम्बिक सलाह मशविरा भी दिया जाता है।

Ø      दहेज़ की खिलाफत करता हुआ कठोर क़ानून है, लेकिन फिर वही बात! तेरी भी चुप मेरी भी चुप ! गर ब्याह के बाद रिपोर्ट लिखवायें तो मुश्किल, ब्याह के पहले लिखवायें तो  भविष्य में संभावित अन्य रिश्तों को लेके परेशानी..!
           
Ø      दहेज़ को लेके लडकी को कई बार जला दिया जाता है। मृत्यु पूर्व ज़बानी में उसपर दबाव डाला जाता है कि गर वो पति के ख़िलाफ़ कुछ कहेगी तो बच्चे पूरी तरह अनाथ हो जायेंगे. उनके सर से पिता का साया भी उठ जाएगा! वो जलने को अपघात की तौर पे दर्ज कराने के लिए मजबूर की जाती है।

Ø      गर उसे सत्य भी बताना हो तो, अस्पताल में महिला संगठना की कोई सदस्या हाज़िर हो तभी ये तकरार दर्ज की जा सकती है ! रातके समय गर उसे जलाया जाय और महिला संगठना की कार्यकरता/ सदस्य को भनक लग जाय तो वो या तो छुप जाती हैं, या बीमार होने का नाटक कर लेती हैं (ये असली जीवन में देखी घटनाओं का बयाँ दे रही हूँ)

ऐसी हालत में केवल पुलिस के समक्ष दी बयानी न्यायलय में ग्राह्य नही होती। ऐसे कई केस देखे गए हैं, जहाँ, पड़ोसी पोलिस और न्यायाधीश तक को पता होता है कि कसूरवार कौन है, क़ानून सुबूत मानता है। औरत की ज़बानी जो वो मृत्युपूर्व देती है, गवाही के बिना अवैध मानी जाती है !

Ø      मानसिक अत्याचार के जिस्म पे निशाँ तक नही होते ! कौन गवाही देगा...और वही सवाल, औरत जाए तो कहाँ जाय?

इन हालातों को मद्देनज़र रखते हुए, ऐसे ग्रहों/संस्थाओं की बेहद ज़रूरत है जहाँ महिलाओं, उनके बच्चों समेत, आश्रय मिल जाए। वरना गर साल बाद बच्चे को रिमांड में भेज दें तो वहाँ उसकी क्या हालत होगी ये सोचके डर लगता है!
उल्टा तीर के लिए
[शमा]
***
स्त्री प्रधान इस बुराई के विषय में जब तक महिलाओं खुलकर सामने नहीं आयेंगी, बहुत से सच सामने नहीं आयेंगे, बहुत सी बातें, कई तरह की मानसिकताएं कभी भी सामने नहीं आ सकेंगीं.  यह हिंसा सहना और हमेशा सहते रहना आपको आदत में तो डाल सकता है मग़र आप अपनी आने वाली पीढी को भी यही हिंसा परम्परागत जाने-अनजाने सौंप ही देंगे! मैं नहीं कहता कि यह इक़ दिन में कह्तम हो जाने वाली समस्या है, मैं मग़र यह जरूर कहता हूँ कि यह एक बड़ी बुराई है, हिंसा है, महिलाओं के साथ इंसानियत का रवैया नहीं है घरेलू हिंसा, यह महिलाओं की आज़ादी और संभावनाओं पर तमाचा है, जो हर रोज ही महिलाओं को अपने घर में सहना पड़ता है! बुराई करते-करते या सहते-सहते अभ्यस्त होने से अच्छाई के लिए इक़ बार अच्छा होना जादा अच्छा है.
[अमित के सागर]

"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका 8th march Binny Binny Sharma DGP Domestic Violence Debate-2- FWB Friends With Benefits SHADI PAR BAHAS amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage dharm ya jaati dongre ke 7 fere festival friendship ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के १५ अगस्त

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)