* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. सधन्यवाद.
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गुरुवार, 12 जून 2008

आ गई नयी बहस !!



"उल्टा तीर पर एक और साहसिक बहस"


जड़ता-मूढ़ता में जकडे हमारे भारतीय समाज को उल्टा तीर की एक और चुनौती। उत्तेजक बहस के इस मंच पर बहस का एक और जलजला। इस बार की बहस समलैंगिकता पर" क्या परदों में बंद समलैंगिक रिश्तों को समाज स्वीकृति दे दे ?" इस बार उल्टा तीर पर समाज में तेज़ी से बढ़ रहे इस चलन पर पूरे महीने बेबाक चर्चा और बहस। बहस में भाग लीजिए। अपने विचार खुल कर रखिये, क्योंकि बहस शुरू हो चुकी है मेरे दोस्त

आपका;
अमित के सागर
(उल्टा तीर)

65 टिप्‍पणियां:

  1. समलेंगिक रिश्तों को समाज की स्वीकृति कभी नहीं मिलनी चाहिए. जो समाज इस की स्वीकृति देगा टूट कर बिखर जायेगा. समलेंगिक रिश्ते अप्राकृतिक हैं. पुरूष और नारी के शरीर की संरचना ही प्राकृतिक शारीरिक संबंधों के लिए की गई है. पुरूष-पुरूष और नारी-नारी शारीरिक सम्बन्ध प्रकृति के विरुद्ध हैं.

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  2. समलैंगिक रिश्तों के बारे में सोचना भी गलत है स्वीकृति की तो बात ही नहीं आती है समलैंगिक सम्बंध रखने वाले युवक किसी के साथ प्रेम नहीं, बल्कि जितने अधिक शारीरिक सम्बंध हो सकते हैं सिर्फ वही खोजते हैं

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  3. सम्पूर्ण विश्व में इस मसले पर बात चल रही है मेरा मत है की यह प्रकृति के विरुद्ध है
    ऐसे शरीर सुख के लिए वर्जना ज़रूरी है.

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  4. अमित जी आपके ब्लोग पर एक नयी बहस देखकर अच्छा लगा लकिन मुद्दा कुछ सही नहीं लगा ये अगर सच भी है तो ऐसी सच्चाई लोगो से छुपी होनी चाहिए ये लोगो की पराक्रतिक संबंधो से दूर ले जाने की मानसिकता नज़र आती है इससे समाज का विनास निशचित है अगर आप को सवयम ऐसे कीसी व्यकित विशेष का पता हो तो उसे नर और नारी के सुन्दर संबंधो की और प्रेरित कर
    धन्यवाद

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  5. यह एक नयी बहस है। इसपर खुलकर विचार होना चाहिए।

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    1. SAMLANGIK SAMBANDH BANANA BILKUL GALAT HE. YE NATURE K NIYAM K KHILAF HE, AISE SAMBANDHO KO SAMAJ KABHI BHI BHEE SVIKAR NAHI KAREGA.

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  6. दरअसल मेडिकल field मे इसे एक sexual disorder माना गया है .ओर ये सामान्य प्रकति के विरुद्ध भी है ..ओर समाज की संरचना के भी.....

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    1. दुनिया भर में हुए शोधों ने इसे मनोविकृति की श्रेणी से दशकों पूर्व हटा दिया. हम आज भी सही गलत के तर्कहीन और अवैज्ञानिक कारणों में उलझे इसे अप्राकृतिक और अनैतिकता के चश्मे से देख रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत दुनिया भर के शीर्ष संस्थाओ ने इसे लैगिक अभिमुखता का एक रूप माना है न कि मानसिक बीमारी ...

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    2. aap ek dermatologist hain, lekin medical science ke all in all nhi, kisi bhi well qualified psychiatrist se ja ke information le lena, wo bata dege apko, ki sexuality 4 types ki hoti hai, 1. asexuality,2. heterosexulity, 3. bisexuality, 4. homosexuality. homosexuality is as old as human being on this earth, it is the way of lifestyle.aap sirf isliye ise unnatural nhi kah sakte kyuki ye minority me hai, aur heterosexuality majority me hai, this is another dimension of life.
      i want to clear some true facts about homosexuality
      1. To be gay is not a choice, it is due to genetic constitution and DNA.
      2. gays are not bad people.
      3. gays are fertile males, not necessarily eunuchs and shemale.
      4. gays have also emotions and love feelings.

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  7. यह ऐसा विषय है जिस पर काफी चर्चा हो सकती है, हाल में ही हमारे यहॉं लोकल समाचार पत्र में भी इस पर एक कवर स्‍टोरी आई थी तब से मै इस पर काफी मैटर इक्‍कठा कर चुका हूं, गॉंव से लौटने के बाद जल्‍द प्रकाशित करूँगा।

    मै तो यही कहूँगा कि कहने में यह आम बात हो सकती है किन्‍तु यह परमाणु बम की भाति विस्‍फोटक है।

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  8. chliye ye chchi survat hai jis mudde se hum aadi kaal se muh phere huve the us par bahes achchi baat hai ..par abhi bhi hame is par najiriya badal na pade ga ..ek khuli soch se phir se dhyan dena hoga......ye ek manvik vekar hai ......apartik ......samlelnikta se kai bade bade naam jude ........ek achch paryash hai .....sukriya

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  9. आपका उल्टा तीर वाकई उल्टा चलता है,और विचारो को झिझोड के रख देता है पर क्या भारत मे अभी यह स्थिति है की हम इस पर विचार करे?हमारे देश मे अभी एक्का दुक्का प्रकरणों को छोड़कर व्यापक रूप नहीं लिया है की उस पर बहस की जाये,क्योकि किसी चीज को बहस का मुद्दा बनाने से लोगो मे उसको जानने के प्रति उत्सुकता बढेगी जो इसका प्रचार ही करेगी,हा पाश्चात्य देशो के लिए जरुर यह एक सार्थक मुद्दा है.

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  10. gay logo ki aapko duya milegi .aapne achha kam kiya hai sagar ji

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  11. ये एक ज्वलंत मुद्दा है ,शायद अब समय आ गया है की आब लोग आगे आयें और इस पे खुलकर बहस करें... सच कहूँ तो इश सम्लान्गिग्कता के मुद्दा को कुछ देर्र के लिए हम् छोरकर ये सोचें की क्या हमारा मनोस्तिथि उस स्तर पे पहुँच चूका है जहाँ से हम इस विषय पर चर्चा कर सकें...यदि नहीं तो कृपया हमें इस मुद्दे पर बात ही नहीं करनी चाहिए.... कुछ लोगों की टिपण्णी मैंने पढी है इस blogger पे....क्या जो बातें हमारे समाज में आरंभ से छुपी रही हैं उसे आज भी छुपाकर हम कहीं चोरी नहीं कर रहे हैं अपने आप से ??....सच बोलूं तो कुछ दिनों पहले मेरे भी विचार यही थे लेकिन मैंने NDTV के एक prgramme "शालाम जिन्दगी" को देखा और तब से सोच बदली है और आज कह सकता हूँ की ये बहस होनी चाहिए.... हमारा समाज !!!! ये किनसे बनता है?? क्या सिर्फ हम लोग जिनकी sexual orientation निर्धारित हो चुकी है? सायद नहीं......यदि एइसा होता तो इश्वर उन हिज्रों को नहीं बनता, जिनकी स्तिथि हमारी मानसिक विकृति के कारण बद से बदतर हुयी है....क्या हम मानवता को सिर्फ उसके मानव होने से नहीं तौल सकते हैं????
    यदि ये समाज की अस्मिता का सवाल है जिसके बाहर लोगों के सामने आने से हमारे समाज को ठेस पहुँचती है तो मैं कहूँगा की हमारी संस्कृति और इश्की अस्मिता hetrosexuality/homosexuality के आधार पे आजतक यूँ टिकी हुयी नहीं है|
    ये सच है की इश सम्लान्गिकता को यूँ अचानक से accept कर लेना आसान नहीं है परन्तु इशे समझना आवश्यक है | और किसी ने इसी ब्लॉगर पे कहा है की ये मेडिकल disorder है और जिन्होंने कहा है वो सेवा से doctor भी हैं| और जहाँ तक मैंने सुना और जाना है ये कुछ sexsual हारमोन के disorder के कारण एइसा होता है| जो भी हो, जहाँ तक मैंने जाना है की ये homosexual लोग दिल और दीमाग से कहीं बीमार नहीं होते...उनकी कार्य छमता साधारण लोगों की तरह ही होती है| अब मुझे लगता है की इस समाज के निर्माण में उनका भी उतना ही योगदान है जितना की औरों का|उनकी homosexuality समाज के निर्माण पे कोई खलल नहीं डाली आजतक| आज वो भी doctor, इंजिनियर,lawyer, और ADM, डीएम हैं| homosexual लोगों की अस्मिता खुलकर सामने नहीं आने से उनसे जुरे लोगों की जीवन बर्बाद हो रही है, इसका जीता जगता उदाहरण "राज पिप्ला के राजकुमार " हैं| जिसकी सेक्सुअलिटी छुपी होने से उनकी wife का जीवन दुविधा पूर्ण रहा और वो युवक भी घर से बेघर हुआ| जबकि वो एक अच्छा आदमी है| समाज में जो भी छुपा हुआ है वो एक नासूर की तरह है और वो जितना दिन दबा रहेगा वो घाव उतना ही जर बनाएगा....सो मैं तो कहता हूँ उशे बाहर आने दो और उसे accept करो ,यदि वो सच में गलत है तो वो ख़त्म हो जायेगा, क्यूंकि गलत के पाव छोटे होते हैं वो एक दिन थक जायेगा और दमम तोड़ देगा, पहले उसे चलने का हम मोका तो दें....हम तो उन्हें रोककर खुद ही अपने को चोर बना रहे हैं|

    मैं अपने भाई बहनो को याद दीला दूं की हमारे hindu धर्म में अर्धनारीश्वर की पूजा करते हैं|

    "किसी ने कहा है सब खुदा के मर्ज़ी पर निर्भर है , वो ही सबको बनाता है,
    कुछ भी उसकी मर्ज़ी से बाहर नहीं है, यदि उसकी मर्ज़ी न होती तो ये समलैंगिक भी नहीं होते"

    I am finishing my writing becoz it seem be so big though i hd to say many. :-)

    स्नेह सहीत
    सुमन रॉय

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  12. उल्टा तीर पर नयी बहस में आप सभी की प्रतिक्रियाओं विचारों का मैं दिल से इस्तकबाल करता हूँ. बहस का ये मंच आपका अपना मंच है इसलिए खुलकर लिखिए खुलकर अपनी बात रखिये आपके सभी विचारों का उल्टा तीर पर स्वागत है. उल्टा तीर पर अपनी राय प्रतिक्रियाएं लेख आदि भेजते रहिये .क्योंकि बहस अभी बाकी है मेरे दोस्त!!

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  13. यह बह्स बेमानी है, सागर जी !
    भावनात्मक जुड़ाव एक अलग चीज है, किंतु...
    अच्छा चलिये, किंतु परंतु छोड़ देते हैं, मुद्दे पर आते हैं ।
    केवल स्खलन सुख के लिये यह विकृति क्यों स्वीकार किया जाय ?
    अप्राकृतिकता का पहले ही हम क्या कम मुआवज़ा दे रहे हैं, कि इस विकृति की पैरवी की जाये ? जिनको हम जानवर कहते हैं, वह भी इससे परहेज़ करते देखे जा सकते हैं . फिर ? फिर ..आप जो भी राय बनायें वह ऎसा ही होगा जैसे 'पैसा आदमी की ज़रूरत है, तो फिर आपराधिक तरीके से धन कमाना भी ज़ायज़ होगा ?'

    हाँ, अभी तो माँ बहनों की इज़्ज़त की ही चिन्ता रहती है, तब भाई,बेटे के इज़्ज़त की भी गुहार लगानी पड़ेगी ! क्या कहते हैं, बाकी जन ?

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  14. dar-asal har aadmi apne matlab ki cheej khojkar uske liye apne faayde ke sidhdhanta gardh leta hai, kya aap samaaj me aise qanoon ko apni sahmati denge jisme hatya, balatkar aur taskari ko kuchh jurmana lekar legal bana diya jaaye, samlaingikta ko sweekar karna kuchh aisa hi hai

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  15. Bat itani halki nahi hai jitani
    sab log kah rhe hain.Samlangik sambandh nye nahi hai inka ullekh pahle bhi milta rha hai.Aap ek aurat se aprakrit sex karte hain,apni sharirik bhook ke liye use kai tariko se pratadit karte hai,tab kaisalah batne vali patrikayen isme koi kharabi nahi manti hai,yhan tak ki doctor bhi.aprakrit sex o aura ke sath ho ya purus ke sath ya to sahi hai ya galt hai.Ek ke liye sahi ya galt nahi ho sakta.Jab tak unke tark hamare samane nahi aate ki aise riste unhe kyon chahiye.Koi janm se aise riste nahi banata,yani yah bhi samaj ki den hai,jisme ham rahte hain aap rahte hain.Fir kahi n kahi hamari aap ki bhi galti hai.Blog parkitane log aise honge jo aise riston ke bare me bahoot karib se jante honge,ek ya do,Bahas unke bich nahi ho rahi hai jo aise sambandhoo ke himayati hain ya birodhi hai.Bahas jaise tisron ke bich ho rahi hai jo chay bhi fook fook kar pite hain,fir to ye bahas kafi garam hai.Yadi samne ka pachh rakhane vala hi nahi hai fir bahas ka koi mayene hi nahi hai.

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  16. SAWAL YE NAHI KI PARDON ME BAND SAMLAINGIK RISHTON KO SAMAAJ SWIKRITI DE YA NAHI, SAWAAL YE HAI KI KYA SAMLAINGIK RISHTEN HAMARE CULTURE AUR SOCIETY K ANUSAAR SAHI HAIN YA GALAT. SAMLAINGIK RISHTEN PARDE ME HO YA KHULE ME WO KISI BHI SOORAT ME SAHI NAHI HAI. HAME SABSE PAHLE KUCH BASIC CHEEZON PER DHYAAN DENE KI ZAROORAT HAI. JAISE "SHIKSHA". AAJ K DAUR ME SCHOOL ME JO SHIKSHA DE JA RAHI HAI WO US LEVEL KI NAHI HAI JO HONI CHAHIYE. AAJKAL UNIVERSITY SE NAVYUVAK BAHUT HE QABIL MAGAR PADHE LIKHE JAHIL BANKAR NIKAL RAHE HAIN, KYONKI UNIVERSITIES UNHE NAITIKTA KA KOI AADHAAR NAHI DE PA RAHI HAI JINKI UNHE BAHUT ZAROORAT HAI. AGAR HAMARI SHIKSHA K LEVEL HIGH HOGA AUR UNHE SIRF KITABI GYAN NA DEKAR UNHE EK ACCHA INSAAN BAN NE K LIYE SHIKSHA DE JAAYE TO HAMARE SAMAAJ ME IS TARAH KI BEEMAARIYAN PAIDA HE NAHI HONGI. TO IN RISHTON KO TO KYA AISE LOGON KO BHI SAMAAJ ME JAGAH NAHI MILNI CHAHIYE.

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  17. क्या आप किसी को रोक सकते हैं...????

    वैसे यह बहस के लिए आमंत्रण है या फिर रंगीन चित्र प्रदर्शनी

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  18. पहली बार इधर आया , पछतावा हुआ कि पहले किसी ने क्यों नहीं बताया .भाई बहुत सार्थक काम है ,जो कर रहे हो .

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  19. सागर शाहब आपने तो कमाल कर दिया

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  20. आख़िर ऐसे सम्बन्ध समाज को क्या दिशा देंगे? ये सम्बन्ध भी शारीरिक आकर्षण से उपजे हैं इनसे क्या और कैसा संदेश समाज में जाएगा यही लोग बता सकते हैं. क्या कहा जाए सब हवा का असर है.

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  21. Is vishey mai mai ye kehna chahata hu ki jo log ise aprakratik mante hai unhe pata hi nahi ki samlengigta praktratik hi hoti hai nature hi kisi vyakti ko nari purush ya samlengig banati hai is liye ye kehna ki ye samlengigta unnatural hai galat hai . Agar ise burai mana jaye to jarurat hai Iske karano ka pata lagaker precaution ki. vastav mai ek samlengig ka isme koi dosh nahi hota ise burai ki bajay ek viklangta kyu na mana jaye aor in logo ko sahanubhooti ke saath dekha jaye,samjha jaye.

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  22. कुछ्लोगों की टिपण्णी बड़ा ही आश्चर्य जनक मालूम होती हैं..... क्या समलैंगिक रिश्तों को समाज में छुपाने से ये सब ख़त्म हो जायेगा??? तब क्या समाज के भाई खतरा महसूस नहीं करेंगे??? मैंने एक भाई साहब की टिपण्णी पढ़ी जिसमें उन्होंने कहा की समलैंगिक रिश्ते बाहर आने से समाज में भाई भी खतरा महसूस करेंगे. :)
    और मेरा मानना है की ये समाज में छुपकर रहने से ज्यादा खतरा है| क्या समलैंगिकता ख़त्म की जा सकती है?? जहाँ तक मेरी जानकारी है , ये आदि काल से चली आ रही है|

    मैं भाई Prem prakash से सहमत हूँ| यदि ये गलत है तो हमें इशे कम या ख़त्म करने की सोचना चाहिए ना की इसे समाज में छुपाकर एक कोढ़ की तरह रखने की...मेरा मानना है की इससे लोगों(जो समलैंगिक हैं ) की मानसिक स्तर गीर रही औr वो हीन भावना के साथ जीने को मजबूर हैं, वो चाहकर भी बहार नहीं आ पाते हैं| हमें चाहिए की उनको अपने सामने स्नेह के साथ बैठने का मौका दें और उनकी बातें भी सुनें...आखिर कुछ तो मजबूरियां होंगी जिसके कारण वो heterosexual लाइफ नहीं जी पाते हैं..... जहाँ तक मेरा मानना है की समलैंगिक लोग सिर्फ sex के लिए आकर्षित नहीं होते होंगे... अभी sex के प्रति आकर्षण ज्यादा दिखाई देता है क्यूंकि वो अपनी भावना/Prem/स्नेह खुलकर नहीं दिखा सकते..... लोगों को sex ही क्यूँ ज्यादा दिखाई देता है???
    मेरा मानना है की एइसा इसलिए है क्यूंकि उनके सम्बन्ध समाज में मान्य नहीं हैं, जिसके कारण वो हमेशा एक नए सम्बन्ध के मिरग मरीचिका में फंसे रहते हैं.....
    मैं तो ये कहूँगा की उनके मुह्ह बंद करने से पहले उन्हें अपने पक्छ रखने का मौका दें ,उन्हें समझें...क्यूंकि जिन भाई-बहनों को लगता है की समलैंगिकता में खुलकर आने से समाज की अस्मिता ख़त्म हो जायेगी तो ये भी १०० प्रतिशत सच है की हमारे नहीं स्वीकारने के बाद भी समलैंगिक लोगों की उपस्थिति समाज में बनी रहेगी, बस अन्तेर ये होगा की नहीं स्वीकारने से उनसे ज्यादा दुसरे लोगों की स्थिति ज्यादा भयावह होगी| सामने आने से समाज को ज्यादा खतरा है तो छुपकर ज्यादा भयंकर स्तिथिति होगी| वो कहीं और से नहीं हैं हमारे ही भाई-बहनों में से हैं.. उन्हें समझें और यदि सच में गलत है तो उसे सुधारने की कोसिस करें न की उसे छुपाकर प्रश्रय देने की...

    गाँधी ने कहा था की:

    "नफ़रत चोरी से करो, चोरों से नहीं|ये बहोत ही दुःख भरी बात है की लोग चोरी करने को मजबूर हो जाते हैं"

    स्नेह सहीत
    सुमन Roy

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  23. जहाँ तक मेरा विचार है, समाज स्वतंत्र होना चाहिये मै ये नही कहता की सम्लैंगिक संबध उचित है, और सही बोलू तो मुझे और आप मे से कई लोगो तो इसके बारे मे सोच कर ही घृणा के भाव मन मे आ जाते होंगे, पर अधिकतर लोग (मै सबकी बात नही कर रहा) जो ऐसे संबधो मे शामिल होते है किसी प्रकार के यौन अक्रम से पीड़ित होते है । अपनी बात की मदद देने के लिय मै आपको इस Link पर जाने को कहुंगा ।

    http://en.wikipedia.org/wiki/Homosexuality#Why_some_people_are_gay_or_lesbian

    तो व्यवहार अगर ये किसी बीमारी की तरह किसी को अपने जन्म के समय ही मिला हो तो क्या उचित है की हम केवल समाज को ढाल बना कर उसकी जिंदगी का फैसला कर दे ? क्या ये उचित है की हम उनको जीवन की एक सबसे अच्छी अनुभूती से वंचित कर दे ।

    किसी मर्द या औरत जो इस विकार के साथ पैदा हुआ है उसे सही लिंग से संबघ बनाने के लिय जोर देना कुछ वैसा ही होगा जैसा कोई हमे समलैंगिग होने को कहे, उसके मन मे भी वैसे ही घृणा के भाव उठंगे जैसे ये बात सोच कर आपके मन मे उठ रहे है ।

    तो मेरे ख्याल से जब तक ये लोग समाज से छुप कर परदे के पीछे कुछ भी कर रहे हो इससे किसी को भी कोई फर्क पड़ने वाला, क्योकि मुझे नही लगता की किसी का भी लैंगिक-रुझान किसी के भी लैंगिक-रुझान पर फर्क डालता होगा,(आप ही सोचिये, क्या डाल सकता है), जो जैसा है वो वैसा ही रहेगा । ये दारु या सिगरेग जैसी लत नही ही की आने वाली पीड़ी देखा देखी सीख जाये ।
    तो अंत मे मै यही कहना चाहूंगा की समाज को थोड़ा खुले विचारो का होना चाहिये(इतना भी नही की ये लोग सड़क पर उतर आये) पर जब तक ये आपकी नजरो से दूर है आप को इन लोगो को भी अपने तरीके से जीने का हक देना चाहिये ।

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  24. समलेंगिक रिश्तों को समाज की स्वीकृति कभी नहीं मिलनी चाहिए. जो समाज इस की स्वीकृति देगा टूट कर बिखर जायेगा. समलेंगिक रिश्ते अप्राकृतिक हैं. पुरूष और नारी के शरीर की संरचना ही प्राकृतिक शारीरिक संबंधों के लिए की गई है.
    सुरेश गुप्ता जी से मैं सीधे सवाल पूछना चाहूंगी सुरेश जी समाज में गे और लेस्बियन की सामाजिक मान्यता के विचार में प्राक्रतिक या अप्रकर्तिक मैथुन के अलावा अन्य बिन्दुओं पर भी विचार करना होगा .क्योंकि कई बार ऐसा भी होता है कि भावनात्मक /मानसिक वजहों से भी नारी नारी से और पुरूष पुर्ष के प्रति आकर्शित होता है . वहीं आज तेजी से मेल फीमेल अनुपात में आए असंतुलन के कारण भी प्राकर्तिक रूप से ऐसे हालत बन रहे है .मेरी नज़र में सुरेश जी , गे लेस्बियन संबंधों के भावनात्मक कारण अधिक बजाय सेक्स सुख के . सुरेश जी मेरी बातों का जवाब देंगे तो अच्छा लगेगा

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  25. सुरेश गुप्ता जी की बात में दम दीखता है . उनके साथ पूरा समाज है .उनके विचार ने बहस को नया तेवर दिया है .वो उल्टा तीर पर एक मात्र सीधे तीरंदाज़ हैं .उनकी मैं दिल से इज्ज़त करती हूँ .वो बहस के मंच पर सबसे काबिल और ईमानदार साफगोई से बात रखने वाले वृद्ध हैं .उनकी उम्र और तजुर्बे को ध्यान में रखते हुए सुप्रिया का उनसे सीधे संवाद बचकाना लगता है सागर जी . आप भी कुछ भी कर देते हैं

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  26. समलैंगिक सम्बन्ध और हमारा समाज!
    बहस स्वकृति देने न देने की... ..मैं नही जनता कि कब से समाज में यह पनप रहा है... ..... हाँ जब से यह चर्चा विषय बना है तब से जानने कि कोशिश जरुर रही की कब से शुरुआत हुई ऐसे संबंधो की........ आज तक कोई संतोष जनक जबाब नही मिला..... हाँ ऐसे बहुत लोगों से जरुर मिला जो दबी जुबान ही सही मगर माना कि अपने जीवन में कभी न कभी वह समलैंगिक रहे हैं या अभी भी हैं.........
    यह कह देना कि ऐसे संबंधो को पुरी तरह से नकार देना चाहिए पूर्णतया ग़लत होगा.... क्या ऐसे सम्बन्ध किसी भी तरह समाज कि स्वकृति के मोहताज हैं? हमारे मना कर देने से क्या आज के बाद कभी समलैंगिक पैदा नही होंगे? अगर यह एक बीमारी है तो.. उसे छिपाना क्यो? छिपाने से बीमारी क्या ख़त्म हो जायेगी? दबाने से रोग बढ़ता है घटता नही.... अब वक्त आ गया है कि हम ऐसे लोगों को भी समाज का हिस्सा मानले...
    जो मेरी बात से इक्तेफाक नही मैं उनका ध्यान वेश्यावृत्ति कि तरफ़ दिलाना चौंगा... अज तक हमारे समाज ने इसे भी स्वकृति नही दी मगर सोनागाछी , G.B. Road.... का अस्तित्व क्यो है.....?
    हमारे झुठलाने से हकीक़त नही बदलती....

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  27. hello sir, kal maine apani tipni prakashit karne ki koshish ki magar aaj dekha to galti se wah benami tipni ki tarah post hua hai... atah aap use mere nam se prkashit kar den ya phir use hta den main punh ek aur tipni likh chhodunga...
    with regards
    rahul ranjan
    http://bhukjonhi.blogspot.com

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  28. सागाज जी, रिश्तों के संदर्भ मैं एक नया लेकिन सही मुद्दा चुना है. विज्ञान जिसे सेक्सुअल डिसआर्डर मानता है, वो सम्बन्ध आख़िर क्यूं बन जाते है. ये जानना जरूरी है. - आभार

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  29. सुप्रिया जी, जो रिश्ते अप्राकृतिक हैं उन पर किसी और रूप में विचार करने की कोई आवश्यकता है में ऐसा नहीं मानता. नारी की एक नारी और पुरूष की एक पुरूष के प्रति मैथुन के लिए आकर्षित होने की वजह चाहे भावनात्मक हो या मानसिक, मानव प्रकृति के अनुरूप नहीं है. मेल फीमेल अनुपात में आया असंतुलन भी आप्राकृतिक है. कारण कोई भी हो, जो सम्बन्ध आप्राकृतिक हैं उन्हें उचित ठहराना समाज में कुंठा को जन्म देना है. गे या लेस्बियन संबंधों में भावनात्मक कारण तो होंगे ही, लेकिन क्या ऐसे सम्बन्ध सेक्स सुख के बिना बन या टिक सकेंगे? यह मेरा अपना विचार है. में 'एक नारी के लिए एक पुरूष' के सिद्धांत को मानता हूँ. विवाह से पहले शारीरिक संबंधों को में ग़लत मानता हूँ. इसी प्रकार विवाह के बाद किसी गैर स्त्री या पुरूष से शारीरिक सम्बन्ध भी मैं ग़लत मानता हूँ. सेक्स एक सीमा के अन्दर ही होना चाहिए. सीमा से बाहर जाकर वह एक अपराध हो जाता है. आज का समाज सेक्स अपराधों से इतना ग्रसित हो गया है कि बेटी बाप से भी सुरक्षित नहीं है. हम अगर एक अपराध रहित समाज की रचना करना चाहते हैं तब हमें सेक्स को सीमा के अंदर लाकर उसे प्राकृतिक रूप देना होगा.

    नैना जी, आपकी टिपण्णी के लिए आपका धन्यवाद. किसी भी बहस में विचारों का आदान-प्रदान बहुत महत्वपूर्ण है, और यह सीधी-साफ़ बात कह कर किया जाना चाहिह्ये. मेरी हमेशा यही कोशिश रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  30. जब ये ब्लॉग मैंने पड़ा था तो सोचा भी न था की इस पर इस कदर लोग अपनी विचार व्यक्त करेगे और मैंने कहा था की इस तरह के सम्बन्ध समाज मैं न हो और अगर हो तो छुपे ही रहे लेकिन कुछ लोग ने इस बात को गलत तरीके से लिया
    जैसे
    सुमन रोय जो बताते है की इस तरह के लोग न केवल डॉक्टर, इन्जीनियर, वकील, डीएम और राजनेता है उनकी कार्य छमता हम लोगों की तरह ही होती है | ये समलैंगिक लोग दिल और दीमाग से कहीं बीमार नहीं होते तो क्या हत्या ,बलात्कार ,चोरी और देशद्रोही जैसे लोगो की छमता हम लोगों से कम होती है आजकल ये लोग अच्छे खास पढ़े-लिखे होते है आम आदमी ही हर जगह पीछे होता है और उसे ही समाज का निर्माण करना होता है और मैं यह बताना चाहूँगा की सुधारा उसे जाता है जो अपनी गलती मान लेता है
    एक और बेनामी मोहदय है जो कहते है की वेश्यावृत्ति को भी समाज ने मान्यता नहीं दी तब क्या वेश्यावृत्ति को ख़त्म किया जा सका लेकिन मोहदय यदि ऐसा नहीं भी है तो फिर क्या वेश्यावृत्ति करने और करनेवाले फख्र से तो ये नहीं कहते की मैं मर्द को ओरत और ओरतो को मर्द उपलब्द कराता हूँ
    मनस्वी जी तो ऐसे संबधो मे शामिल लोगो को जन्मजात बीमार बताते है और कहते हैजो की जो जैसा है वो वैसा ही रहेगा और कहते है की ये दारू, सिगरेट जैसी लत नही ही की आने वाली पीड़ी देखा देखी सीख जाये ।तो इनको माया जी की बात समझनी चाहिए की किसी चीज को मुद्दा बनाने से लोगो मे उसको जानने के प्रति उत्सुकता बढेगी जो इसका प्रचार ही करेगी,
    सुप्रिया जी को देखो कहती है की ओरत और मर्द अनुपात में आए असंतुलन के कारण भी प्राकर्तिक रूप से ऐसे हालत बन रहे है तो क्या ओरतो को पुरषों का साथ नहीं मिल
    रहा है जो वो भी समलैंगिक रिश्ते बना रही है बचकाना बात है
    मैं सहमत हूँ सुरेश गुप्ता डॉक्टर अमर कुमार जैसे लोगो से नारी और पुरष के सुन्दर संबंधो की जितनी भी तारीफ की जाये कम ही होगी ऐसा मैं इसलिए भी कह रहा हूँ क्युकि मैं चाहूगा की हर ओरत और मर्द को विपरीत लिंग का साथ मीले. नारी की एक नारी और पुरूष की एक पुरूष के प्रति मैथुन के लिए आकर्षित होने की वजह चाहे भावनात्मक हो या मानसिक, या केवल केवल स्खलन सुख के लिये .सेक्स एक सीमा के अन्दर ही होना चाहिए. विवाह से पहले शारीरिक संबंधों ,विवाह के बाद किसी गैर स्त्री या पुरूष से संबंधो को गलत मानता हूँ आज का समाज सेक्स अपराधों से इतना ग्रसित हो गया है कि माँ ,बहनों ,भाई,बेटे की इज़्ज़त की चिन्ता रहती है
    ऐसे लोगो को नर और नारी के सुन्दर संबंधो की और प्रेरित करे और ऐसे कीर्त्य से दूर रखने का भरसक पर्यतन करे हो सके तो जिस तरह बच्चो को शारीरिक संबंधो के विषय मैं नहीं बताया जाता उसी तरह ऐशे संबंधो को भी छुपाया जाये

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  31. अगर एक अपराध रहित समाज की रचना करना चाहते हैं तब हमें सेक्स को सीमा के अंदर लाकर उसे प्राकृतिक रूप देना होगा. ***(सुरेश गुप्ता)

    सुरेश गुप्ता जी ,समलैंगिंक रिश्तों को केवल सेक्स के चश्मे से ही देख रहे है .जो पूरी तरह सच हो ही नही सकता ,समाज में आज बदलाव त्रीव गति से हुए हैं . समाज बदला है और समाज में लोगों की मानसिकता में भी बदलाव आया है .इसी के चलते समाज सेक्स के आलावा भी अन्य चीज़ों पे समाज का फोकस बढ़ा है . ये बिल्कुल सहज है की एक पुरूष की पुरूष में रूचि हो और एक महिला की महिला में रूचि हो सकती है. ये इसलिए भी सहज है क्योंकि कई बार ऐसा भी हो सकता है किसी महिला का पुरूष जाति से या पुरूष का महिला जाति से ही भरोसा उठ जाए .तब सुरेश जी ऐसे संबंधों को आप सेक्स के चश्मे से ही देह्खेंगे ?मेरा आप से सीधा सवाल है .आप इस बहस के दूसरे पह्लुयों पर बोलने से क्यों कतरा रहे है .मैं नही जानती .रही बात नैना जी की तो वो कभी इस बहस को अच्छा कहती है तो कभी इस बहस में घोर पारंपरिक हो जाति है .इस बहस पर मैंने जितने भी कमेन्ट पढे हैं उनमे नैना जी की टीपों पर सतत विरोधाभास है .इसलिए मैं उनकी चर्चा नही करना चाहूंगी . सुरेशजी मेरे भी बुजुर्ग है उनकी उम्र का मैं पुरा सम्मान करती हूँ लेकिन इस मुद्दे पर उनकी राय से मेरी भिन्नता बनी रहेगी .क्योंकि मैं ये मानती हूँ कि मानवीय अधिकारों की तरह इन रिश्तों को भी समाज मान्यता दे दे ये ज़रूरी उनके लिए जो वाकई में इससे दो चार हो रहे हैं .पूरी दुनिया में आज समलैंगिको की तादात बढ़ती जा रही है भारत में भी अब खुलकर सामने आ रहे है .सुरेश जी ऐसे लोग कहाँ जाए ? क्या हमारा समाज इतनी उदारता भी नही रखता कि ये लोग आज़ादी से फक्र से अपना जीवन जी सके .आख़िर जीवन को जीने के तरीके आदमी को ख़ुद ही तय करने दीजिए .आदमी को आज़ादी से ये अधिकार दीजिए कि वो अपनी तरह से जीवन जीये . ये लोग समाज कि सहानभूति के नही बल्कि सहयोग के पात्र है .सुरेश जी उदारता से सोचिये ,क्योंकि समाज के बहुत से क्रिएटिव लोग गे लेस्बियन हैं .ये केवल सेक्स का मसला नही है .ये लोग कोमल मन के हैं ज़रा ये बात तो समझिये .नमस्कार !!

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  32. बहस स्वकृति देने न देने की... ..मैं नही जनता कि कब से समाज में यह पनप रहा है... ..... हाँ जब से यह चर्चा विषय बना है तब से जानने कि कोशिश जरुर रही की कब से शुरुआत हुई ऐसे संबंधो की........ आज तक कोई संतोष जनक जबाब नही मिला..... हाँ ऐसे बहुत लोगों से जरुर मिला जो दबी जुबान ही सही मगर माना कि अपने जीवन में कभी न कभी वह समलैंगिक रहे हैं या अभी भी हैं.........
    यह कह देना कि ऐसे संबंधो को पुरी तरह से नकार देना चाहिए पूर्णतया ग़लत होगा.... क्या ऐसे सम्बन्ध किसी भी तरह समाज कि स्वकृति के मोहताज हैं? हमारे मना कर देने से क्या आज के बाद कभी समलैंगिक पैदा नही होंगे? अगर यह एक बीमारी है तो.. उसे छिपाना क्यो? छिपाने से बीमारी क्या ख़त्म हो जायेगी? दबाने से रोग बढ़ता है घटता नही.... अब वक्त आ गया है कि हम ऐसे लोगों को भी समाज का हिस्सा मानले...
    जो मेरी बात से इक्तेफाक नही मैं उनका ध्यान वेश्यावृत्ति कि तरफ़ दिलाना चौंगा... अज तक हमारे समाज ने इसे भी स्वकृति नही दी मगर सोनागाछी , G.B. Road.... का अस्तित्व क्यो है.....?
    हमारे झुठलाने से हकीक़त नही बदलती....

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  33. सुप्रिया जी की बात से मैं सहमत हूँ .आप सही कह रहीं है सुप्रिया जी सुरेशजी को इस बारें में अपना नजरिया बदलना ही चाहिए .लेकिन फ़िर भी मुझे लगता है कहीं ये हमारे पूरे समाज को बरबाद
    न कर दे???क्योंकि समाज के बहुत से क्रिएटिव लोग गे लेस्बियन हैं .ये केवल सेक्स का मसला नही है .ये लोग कोमल मन के हैं ज़रा ये बात तो समझिये ..इस बात पर अभी और सोचा जा सकता है .बहस के माडरेटर भी कुछ कहेंगे ?क्या उनकी कोई भी सोच नही है इस मुद्दे पर .?????सुरेशजी आपका और सुप्रियाजी का बहुत बहुत शुक्रिया आपने इस मुद्दे को नई विमा दी.पर न जाने क्यों ऐसा लगता है बहस के माडरेटर इससे खु कुछ कहने से बच रहे हैं .उनकी चुप्पी अखरती है सागर जी कुछ आप भी तो कहो

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  34. सुप्रिया जी और नैना जी,
    आज जिन सम्लेंगिक रिश्तों की बात की जा रही है उनमें सेक्स प्रधान है, वरना क्या पुरूष और पुरूष तथा नारी और नारी में मित्रता नहीं होती? बिना सेक्स के सम्लेंगिक रिश्तों पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई क्योंकि उस की आवश्यकता ही नहीं पड़ी. यह रिश्ते प्राकृतिक हैं. किसी कारण से भी दो इंसान सम्लेंगिक रिश्ता बनाते हों वह सेक्स आते ही अप्राकृतिक हो जाता है. जब तक उस में सेक्स नहीं आता वह प्राकृतिक रहता है.

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  35. Nice blog for discussions...

    Well about HomoSexuality, it is not acceptable. Against the Nature ofcourse. But on the other hand, liberty is a right to every human. So, It is very hard to stop such people.

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  36. Bahas to bahas hi hai, iska nirnayak koun hai, who will judge ??? jo bat apne rakhi wah mahatva parak ho sakti hai aur sanyogik bhi par jis tarah apne chitra lagaakar is mahima mandit kiya hai lagta hai, aap bhi kisi na kisi tarah ke mansik sukh ke lie logo ko lada rahe hain bas, apka e-mail mere google account me aya aur me usko follow karta hua yahan aa pahuncha. is mudde se pahle aap ko ek aur mudde se gujrana tha wo hai, ekantwad, aj kai yuva /yuvi shadi karna hi nahi chahte, Kyun???? kher mudda jo bhi ho usse vicharon se sajayen, ashlil chitron se nahi.

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  37. समलैंगिक सम्बन्ध पूर्ण रूप से अप्राकृतिक , अस्वस्थ और असामाजिक है . हम सभी से मिल कर समाज बनता है और हम सभी उस समाज का एक अभिन्न अंग होने के कारण उसके नियमो का पालन करना हमारा कर्त्तव्य है. यदि आज हमने समलैंगिक रिश्तो को मौन स्वीकृति दे दी तोह वह दिन दूर नहीं जब बाल - यौन संबंधो के जायज ठहराए जाने के लिए भी आवाज उठने लगेंगी...

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  38. sagar jee
    apne es subject ko chuna, thanks. magar hum yeh bhe jante hain ke gandagi mai jetna danda marange to utne he gandh uthage. aise subject par to kese bhe news paper, news channel OR blogs par koe bhe news telecast nahe hone chahey aur na he telecast hone chahey. ham log khud he eske publicity kas rahe hain. aise subject ko band kar dena asha rahega, aap kya kahate hain?

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  39. समलैंगिक रिश्ते प्राकृतिक क्यों नहीं? यह हर समाज में पाए जाते हैं. और सच्चे प्यार का विरोध कैसे करे समाज?

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  40. sam langik sambando ko kabhi bhi manyata pradan nahi kija sakti koy ki ye ke annutural sex sambnad jise privar naam ka anat hi ho jayga jis par ki sansar chalta hai

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  41. Main iska pakshdhar hoon.

    Kyon ki is se population nahi badhegi. :P

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  42. jo log samlaingikta ko hindu dharma sanskrtee ke khilaf bata rahe hain unhe sayad maloom nahi ki iska jikra kamsutra aur khajuraho me bhi milta hai

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  43. सुरेश गुप्ता जी की बात ठीक ही है, वास्तव में तो ये रिश्ते सदा से ही समाज में हैं ,परन्तु चोरी ,ह्त्या आदि भी सदा से हैं ,तो क्या उन्हें स्वीकृति देदेनी चाहिये ? कदापि नहीं | यह व्यक्ति-समाज की विशिष्ट मानसिक अस्वस्थता है,अतः समाज को स्वयं इसे खारिज करना चाहिए , कानून का कोइ दखल नहीं होना चाहिए |

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  44. राजीव न भी सही कहा , गन्दगी को क्यों उछाला जाय , बढ़ती है, जो सामान्य -मस्तिष्क नहीं है उसे वैसे ही छोड़ देना चाहिए ,आखिर उन्हें मान्यता के क्या आवश्यकता है , ये प्रश्न उठा ही क्यों ? एक दिन बलात्कार को भी उचित ठहराने की बात उठाने लगेगी | ये पश्चिमी मूर्ख, अनैतिक ,असांस्कृतिक , अज्ञानी समाज का विवाद है | इस पर तो बहस भी नहीं होनी चाहिए |

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  45. i am agree that same sex is from thousand years back and, in animal also have same feelings, because god create in this world,why we should aginst that, you look old temple any aprt of india , you will find pic or some carving pic on temple wall about same sex.. who we are agianst it.... think twice before you agianst it....

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  46. Bhaiyon or Behno...mujhe ye samajh me nahi aa raha ki kuch log is baat se sahmat kyun nahi hai ki gays or lesbians aam aadmi hain aur unko bhi apne adhikar ka utna hi haq hai jitna ki aap logon ko aur humko. Khajuraho mein jakar wahaan ki murtiyon ko dhyan se dekhiye aur tab aap logon ko pata chalega ki ye rishte sadiyon se bharat me pale hain. Aap inko minorty nahi keh sakte. Na hi inko mansik rogi. Inhe bhi bhagwan ne banaya hai. Aakhir bhagwan Vishnu ne bhi nari bankar rakchason ko sammohit kiya tha na. Kyun wo samaj ke khilaaf nahi tha, jahaan ek purush mahila ka vesh dharan kar puruson ko yaun kriya se sammohit kara raha hai. Kisi bhi medical science ne ye nahi Kaha hai ki Gays or Lesbians mansik rogi hote hain. Agar aapko yakeen nahin to western deshon mein jake dekhiye aur aap sabhi ko proof mil jayega ka ki wo aam insaan ki tarah hi shaksham hain.Jahaan tak unlogon ki baat hai mujhe ye samajh menahi aata ki jab baar SEX ki aati hai to ahamara padha likha samaj ise ghrina ki nazron se kyun dekhta hai. Kyun aap sex nahi karte ye aap sabhi bramhachari hain.Hamara Desh HIV ke patient ki ginti me number one hai. Aur hum ab bhi in dakiyanusi khayalon lo le kar baithe hue hain. Aap me se koi doctor hai to koi kisi aur profession hain. aap sabki sexual prefernce hain. Aap me se sabhi ko mauka mile to ek baar porn jaroor dekhenge chahe jis umra ke hon aap. Aur ye baat hum sab pe lagu hoti hai. Agrez kamasutra ko hamari heritage mante hain. Aur phir bhi anpadh ganwaron ki tarah aaplog bate kar rahe hai.Main awashya chahoonga ki Gays or Lesbians ko samaj me khul ke rehne ka utna hi adhikar hai jitna ki hum sabkio. Kabhi akar aapki sexual life ke bare mein puche to aapko bahut bura lagega. Sochiye unlogon pe kya biti hogi jo iska roj samna karte hain. Log apna kaam to thik se karte nahin.Par in bekaar ki baton mein jam ke yogdan karne ki koshihs karte hain.Hamre me samaj mein isse jyada bade issues hain jaise ki bhrastachar, berojgari..unpe to aaplog koi kadam lenge nahin. Aap sabhi padhe likhe ganawaron ki category mein aate hain jo samlaingik rishton ko nahi mante...

    उत्तर देंहटाएं
  47. mere hisaab se sex samlengik bilkul sahi he kyoki jis men ko women ka pyar nahi milta or jis women ko men ka pyaar nahi milta vo yahi kaam kare men men ka sath de or women women ka sath de samjhe

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  48. ati kare so haani hoie..

    samlaigik kyon banta hai insan kyonki usko galat vatavaran milta hai... isliye pure , pavitra environment rakhenge aur condum ki advertisement , paper me nangi tasvire , nangi filmo par rok lagegi to ye samlaigikta ka rog bhi khatma ho jaenga..

    bhukh badhakar aap kisi ko bhukha nahi rakh sakte aur isliye kamukta ka vatavaran khatma karna chahiye .. adhyatma ka vatavaran jaha hoga.. waha ye rog nahi aayenga..

    AAJ JARURAT HAI MANAV KO ADHYATMIK UPCHAR KI
    SANSKAR HI EKMATRA AUSHADI IS VYAKUL SANSAAR KI
    BHOGWAD NE BHAUTIKTA KA MAAPDAND APNAYA HAI
    MANVIYA MULYO KO AAJ BILKUL HAMNE BHULAYA HAI
    SAMAJH LIYA SADHAN KO SAB KUCH KINTU SADHYA KO BHULE HUM
    AUR MURKHATA KO CHATURAI SAMAJH BUDDHI PAR FULE HU.

    jad ko kata , dangali ko nahi..

    उत्तर देंहटाएं
  49. diniya me sab se bada paap hai "chori" kyunki jab aap kisise kuch churate hai to aap uske huk to chinte hai ....jase jab aap kisi ki hatya karte hai to aap uski jindgi churate hai ....kisi ke saath hinsa karte hai to uske chain ke saath rahne ka haq churate hai ....is drasti se dekha jaaye jo homosexual log hetrosexual logo ke kise haq ko nahi dabate ....ye mat samajhiyega ki aap ka bhai ya aap ka beta shadisuda ho gaya hai to wo staright hai kyun ki 99% gay log shaddi kar lete hai samajh ke liye ....2 minute ka sex karke santaan bhi paida ho jati hai lekin wo jindagi bhar andar hi andar kuch man me bhari duvidha chupaye rahte hai jo haal behaal chori chupe samlangik risto ke rup me saamne aa jati hai ....but chunki sab chor chupe karna hota hai janne anjaan wo ek apraadh kar lete hai chori chupe sex karne ka ....me aap sabhi se puchta hu aap kya is tarike ke apraadh ko badne ka mouka dena chahege ye ...unki bhawanayon ko samajh ke unhe aprradh mukt jeevan jine me sahyog karege ?

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  50. सबसे पहले स्ट्रेट लोगो को समलैंगिक लोगो ले प्रति नफरत का भाव छोर देना चाहिए...समलैंगिक न तो बलात्कारी हैं और न बाल शोषण के अपराधी...इस दुनिया में कुछ भी अप्राकर्तिक नहीं है, सब कुछ प्रकृति ने ही बनाया है, इश्वर ने ही बनाया है.....प्रकृति में ही व्याप्त है, बहार से कुछ नहीं आया..इसलिए यह भी प्राकर्तिक ही है . ....कोई अपनी मर्जी से समलैंगिक नहीं होता ..या उस से उम्र के एक पड़ाव पर यह नहीं पुछा जाता की क्या तुम समलैंगिक बनना चाहते हो ? यह तो प्राकर्तिक ही है की प्राकृतिक हारमोंस या विपरीत सेक्स के प्रति अपने आप आकर्षण पैदा होता है....लेकिन प्रकृति हमेशा एक तरह से काम नहीं करती...कभी कभी वेह भी अपनी दिशा बदल लेती है... समलैंगिक समुदाय को लोग किन्नर या समलिंगी बलात्कार या बाल शोषण से जोड़ कर देखते हैं, कुछ तो यह सोचते हैं की यह पल भर की वासना को तृप्त करने का एक सस्ता तरीका है...जबकि ऐसा नहीं है....यह भी उतना पवित्र है जैसे एक पुरुष और स्त्री का रिश्ता....एक समलैंगिक सिर्फ सेक्स को नहीं सोचता...वो उन सभी खूबसूरत पलों को भी सोचता है जो एक साफ़ सुथरी खूबसूरत जिंदगी में होते हैं.....जिस तरह स्वास्थ मंत्री या कोई भी स्ट्रेट आदमी या ओरत बच्चा पैदा करने के बाद भी सेक्स करती है तो क्या यह भी एक बीमारी है ? नहीं यह बीमारी नहीं है...यह उन हजारो सालों में विकसित हमारी इन्द्रियों और शरीर की दें है की हम ऐसा करते हैं....वंश बढाने के लिए....स्ट्रेस मिटने के लिए....और प्रेम की अनुभूति के लिए ...यह एक आवश्यक अंग है...क्या आप सेक्स के बिना रह सकते हैं ? नहीं न....इसलिए समलैंगिक भी नहीं रह सकते....और सबसे बड़ी बात वो आपसे या आप के बच्चो से नहीं कह रहे की समलैंगिक बन जाओ या हमारे साथ सेक्स करो...वो तो सिर्फ इसी बात से खुश हैं की इश्वर ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा ...उनके जैसे और भी हैं....तो हमें ऐसे में क्या परेशानी,,,अगर वो आपस में साथ रहते हैं...सेक्स करते हैं...खुश रहते हैं......और रही बात एड्स की तो एड्स असुरक्षित सेक्स से फैलता है....आप स्ट्रेट हो या होमो एड्स पूछ कर नहीं आएगा ...असुरक्षित सेक्स जो भी करेगा उसे एड्स होने की सम्भावना बनी रहेगी.... ....ऐसा न हो पर क्या करेंगे स्वास्थ मंत्री अगर उनका कोई अपना इस तरह की दुविधा में फस जाये ? कभी कभी भारतीय होने पर शर्म आती है की यहाँ के शासक...राजनितिक लोग और मंत्री जब तक रहेंगे भारत ख़तम होता rahega...लेकिन अन्ना हजारे जैसे लोगो को देखो तो मन करता है....इंसानियत मरी नहीं है.... ऐ बन्दे तू भी चल.....इंसानियत के लिए....हर इंसान के लिए....जो तेरे ही परिवार के हैं....क्यूंकि उन्हें भी तेरे ही पिता परमेश्वर ने उन्हें भी बनाया है...!

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  51. Mitron ,aap logon ki bahas vastav mein dhyan dene yogya hai....par ek baat mein bhi yahan kehna chahunga...agar samlengikta ko kanon ke dayre mein rakhenge to sayad aap mein se hi kisi ko ek din kud ko "gay" hone ke aarop se jujhna pad sakta hai.yaad rakhen hamare desh mein mein kanoon ka drupayag hi apne aap mein sabse badi samasya hai.

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  52. Sachmuch garam mudda hai bahas ka. shuru se sonchte hain. hum baat kis bare me kar rahe hain

    (1)Sam laingita ko mitane ki
    (2)Sam laingkik logon ko visham laingik banane ki
    (3)Sam laingik rishto ko sweekar/asweekar karne ki
    (4)Sam laingik logo ko smaan adhikar dene ki

    Pata nahi bahas ka aslee mudda kya hai

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  53. मुझे सबसे अधिक हताश यहाँ के डॉक्टरों कि टिप्पणियों ने किया है. प्राकृतिक और अप्राकृतिक की परिभाषा पर भी कोई सज्जन तनिक प्रकाश डालने की कृपा करते तो बेहतर होता. भारतीय दंड संहिता ३७७ को लेकर न्यायालय से जो निर्णय आया है उससे हमे इसे बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलती है. संहिता कहती है कोई संबंध को अप्राकृतिक क्रिया से हों दंडनीय हैं. अप्राकृतिक से तात्पर्य ऐसी क्रिया जिससे प्रजनन ना हो. ये कानून १८६० में बना था और शारीरिक सम्बन्ध का उद्देश्य महज संतानोत्पत्ति थी. सवाल ये है कि हममे से कितने लोग शारीरिक संबंध सिर्फ संतानोत्पत्ति के लिए करते है. भारतीय स्वास्थ्य नीतियों ने भी ये परिवार नियोजन कार्यक्रमों के द्वारा यह जता दिया है की शारीरिक सम्बन्ध महज संतानोत्पत्ति नहीं हैं. इर्निंग बिएबेर ने अपने शोध में माना था कि जो माताएं अपने बच्चो का अधिक लाड करती हैं उनके बच्चे समलैगिक बन सकते हैं. आपमें से कितने इससे सहमत होंगे. विश्व स्वाथ्य संगठन समेत विश्व के बहुत से शीर्ष संगठनों ने इसे लैंगिक अभिमुखता का एक रूप माना है और इसे मनोविकृति की श्रेणी से दशकों पूर्व हटा दिया था....

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  54. mudda kafi hot hai mere vichar se homo sex and lesbian sex ager manya ho bhi jaye to bhi koi khule me to karega nahi to parda na uthne se koi nuksan ya fayeda nahi hai abhi bhi chup kar karte hai bad me chup kar karege.jinko isme intrest hai use roka nahi ja sakta.

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  55. Hi mai ek gay hoo..koi kuch puchna chahega..mere jaise logo ka ye vishy hai..shayad meri bhi rai jaruri hogi..kya mai ismai aapni rai de skta hoo???

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  56. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।
    भारत में 'समलैंगिगता' आज भी कितनी प्रासांगिग है यह इस बात से भी ज़ाहिर होता है कि 'उल्टा तीर पर २००८ में शुरू हुई बहस' आज भी क़ायम है। एक मॉडरेटर के रूप में मुझे प्रसन्नता है कि भारत में संवेदनशील माने जाने वाले विषय समलैंगिगता पर लोग खुलकर बोलने से हिचकिचा नहीं रहे. असल में इस बहस का मुख्य ध्येय यह भी रहा कि लोग सामने आकर बेबाकी से अपनी राय रखें।

    बेनामी जी,
    यह विषय पूर्ण रूप से आप लोगों को ही समर्पित है-आपका ही है. समलैंगिगता पर सबसे पहले आपकी राय ही बेहद मायने रखती है. ताकि इतर समाज आपकी सोच-और भावनाओं को जान-समझ सके. मैं आपकी राय का तहे-दिल से स्वागत करता हूँ. उम्मीद है आप बेबाकी से अपने विचार और भावनाओं को ज़ाहिर करेंगे.
    ---
    उल्टा तीर के लिए
    [अमित के सागर]

    उत्तर देंहटाएं
  57. sabhi ke vichar padh leye h..or bahut khed ke sath kehna chahongi ki aaj bhi hmara samaj litna piche h..homosexuality aprakartik keses ho sakti h..jis desh me Yugo Yugo se ye dharana rhi hai ki bhagvaan ki margi ke bina ek ptta tak nhi hill sakta to..gay or lesbian log kese paida ho gaye..jra socheye.areyy shram aati hai mujhe ye jaan ke kii kuch log ke rhe hai ki ye keval aakarshan h..or isse samaj me galat massage jayega..aakarshan to aaurat or purash ke sanbandho me bhi hota hai..kya baat kr rhe hai aap..kab tak itna sakuchit sochege.ye koi bimaari nhi h..ye keval aakarshan nhi hai isme me bhi pyaar hota hai.pyaar ki sari pavitarta isme bbi hoti hai.pyaar to kisse se bhi ho skta hai.kmm se kmm aap pyaar jese pavitr bandhan ko aaparkartik na kahe to acha hoga..main homosexuality ke pakash or vipaksh ki baat nhi kar rhi..baat yha bhavnao ki hai..kisi ki bhavnao ko marna katal hi hoga janab..esse logo ko samaj se bhar kr dena chahiye..mat buleye vo bhi insaan ki hi aaulaad hai..agar aaj hum nhi to kya..kll ko hmare bache gay or lesbian ho skte hai..or kinnar bhi to issi dharti pe rehte hai..vo konsa dusre planet pe gye.or agr koi gay hia lesbian hai transgender h bisexual h to usme uss ka kya dosh..sb bhagvaan ki marji hai..or koi shram ki baat nhi hai..society jaago pls normal rho..

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आप सभी लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया जो आप अपने कीमती वक़्त से कुछ समय निकालकर समाज व देश के विषयों पर अपनी अमूल राय दे रहे हैं. इस यकीन के साथ कि आपका बोलना/आपका लिखना/आपकी सहभागिता/आपका संघर्ष एक न एक दिन सार्थक होगा. ऐसी ही उम्मीद मुझे है.
--
बने रहिये हर अभियान के साथ- सीधे तौर से न सही मगर जुडी है आपसे ही हर एक बात.
--
आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं!
--
आभार
[उल्टा तीर] के लिए
[अमित के सागर]

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"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका १५ अगस्त 8th march अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti Binny Binny Sharma boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage DGP dharm ya jaati Domestic Violence Debate-2- dongre ke 7 fere festival Friends With Benefits friendship FWB ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex SHADI PAR BAHAS shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)