* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. सधन्यवाद.
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बुधवार, 4 जून 2008

कहाँ -कहाँ चले उल्टा तीर के तीर-बहस वही (५)


कहाँ कहाँ चले "उल्टा तीर" के तीर
बहस उत्तेजक थी तो ये तो होना ही था .उल्टा तीर कमाल कर गया निशाने पर लग गया .और हमारी बहस के तीर पहुँच गये अन्य ब्लॉग पर भी समुन्दर की तरह है इंटर नेट की दुनिया, इसलिए मैं भी नही जानता ये बहस और कहाँ कहाँ चल रही है .जितने तीर मेरे हाथ आए पेश है आपके लिए साभार उन सभी का जिन्होंने अपने ब्लॉग पर इसे जगह दी .आभार उनका भी जो सीधे मुझ तक नही पहुँच पाये या फ़िर मैं उनतक नही पहुँच पाया .बहस तो बहस है जीतनी चले उतना ही अच्छा होगा निष्कर्ष निकल आएगा एक दिशा भी मिल जायेगी .आप सभी से निवेदन है उल्टा तीर में आपका भी स्वागत है
आपका* अमित के सागर
रंजू ranju ने कहा
अमित जी आपके सवाल का जवाब मैंने यहाँ दिया है। क्यूंकि वाकई अभी बहस जारी है।
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ज़रा सोचिये !! पर
http://ultateer।blogspot.com/
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जरा यूं भी सोचिये...
परिवार टूटने
लगे हैं बिखरने लगे हैं? महिला घर पर रहे, क्या इस से समस्या सुलझ जायेगी?. और ना सिर्फ़ वक्त बेवक्त की मुसीबत के लिए उसके अपने लिए भी अपने पेरों पर खड़ा होना सवालंबी होना जरुरी है बात महिला के घर पर रहने की या न रहने की नही है असल में बात है माता पिता दोनों को वक्त देने की अपने बच्चो को अब घर पर माँ है तब भी बच्चे टीवी देखेंगे और नही है तब भी देखेंगे. नेतिकता का पतन उतनी ही तेजी से हो रहा है जितनी तेजी से हम तरक्की की सीढियाँ चढ़ रहे हैं. हर कोई अब सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है. संस्कार माँ बाप दोनों मिल कर बच्चे को देते हैं. जीवन के इस अंधाधुंध बढ़ते कदमों में जरुरत है सही दिशा की सही संस्कारों की ...और सही नेतिक मूल्यों को बताने की .. हर अच्छे बुरे की पहचान पहले उसको अपने माँ बाप दोनों के आचरण से होती है आज के बदलते हालात का मुकाबला माता पिता दोनों को करना है और अपने बच्चो को देने हैं उचित सही संस्कार..यह हालात हम लोगो के ख़ुद के ही बनाए हुए हैं नही तो यूं ही अरुशी केस होते रहेंगे और इंसानियत शर्मसार होती रहेगी ...आप इसको जरा यूं भी सोचिये...
रंजू ranju-:
Comments:

*DR.ANURAG ARYA said...
मैंने अमित जी का लेख नही पढ़ा है पर आपकी बातो से कुछ कुछ अंदाजा लगा सकता हूँ दरअसल इस घटना मे माँ का बाहर कम करना या नही करना उत्तरदायी नही है....कई पहलू है ,दरअसल हमारे सामाजिक के नैतिक मूल्य गिर रहे है ,आम व्यक्ति का चरित्र पतन पर है
*कुश एक खूबसूरत ख्याल said...
माँ अगर घर में रहे तो बच्चे एम टी वी रोडीज में जाकर खुले आम गालिया निकलते है.. नेतिकता मर रही है.
*बाल किशन said...
अभी तो मैं सिर्फ़ यही कह सकता हूँ कि एक सार्थक बहस है. और जितनी बढे उतना ही सबके लिए अच्छा है आख़िर हम सब इन मुद्दों से किसी ना किसी रूप मे जुड़े हैं.
*शोभा said... मैं रंजना जी आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। नारी का नौकरी करना और ना करना इस तरह की समस्याओं का कारण नहीं है। आज के युग में नारी का नौकरी करना युग की आवश्यकता है। किसी भी घटना के लिए किसी एक को दोष देना मूर्खता है। मुझे अमित जी की सोच बहुत बचकानी लगी या ये भी हो सकता है कि अमित जी इस तरह अपने ब्लाग को लोकप्रिय बना रहे हों।
*डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said... मित जी और रंजू जी की टिप्पणियां पढीं. दोनों ही ने अपनी अपनी तरह से इस दुखद प्रकरण पर अप्नी चिंताएं ज़ाहिर की हैं. यह शुभ है. ज़माना बदलता है, पुराना बहुत कुछ जाता है, नया आता है. हर नया सदा खराब नहीं होता और सारा पुराना अच्छा ही था. दर असल महत्वपूर्ण यह है कि हम जिसे अपनाते हैं, उसका उपयोग करते हैं या दुरुपयोग. स्त्री का नौकरी करना, तकनीक, आधुनिकता, समृद्धि इन सब पर ये बात लागू होती है. सरलीकरण से बात बनती नही बिगडती है.

पल्लवी जी ने उठाया एक और मुद्दा
चल गया एक नई दिशा में तीर

चौथी घटना इन सभी घटनाओं में जो बात कॉमन है वो ये की सभी अच्छे घरों के बच्चे थे और सभी के माता पिता उनकी गतिविधियों से अनजान! आज एक ब्लॉग पर पढा की आरुशी हत्याकांड को देखते हुए अब वह वक्त आ गया है की नारियों को घर की और रुख कर लेना चाहिए!

समस्या इतनी गंभीर है! यदि माँ घरेलू महिला है तो स्वाभाविक रूप से वह ज्यादा वक्त दे सकती है.. और यदि दोनों ही कामकाजी हैं तो ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है!क्योकी पैरेंट्स की एब्सेंस में बच्चे ज्यादा छूट पा जाते हैं और यदि किशोर होते बच्चों पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया गया तो जिम्मेदार भी पैरेंट्स ही होंगे!

Comments:

ब्लोगर:- एकल परिवारों में ज्यादातर पिता के पास ही समय नहीं होता, और माँ के लाड़ प्यार और गलतियाँ नज़रंदाज़ करने से बच्चे अक्सर गुमराह हो जाते हैं. और फ़िर अगर माता-पिता दोनों ही के पास सीमित समय हो तो बच्चे को न तो अपनापन मिलता है और न ही अनुशासन के संस्कार. ऐसे बच्चे आगे जीवन में बीमार मानसिकता वाले न निकलें तो यह चमत्कार ही माना जाएगा. May २५,८ Blogger
*रंजू-said...आज हमारे समाज में जो भी घट रहा वह हमारा ही किया धरा है .परिवर्तन वक्त की मांग है पर यह इतना भी न हो कि हम इंसान से हेवान बन जाए और आस पास होने वाले हालात से कुछ महसूस करने वाले हालात में ही न रहे. May 25, २००८
*-said...अगर आप अपने बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखायेंगे तब कोई और उन्हें ग़लत बातें सिखा देगा. 'बच्चे आपके हैं तो जाहिर है जिम्मेदारी भी आप की है'. इन सब से एक ही निष्कर्ष निकलता है की माता पिता दोनों को बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और उसे पूरा करने के लिए समय निकालना होगा.May 25, ०८
*विचार-said...एक एक पेड़-पत्ते को गिनने के बजाय पूरे जंगल का परिदृश्य देखना होगा. फ़िर भी, एक ऐसे इन्सान की मानसिकता देखें, जिसके जीवन में किसी एक अभिभावक की कमी शुरू से रही हो या जो कलही-तनावपूर्ण वातावरण में बड़ा हुआ हो.अब किसी ऐसे इन्सान के बारे में सोचें जिसकी परवरिश एक सामंजस्यपूर्ण परिवार में हुई हो, अन्तर अपने आप सामने आ जाएगा. अक्सर ऐसा भी देखने में आता है की पिता भले ही अपराधी ही क्यों न हो, अगर माँ सौम्य स्वाभाव की है तो संतान काफी सभ्य-सुशील निकलती है (पर व्यक्तित्व मे कोई न कोई ग्रंथि-कुंठा अवश्य ही छिपी रह जाती है).
पर अगर माँ ग़लत राह पर हो तो बच्चे का भविष्य निश्चित ही बर्बाद है. क्योंकि फ़िर ही बात, की माँ से बढ़कर कोई गुरू नहीं हो सकता और पिता कभी चाहकर भी माँ की जगह नहीं ले सकता.
*आशा जोगलेकर-said...अच्छी बहस है । तो निर्णय तो यही हुआ न कि जिम्मेदारी दोनो की है । माँ से बच्चे ज्यादा घुले मिले होते हैं और पिता का अनुशासन और थोडा बहुत डर भी बहुत जरूरी है । May 26, 2008
*यक्ष-said...आपने जो किया प्राकृतिक न्याय के सिध्दांत से बिलकुल सही किया।वरना कितनो को अपराधी बनने से रोका जा सकता था। मै आपकी प्रक्रिया और चिंतन की दाद देता हूँ।बहूत सी बाते घटनाए जानता हूँ,लिख सकता हूँ,किंतु आपकी पोस्ट से जाहिर है, आपका दृष्टिकोण अपराध रोकना,अपराधी होने से रोकना है। माता पिता से आपकी अपेक्षा सही है। May 26, 2008
*डुबेजी-said...ब्लॉग पर आजकल जिस तरह की बहसबाज़ी छिड़ी रहती है दरअसल उसमें विचारों को उद्भासित होने का अवसर कम मिलता है और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ज़्यादा। दूसरों को गालियॉ देकर दिल को तसल्ली देने वालों कीभी जमात कम नहीं है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. aapke blog ki sabhi post padhi .padh kar yahi laga ki aap nahak hi samaj ko todane me jute hai.aapka mudda vastav me ek gambheer mudda hai.aap aise hi mudde uthate rahe khushi hogi . narivad ka vichar aarkashan ka vichar ye sab bakvaas hai . aaurat yadi ghar me rahe to yahi achcha hai.narivad ka vichar nithtley purusho ki den hai .main sahmat hoon kyonki koi bhii marda nahi chahega uski joru bharajakar kaam kare .sharo ki muththi bhar mahilaye gaon me jakar dekhe nari aaj bhii sanskriti ke tane bane me parivar ke uththan me sakriya bhagidari nibha rahi hai .ye mahilaye sadkon par nahi aati sansad me jane ki mang bhi nahi karti .ac carke sukh bhogne vali chand mahliyae desh bhar ki mahilyon ki thekedar nahi ho sakti.samjhnA HOGA .AAP NE ye mudda uthakar mere bheetar dabe vicHRO ko bhar lane me madad di hai .main aapke blog ka member kaise ban sakta hoon.aabhar

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  2. परिवार टूटने लगे हैं बिखरने लगे हैं? महिला घर पर रहे, क्या इस से समस्या सुलझ जायेगी? mahoday aapki bhas ko padha .padhkar laga ki aap 21vi sadi me satyug lana chahte hai.aapki mahanta ki me dad doongi ki aapne kam se kam apane virodhi vicharo ka bhi swagat kiya .aapki jitani tarif ki jaye kam hai.lekin me aapko pahle ye bhi clear kar dena chati hoon ki "narivad ka vichar" sirf aur sirf nari ki hi soch ka nateeja hai .makkar purush ka khud ka koi vazood nahi hota hota.narivadi vichar se aakhir samaj kyon bach raha hai .har purush ke andar ek nari hai .sagarji apke andar ki nari ko janane ki koshish kijiye. ulta teer sidha ho jayega .lagta hai aapke pathak bhi aapki bhas ke topic se bhatak gaye hai.mera anurodh unse bhii hai .ki wo kamse kam bhas ke topic par aa jaye. aapki aglai bhas ka besabri se intzar rahega.main ye janana chahti hoon ulta teer aur kaun se teer chalane wala hai ?

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  3. aapne to vah bat ki hai jo sayad har kisi ko sochni sahiye ,aapke vishar bahut hi prerana dayak hai,dhanywad

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  4. aapne to vah bat ki hai jo sayad har kisi ko sochni sahiye ,aapke vishar bahut hi prerana dayak hai,dhanywad

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  5. महिला घर में रहे या पुरुषों की तरह बाहर रहे, बच्चों को सही शिक्षा देने की जिम्मेदारी दोनों की है. पति पत्नी आपस में विचार करके तय करें कि कैसे यह जिम्मेदारी निभानी है. यह ध्यान रखना जरूरी है - अगर आपने अपने बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखाई तब कोई और उन्हें ग़लत बातें सिखा देगा.

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  6. I am not happy, we are indian this is not our culture but as our time is changing we have entered in new era but we can't leave our cultuer back this can be allowed in western countries - iam against it, those who go for it they are mentally ill.

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  7. amit ji, sahi disha me sochne wale logon ki is desh ko bahut aavashyakta hai, aur mujhe lagta hai ki aap bhi is desh ke liye ek aavashyak vykti hain, kripya jaari rakhen

    उत्तर देंहटाएं
  8. Sagar ji ko Parnam
    Aapane jo subject pakada hai vo vastav main aaj samporan samaj ka gambhir mudda ban chuka hai...per mere khyal se kisi ko is baat ke parwah nahi ke wo kis aur ja raha hai...log aaj paise aur eso-aaram ke taraf pana chate hai...aur is bhook main wo apane tammam rishato ko kho deta hai....phir usko parwah nahi ko jo rishta wo bana raha hai wo samaj ke dayare main hai ya bhar...
    Per ye Dunia hai Sab apane Murji se jee sakte hai...kah sakte hai..

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  9. बहुत खूब मियाँ.....मजा आ गया.वक्त निकाल कर फिर से आता हूँ इस बहस में शमिल होने

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आप सभी लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया जो आप अपने कीमती वक़्त से कुछ समय निकालकर समाज व देश के विषयों पर अपनी अमूल राय दे रहे हैं. इस यकीन के साथ कि आपका बोलना/आपका लिखना/आपकी सहभागिता/आपका संघर्ष एक न एक दिन सार्थक होगा. ऐसी ही उम्मीद मुझे है.
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बने रहिये हर अभियान के साथ- सीधे तौर से न सही मगर जुडी है आपसे ही हर एक बात.
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आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं!
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आभार
[उल्टा तीर] के लिए
[अमित के सागर]

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[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)