* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. धन्यवाद.
**१ अप्रैल २०११ से एक नए विषय (उल्टा तीर शाही शादी 'शादी पर बहस')के साथ उल्टा तीर पर बहस जारी...जिसमें आपका योगदान अपेक्षित है.*[उल्टा तीर के रचनाकार पूरे महीने भर कृपया सिर्फ और सिर्फ जारी [बहस विषय] पर ही अपनी पोस्ट छापें.]*अगर आप उल्टा तीर से लेखक/लेखिका के रूप में जुड़ना चाहते हैं तो हमें मेल करें या फोन करें* ULTA TEER is one of the well-known Hindi debate blogs that raise the issues of our concerns to bring them on the horizon of truth for the betterment of ourselves and country. आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं! *आपका - अमित के सागर | ई-मेल: ultateer@gmail.com
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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

स्वतंत्रता के उपरांत "एक चिट्ठी देश के नाम"

मुहब्बत जब सचमुच दिल को छू लेती है, मुहब्बत जब सचमुच एक अहसास का पिरोया बन जाती है फ़िर मुहब्बत करने वालों के लिए सितम भी मुहब्बत से कम नहीं लगते! मगर ये सितम करने को मुहब्बत भी तो चाहिए दिल में...शाख जब चरमरा के टूट ही जाती है तो फ़िर पेड़ भी मायूस होकर सूख ही जाता है! और यह सूखानापन इतना खतरनाक भी हो सकता है कि अस्तित्व का भी नामोनिशान मिट जाए!!! यही सूखानापन यही असंवेदना आज देश को कई अहम् मुद्दों पर लचर घोषित कर रही है...क्योंकि इसके वासी (इसकी बहुमूल्य शाखाएँ, इसकी पत्तियाँ) स्वंय ही अपनी-अपनी उड़ान पर हैं? बेशक उनकी जड़ खोखली होकर मिट्टी होती रहे! बहुमुखी प्रतिभा की धनी सफर की फोटोग्राफी का शौक़ रखने वाली "प्रियंका तैलंग" ने काव्यमय "एक चिट्ठी देश के नाम" में यही इशारा किया है कि क्या हुआ अगर हमसे ही अँधेरा हो गया, क्या हुआ अगर हमारे हाथ जंजीरों में जकड़ दिए गए, क्या हुआ अगर हम लाचारी की हद तक थक गए हैं- क्या हुआ अगर हमें हमारे ही मन ने पतन तक पहुंचा दिया है...क्या हम फ़िर से सिर्फ़ एक कोशिश नहीं कर सकते, सिर्फ़ एक कोशिश ... तो हो जाइए इस कोशिश में शामिल और बन जाइए फ़िर से अखंड भारत की मजबूत शाखाएं, हरी-भरी वो पत्तियाँ जिन्हें न वाहरी तूफ़ान का डर हो, न हो मुरझाने की तासीरें चेहरों पर!

स्वतन्त्रता के उपरांत
*-*
देश से बहार निकला तो यह खबर हुई
कि मेरे देश की हालत खस्ता बहुत हुई

चंद पैसों की खातिर बन गए हैं दुश्मन सभी अपने
कि गैरों की बात क्या करें, अपनों की हद हुई

लगता है ज़रुरत पड़ेगी अब फरिश्तों की
मसीहा खुद ही लूट रहे हैं अस्मत जो ज़मीं की

मेरे करने से कौन सा फर्क पड़ेगा?

हर एक नौजान की सोच आखिर ऐसी क्यूँ हुई?


बिक गया है देश सियासी खेल के हाथों
क्या आज की जनता को यह खबर भी ना हुई?

अब यूँ ही बैठना तो मुमकिन नहीं होगा

कोशिश करे कोई तो क्या हासिल नहीं होगा

पर कोशिश करने की कोशिश ही भला क्यूँ कम हुई?


जय हिंद
*-*
लेखिका का ब्लॉग: स्वतंत्र...खोज
आपकी प्रतिक्रया ही नहीं आपकी सवेदना का बहुत छोटा सा टुकड़ा भी अपने देश के योगदान में जाकर आपको गर्व महसूस करा सकता है! [उल्टा तीर]

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

इस देश को जोड़ने के लिए... "एक चिट्ठी देश के नाम"

जय हो ! से शुरू हुई यह चिट्ठी हमारे अन्दर सो रही मानवता को जगाने और और जात-पात, धर्म भेद-भाव को ख़तम करने की एक गुहार है। जब हम सब लोग जात-पात, धर्म, भेद-भाव को मानवता का, आपसी भाई-चारे और सौहार्द का दुश्मन मानते हैं, तब भी हमें बार-बार किसी अलार्म के द्वारा जगाने की जरूरत सी होती है! यह एक प्रश्न हो सकता है कि क्यों नहीं हम ऐसी मानवता को अपने जीवन का आचरण बना लेते हैं जिससे हम एक-दूसरे के बुरे या फिर दुश्मन होने से पूरी तरह बचते हुए सारी अवाम में सिर्फ और सिर्फ प्यार उगायें, प्यार बांटे और इक असली मुस्कान के साथ जीवन यापन करें! यह तथ्य आतंकवाद जैसे बड़े मुद्दे को भी बहुत हद तक कमजोर बनाने में बहुत सक्षम हो सकता है . यह हर नागरिक का वह कर्तव्य हो सकता है जिसे निभाने के लिए शायद ही कुछ ऐसा आड़े आये जो किसी के लिए भी मुनासिब हो. बहुत ही सच्चे अहसासों बिना किसी बनावट के लिखी गई यह चिट्ठी उल्टा तीर को मुंबई से [मुनव्वर सुल्ताना बदरुल हससन "सोनी हसोणी"] ने भेजी है.

जय हो।
भारत माता की नज़र में उस के सारे बच्चे एक सामान है. न कोई जात पात, न कोई भेद-भाव.तो आज हमारा आपस का प्यार कहा खो गया? एक वक़्त था जब भारत माता के आँचल के साए में, उसका सारा परिवार एक साथ प्यार से रहा करता था, मुसीबत के वक़्त कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ मुश्किलों का सामना करता था. पर आज यही परिवार जात-पात के नाम पर एक दूसरे से अलग हो गया और दिलों में प्यार की जगह नफरत बसने लगी.

इस देश को तोड़ने के लिए
पत्थर की ज़रुरत नहीं
अपनों की बेवफाई का
एक लफ्ज़ ही काफी है

हम इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि अगर हमारी एकता टूट गई, हमारा यकीन एक दूसरे से डगमगा गया तो क्या हम खुश रह पाएंगे? हिंदुस्तान की एकता तो हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी ताकत है, जोकि अब टूट सी रही है. सरहद पर जो जाबांज सिपाही हमारी हिफाज़त के लिए दिन रात दुश्मनों का सामना करते रहते हैं, उस वक़्त वो सिर्फ हिन्दू या मुस्लिम नहीं लड़ते, वो अपने देश वासियो के लिए खुद को फना कर देते हैं और अपनों की खातिर शहीद हो जाते हैं. १५ अगस्त १९४७ को हमारा देश आजाद हुआ पर आपस के भेद भावः ने इसे फिर एक बार गुलाम बना दिया. हम अपनी इस चिट्ठी के जरिये अपने सभी देश वासियो को इक ही पैगाम देना चाहते हैं-

नफरत से मुहब्बत है बडी चीज़
इस दुनिया में आये हो तो प्यार खरीदो

आज इंसान के दिलों में इतनी कड़वाहट भर गई है की उसे दूर करने के लिए हमें थोडा सा प्यार खरीदना पड़े तो यह घाटे का सौदा नहीं होगा. जय हो।

भारत देश है प्यारा नयारा
सबसे अच्छा देश हमारा

इस देश में रहते हिन्दू भाई
मुस्लिम, सिख, इसाई
राम यहाँ, रहीम यहाँ
सलाम यहाँ, नमन यहाँ

ईद यहाँ, दीप यहाँ
तो दिल क्यों है जुदा-जुदा
जब देश हो इतना प्यारा न्यारा
सबसे अच्छा देश हमारा

अल्लाह ने आदम जात बनाई
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
कहते थे सब भाई भाई

तो क्यों वो आपस में टकराए
खुशियों में रूठ क्यों जाए
भाई के हाथ ये शोला क्यों?
फरिका वरना फसाद क्यों?

जब देश हो इतना प्यारा न्यारा
सबसे अच्छा देश हमारा

इंसानियत की मांग है इतनी
अमन--अमन के साथ हो
मिलकर दुआएं मांगिये जब
सारे जहां का हाथ हो

खुदा यहाँ है, भगवान् यहाँ
तो दिल क्यों हो जुदा-जुदा
भारत देश है प्यारा नयारा
सबसे अच्चा देश हमारा

सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा
हम बुलबुले हैं इसके, ये गुलिस्तान हमारा

*-*-*
अपनी राय जरूर लिखें!

रविवार, 6 सितंबर 2009

मेरी आवाज़ सुनो 'एक चिट्ठी देश के नाम'


"एक चिट्ठी देश के नाम" की श्रंखला में यह अगली चिट्ठी मुंबई से मराठी, हिंदी, अंगरेजी पर सामान अधिकार रखने वाली कई पुस्तकों की लेखिका, वर्तमान समय में ब्लोगिंग अन्य कई सामाजिक अभियानों में जुझारू रूप से जुड़ीं "शमा" जी ने उल्टा तीर को भेजी है. यह कम शब्दों वाली चिट्ठी में देश के प्रति लिखे गए वाक्यांश आपको हिला कर रख सकते हैं, क्योंकि यह चिट्ठी आपको अपने अन्दर झांकने को कहती है? क्या हम खुद से सचमुच इतने विमुख हो गए हैं कि हम ही एक प्रश्नचिन्ह हैं अपने आप पर? अगर आप सचमुच गंभीर हैं अपने माता रूपी देश के लिए तो यकीनन आपका हिल जाना और फिर इक नई ताकत और जोश के साथ खड़े हो जाना ही एक मात्र उद्धेश्य होना चाहिए! सीधे तौर पर बात करती हुई यह चिट्ठी प्रस्तुत है-

गर देश को हम माता मानते हैं तो ज़्यादातर देशवासी दर्शक, केवल दर्शक क्यों बने हुए है? हरेक व्यक्ति का अपनी ओर से निच्श्चय होना चाहिए इस माँ को बेहतर और बेहतर बनाने का. इस माँ की अस्मत बचाए रखने का. हाथ पे हाथ धरे न रहें. केवल राज नेताओं को दोष न दें. क्योंकि, वो लोग भी हमारे ही समाज की उपज हैं. हमारे ही माँ बहनों की कोख से पैदा हुए हैं. कहीँ अलग से निर्यात नही किए गए. तो आज हमें अपने ही गिरेबाँ में झाँकना है, देखना है कि पारिवारिक तथा सामाजिक संस्कारों में हम कहाँ चूक गए?

कहाँ हमारी घिसी पिटी न्याय व्यवथा चूक रही है. और है, तो हम कुछ क्यों नही करते...?? १९८१ से उच्चतम न्यायलय की अवमानता हो रही है...जब तक वो आदेश जो उस वक्त उच्चतम न्यायलय ने दिए थे, लागू नही होते, हम चाहे अफीम हो, गांजा हो चाहे हथियार हों...तस्करी से निजात नही पा सकते...

"आइये हाथ उठायें हम भी,
हम
जिन्हें रस्मो दुआ याद नही,
रस्मे
मुहब्बत के सिवा
कोई
बुत कोई खुदा याद नही॥!"
याद
करें इन अल्फाजों को...!


'मेरी ओरसे एक अदना-सी रचना: [रुत बदल दे !]

पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ,
इन्सान से इंसान तक़सीम हो, खुदाने कब चाहा?
लौट
के आयेंगी बहारें, जायेगी ये खिज़ा,
रुत
बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल
है बड़ा, नही काम ये आसाँ,
दूर
सही, जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!
-
कृपया अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।
*-*-*
बकौल लेखिका-
I, Shama a staunch Indian,have gone through many upheavals in life.There have been agonising moments,separation from my loved ones,but have also risen like the proverbial phoenix from my own ashes,time & again.How long I will be able do it is not known.But am here to share my agony & experience both.I am not atall a skilled write, yet,my devastating agony compelled me to write,without any technical knowledge of meterage etc.(Chhandme nahi likh sakti).There is prose too in english in the same blog.I hope I can communicate with my readers.Only then I will feel I have achieved something.For me communication is very important.
राईटर' ब्लॉग: http://shamasansmaran.blogspot.com/
http://lalitlekh.blogspot.com

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

पहली चिट्ठी- एक चिट्ठी देश के नाम

प्रिय पाठको उल्टा तीर "एक चिट्ठी देश के नाम" के सम्बन्ध में आपके द्वारा लिखी हुईं
अनेकों
चिट्ठियों के लिए तहे-दिल से आभारी है. उल्टा तीर सितम्बर माह में कुछ चुनिन्दा चिट्ठियों को जिनमें आपकी देश के प्रति भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है; को सिलसिलेबार रूप से प्रकाशित कर रहा है. एक नई ऊर्जा और जोश के साथ इक नवीनतम कलेवर में उल्टा तीर शीघ्र ही आपके समक्ष प्रस्तुत होगा. बस थोडा इंतज़ार कीजिये, उल्टा तीर पर हर महीने आयोजित होने वाली बौद्धिक गतिविधियों में अपना अमूल्य योगदान देते रहिये.
आभार
; [उल्टा तीर]

नई दिल्ली से "बबीता पंवार" की लिखी हुई यह चिट्ठी पढें और अपनी राय दें.

प्यारे देशवासियों,

मै आप सब को नव सवतंत्रता वर्ष की बधाई देती हूँ. आज हम अपने देश की स्वतंत्रता को उसी तरह से मना रहे हैं जैसे किसी बच्चे का जन्मदिन. ख़ुशी का मौका है अच्छा - बुरा देखने में तो कोई विशेष बात नहीं सब ही देखते है लकिन एक खास बात ये है कि हम क्या अपनी आज़ादी को वैसे ही पाया है जैसा पाना चाहते थे या नहीं ?

आज़ादी अपने आप में बहुत बड़ी भेट है ईस्वर की, जिसे हमारे पुरखो ने खून से सीच कर हमे दिया है. इसका मोल हमे अभी तक नहीं मालूम या फिर जाने - अनजाने भुलाए बे़ठे है. क्योकि हमे आज़ादी नहीं आराम या यूं कहू कि हराम की जिन्दगी की आदत हो गयी है.

देश के नेता जिन्हें देश का मार्गदर्शन करना चाहिए वो केवल अपना भविष्य बनाने मै लगे हुए है, पुलिश, वकील लोगो को डरा कर अपना और अपने आका लोगो का ही हित साधने मै लगे है अन्य विभाग भी किसी न किसी का हक मार कर बेठे है और सबसे बड़ी भूल हम लोगो ने की है जो वो अपने जिम्मेदारियों से भागते रहना और सोचा कि जो ईस्वर की मर्ज़ी वो ही होगा लकिन ये भूल गए की इश्वर भी उन्ही की मदद करते है और सवयम दुर्जन और दुर्गुणों से लड़ कर ही वह इश्वर बने.

कहना तो बहुत कुछ है लकिन ये सब कहना इतना आसान नहीं है. अंत मै अपने देशवाशियों को बहुत बहुत प्यार और बधाई देती हों. जय जवान जय किसान।
*-*-*

चिट्ठियों के प्रकाशन का क्रम १५ सितम्बर तक चलेगा. इसमें आप भी अपनी चिट्टी को शामिल कर सकते हैं तो भेज दीजिये "एक चिट्ठी देश के नाम" लिखकर १२ सितम्बर ०९ तक. [उल्टा तीर]

शनिवार, 1 अगस्त 2009

एक चिट्ठी देश के नाम

गस्त का महीना हम सभी देश वासियों के लिए एक विशेष अर्थ रखता है. हर साल हम अपनी आज़ादी की सालगिरह पन्द्रह अगस्त के दिन मानते हैं. इस बार उल्टा तीर एक नए ज़ज्बे से देश की आज़ादी के इस महा पर्व को आप सभी के साथ एक नए अंदाज़ में मनाने का अभिलाषी है. "एक चिट्ठी देश के नाम..." इस सिलसिलें में हम और आप मिलकर लिखेंगे एक चिट्ठी अपने प्यारे देश के नाम. इस में आप अपनी अभिव्यक्ति किसी भी विधा में कर सकते हैं।

आज की तारीख में "एक चिट्ठी देश के नाम" लिखना एक अनोखा और अलहदा अनुभव व् अहसास हो सकता है. प्रायः यह पुरानी बातें हो चलीं हैं जब हम खातो-किताबत करते थे, देश , गाँव, शहर से दूर अपने माता-पिता, भाई-बहिन, दोस्त या फिर प्रेमी-प्रेमिका को चिट्ठी लिखना होता था...आज चीज़ों में काफी परिवर्तन आ चुका है, इनसबके तरीकों में बदलाव आया है...बिरले ही सही मग़र आज भी बहुत से लोग खातो-किताबत का सिलसिला रखते हैं...और भी कि चिट्ठी लिखना अपने मन की बात कहना भी है...इसी कड़ी में उल्टा तीर आप सभी से अपने प्यारे देश के लिए १५ अगस्त के महा पर्व पर चिट्ठी लिखने के लिए अपील करता है।

तो लिख भेजिए अपने देश के नाम इक़ चिट्ठी- कह दीजिये इस बार अपने दिल की बात जो भी कहना चाहते हों अपने देश से आप.

हमें आपकी चिट्ठियों का १४ अगस्त तक इंतज़ार रहेगा. अपने बारे में सक्षित परिचय व अपने एक तस्वीर के साथ उल्टा तीर को भेज दीजिये "एक चिठ्ठी देश के नाम"

१५ अगस्त को हम आपके पत्रों से चुनी हुई चिट्ठियाँ उल्टा तीर पर प्रकाशित करेंगे! एक बार फिर आपसे अनुरोध है अपनी चिट्ठी हमें १४ अग्स्त २००९ से पहले E-mail: ultateer@gmail.com, ocean4love@gmail.com पर लिख भेजें।

*-*-*
१५ अगस्त के बाद "उल्टा तीर" फ़िर से लौट रहा है सामाजिक, राजनैतिक उन सभी मुद्दों पर बात करने के लिए जिन पर बहस अभी वाकी है मेरे दोस्त...इस बारगी उल्टा तीर पर कुछ नई रोचक चीज़ें होंगी वहीं कुछ ऐसे प्रावधान जो पाठकों, लेखकों को उल्टा तीर से और भी मजबूती से जोडेंगे ताकि हम सब एक ताकत बन सकें, एक सार्थक कदम उठा सकें, बुराई के ख़िलाफ़ चल सकें, झूंठ जैसे जिंदगी को अपने जीवन से निकाल सकें, सच को अपना सकें, सच और अच्छाई का आचरण अपने जीवन में ला सकें, बे-मानी की नियति ख़ुद के अन्दर से मिटा सकें, इमानदारी को बचा सकें अपने समाज व् देश को नया हिन्दुस्तां बना सकें! इक़ नए जोश के साथ उल्टा तीर करेगा बात हम सबकी, समाज की देश की...चाहिए बस आपका सहयोग, ताकि बन सकें हम बेहतर! उल्टा तीर आपके रचनात्मक व्यवहारिक सहयोग की अपेक्षा करता हैकृपया हमें अपने सुझाव लिख भेजें आभार; उल्टा तीर
"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका 8th march Binny Binny Sharma DGP Domestic Violence Debate-2- FWB Friends With Benefits SHADI PAR BAHAS amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage dharm ya jaati dongre ke 7 fere festival friendship ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के १५ अगस्त

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)