देश के अमीर कर्णधार और भी अमीर होने में बुराई नहीं समझते मगर देश की भूखी और लाचार जनता यह जरूर समझती है कि भूख और बीमारी से जाती हुई लाखों जानें कर्णधारों की तरल रहनुमाई से मुक्ति पा सकतीं हैं. विकासशील भारत के खांचे में बेरोजगारी से जूझ रहे देश की एक बड़ी ताकत यानी युवा को और भी बेरोजगार बनाने की कवायद भी सरकार चाहे-अनचाहे कर रही है. निचले स्तर पर कूड़ा उठाने से लेकर, सडकों पर झाडू लगाने तक का काम लाखों, कारोनों रुपयों की कीमती मशीनों से किया जा रहा है. क्या यह भूख और बीमारी, रोजगारी से जूझ रहा गरीब और पिछडा तबका और भी गरीब और लाचार होकर वक़्त से पहले ही अपनी जान नहीं छोड़ देगा या फिर वो किसी गैर कानूनी गतिविधि से अपना पेट पालने की कोशिश करेगा ? अंततः पिसेगा तो गरीब ही! जिस देश के कर्णधारों की दुनिया पैसों और सत्ता के खेल पर लचर हो गई है उसे किसी भी तरह से हमें ही संवारना होगा! देश के बहुत अहम् मुद्दों पर उबलती, रोती-सिसकती मगर जग उठने की प्रेरणा देती यह चिट्ठी उल्टा तीर को [जसवंती पंवार] ने भेजी है. पढें और शामिल हों एक नए भारत के निर्माण में. यह देश है वीर जवानों का, मस्तानो का, अलबेलों का इस देश का यारो क्या कहना? मै कभी इन पंक्तियों पर विश्वास करती थी. आज ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आता, आता भी है तो लोगो की दौलत की भूख नज़र आती है जिसे अपने देश के कर्णधार यानि नेता और अभिनेता सभी केवल उनको यही कहते है कि अमीर होने में कोई बुराई नहीं है जबकि उन्हें ये भी पता है कि देश में लाखो -करोडो लोग रोज़ गरीबी के कारण भूखे रह जाते है अथवा किसी बीमारी से मर जाते है और मान -सम्मान को बेच कर जिन्दा है?
ये कुछ भावनाए है मेरी शायद आज ये केवल मेरी जैसे कुछ लोगो की रह गयी हो जो ये सोचते है कि देश और सवतंत्र देश मै क्या फर्क होता है? आज हम पर कोई विदेशी राज नहीं कर रहा और ना ही कोई राजे- रजवाडे लकिन आज भी हमारे अधिकांश नेता आज उन्ही परिवार के लोग है और यदि किसी जन -जागरण या संविधान के कारण कहीं कोई रंक मंत्री या मुख्यमंत्री बना भी है तो उसे भी उन्हें पैसे के लालच ने जकड दिया है. इसके अनेक उदाहरण आज की राजनीती में स्पष्ट दिखाई देते है. जब कोई नेता अपने पूरे समाज से चंदा मांगता-मांगती है.
बड़ी -बड़ी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संगठन आज बेरोजगार लोगो की और आँखे मूंदे हुए है. उन्हें मशीनो पर भरोसा है
इनसानों पर नहीं. इनको तो अगर छोड भी दे तो आज जनकल्याणकारी सरकारी संगठन और सरकारे भी ऐसी ही नीतियों पर जनता का पैसा खर्च कर रही है. आज ही अखबार के द्वारा मालूम हुआ की मेट्रो जिस पर दिल्ली गर्व कर रही है उसमे भी स्वचलित मशीने लगाई जा रही है. टिकेट काटने के लिए इससे वह मानवीय कर्मचारी की लागत घटा रही है.लिखना तो बहुत कुछ लकिन शायद आप पूरा पड़ने मै संकोच करे इसलिए केवल इतना ही कहना है कि देश तो आजाद ६२ वर्ष पूर्व अंग्रेजो से हो गया लकिन मानव शायद ही कभी आजाद हो पाए.
आपको भी पता है कि देश में आरक्षण, जातिवाद, अल्पसंख्यक, लोगो के बहाने देश को बाटने में लगे हुए कुछ लोग ही देश पर राज करते है. वह या तो भीड़ के द्वारा नहीं तो कुछ ताकतवर लोगो के द्वारा ही नियंत्रित है. जिस दिन देश में हर इंसान का बराबर दर्जा होगा वह दिन या तो दुनिया का अंतिम दिन होगा या फिर सतयुग का आरम्भ.
आपको स्वतंत्रता दिवस और श्री कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाये।
आपको हिन्दी में लिखता देख गर्वित हूँ.
जवाब देंहटाएंभाषा की सेवा एवं उसके प्रसार के लिये आपके योगदान हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ.
गरीब और आमिर के बीच संघर्ष जीवन की सच्चाई है इससे कोई भी मुख नहीं मोड़ सकता लकिन इतना तो सरकार जो अपने आप को लोकतान्त्रिक सरकार कहती उसका फ़र्ज़ है की वो समाज के प्रत्येक व्यकित को बगैर जात-पात और धर्म अथवा किसी भी भेद के बगैर सम्मानजनक जीवन को मौका दे नहीं तो देश मे बड़ते नक्सलवाद को कभी भी काबू नहीं किया जा सकता बल्कि एक बार फिर साम्यवाद नए रूप मे हमारे बीच होगा और इस बार अपने सबसे खतरनाक रूप मे
जवाब देंहटाएंलेखिका ने हमे सावधान किया है