आज ये मसला इसलिए भी ख़ास बन पढा है चूँकि अब समलैंगिक लोग इक बड़े समाज से हटके, उन्हीं के पड़ोसी बनके इक नई रूप-रेखा में रहने का हक भी माँगने लगे हैं. इक नए समाज का निर्माण होने को है?
समलैंगिकता को कहीं बहस का मुद्दा बनाके हम लोगों को समलैंगिकता की तरफ़ आकर्षित तो नहीं कर रहे? यह भी एक सवाल है. समलैंगिकता की ख़ास वजह कहीं नर और नारी का इक- दूसरे के प्रति अविश्वाश तो नहीं? क्या वाकई परवारिक संस्था को समलैंगिकता से ख़तरा है? यदि पुरूष-स्त्री अनुपात में असंतुलन आता है तब क्या समाज ऐसे रिश्तों को मान्यता नहीं देगा? जैसे सवाल कई और भी हैं।
बहस की शुरुआत से अब तक मिले प्रतिसादों को ध्यान में रखें तो समाज की नज़र में समलैंगिकता अभी विचाराधीन है? मगर कब तक?
अपनी राय प्रतिक्रियाएँ भेजते रहिये क्योंकि बहस अभी जारी है मेरे दोस्त...

