घटना चाहे मुंबई की हो या फ़िर दिल्ली की या देश के किसी भी कौने की, लोग ४ दिन के

बाद आया-गया कर देते हैं या फ़िर कर देंगे. ख़ुद सरकार भी. आख़िर क्यों हम अपने इस खोखले तंत्र को
और अपनी झूंठी शान को कायम रखते हैं हमेशा...क्यों तभी भड़कते हैं जब कोई अमानवीय हादसा हो ही जाता है. क्यों लोग इस कदर अपने-अपने में खो गए हैं कि उनके दिलों में दूसरों का दर्द महसूस करने की शक्ती नहीं रही. क्या हम तभी बौखलाते हैं जब हमारा कोई अपना या फ़िर जानकार या रिश्तेदार उस हादसे का शिकार होता है. और उससे पहले हमारे लिए सब कुछ इक तमाशे की तरह होता है। मैं मानता हूँ कि अगर हमें बेहतर आज और कल चाहिए, तो दुनिया के हर एक नागरिक के साथ साथ जो इस देश को चला रहे हैं, जिनके कन्धों पर आम आदमी की हिफाज़त का बोझ है...सभी को ईमानदार रहना होगा हर एक काम में. बेमानी जहाँ भी होगी, वहाँ के हालत बद से बदतर ही रहेंगे हमेशा ही. मुझे ये बात कहने में कोई शर्मिंदगी नहीं कि हमारे तंत्र की जड़ें ही बेकार हैं, जिन्हें या तो नए सिरे से उगाया जाए या फ़िर इनकी ऐसी मरम्मत की जाए कि हमेशा के लिए लोहा बन जाएँ अमानवीय क्रतों के ख़िलाफ़. हर आदमी को निस्वार्थ होना होगा, यह एक बड़ी शर्त होनी चाहिए स्वंय आदमी के लिए. यहाँ बहुत कुछ सिर्फ़ इसलिए बुरा घटित होता ही रहता है चूँकि उसमें किसी न किसी का स्वार्थ छुपा रहता है. इस तरह मुमकिन नहीं कि हम इक स्वच्छ समाज और देश की बात करें. सब ढोंगी पाखंडियों की भाती क्यों हो चले हैं?...इक पत्रकार इस बात में खुश रहता है कि वो सबसे पहले पहुंचकर घटनाक्रम को कैमरे में उतार रहा है, इक-इक बात को बयां कर रहा है. इसके लिए उसे बड़ा इनाम भी मिलेगा और साथ ही उसका नाम भी बढेगा. वो पत्रकार ये नहीं करता कि जितना सम्भव हो सके उसमें उस घटना को शांत करे, उसे होने से बचाए, अपना योगदान इस बात के लिए दे कि वो इक इंसान है, और जिसका भी जिस भी प्रकरण में लहू बह रहा है वही लहू उसके ख़ुद के अन्दर भी है. एक पुलिस वाला सिर्फ़ कुछ मामलों को इसलिए दवा देता है चूँकि उसे रिश्वत में कुछेक हज़ार रुपये मिल जाते हैं. एक secuirty गार्ड किसी को भी अन्दर इस लिए जाने देता है क्योंकि उसे टिप में ५० या १०० रुपये मिल जाते हैं. पेट की भूंख इतनी क्यों है...कि वो कैसे भी बुझती ही नहीं. दुनिया की बड़ी बड़ी खुफिया एजेंसियां दुनिया के विचित्र और बड़े-बड़े केसों को सिर्फ़ इसलिए फाइलों में ही अंततः बिना अपराधी को सजा दिए इसलिए बंद कर देतीं हैं चूँकि उन्हें करोड़ों में धन-राशि मिल जाती है. और आम जनता कभी उससे सवाल-जवाब करने की हिमाकत नहीं करती. शेष बचे अमीर, उनके पास समय नहीं। वाकी के बचे हुए लोगों के बीच निश्चित ही यह धन राशि बंटती हो (jo baudhik paksh bhi hai), तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। और राजनेताओं की तो बात ही निराली है. इनको सबसे पहले अपनी जीत प्यारी है. राजनीति में ये मौतों पर भी राजनीति करने से नहीं चूकते वाकी का हाल क्या होगा...कहना ज़रूरी नहीं. यकीनन....लोगों का लोगों से यकीन गायब है. क्या सब इसी तरह चलता रहेगा...इसकी हम उम्मीद न करें...मगर किस और दूसरी खोखली बिना पर...और कब तक?
मुंबई में जो कुछ भी बुरा घटित हुआ है. मुमकिन है सिर्फ़ एक तारीख बन जाना. मगर अब भी जल रहे हैं दिल और आंखों में नाच रहे हैं मौतों के मंज़र और तबाहियों की तस्वीरें अब भी हैं आंखों में तो वक़्त है अभी कि आँसू पोंछ हम वो काम करें जिससे आगामी हो सकने वाली इस तरह की घटनाओं पर इस बात का यकीन फरमा सकें कि अब ये मुमकिन नहीं चूँकि हम ईमानदार हैं एक-दूसरे के लिए. हम इतने अपाहिज तो नहीं कि ये मातम कुछ-कुछ महीनों बाद अक्सर ही देखते रहें. अब हमें घटना का खंडन नहीं करना चाहिए बल्कि अमल कर अपने दुश्मन से लड़ना चाहिए. बहुत हो गया. यही वक़्त सही है (जैसा कि हर घटना के बाद होता है...पर वो भी जाया ही होके रह जाता है) जब हम सब संगठित होकर कर दें आगाज़ क्रान्ति का...यही वक़्त है जब हम अपने हरे ज़ख्मों के साथ दुगनी शक्ती के साथ लड़ सकते हैं दुशमनों के ख़िलाफ़...आतंकवाद के खिलाफ़. और अगर अभी नहीं तो शायद कभी नहीं!
"संगठित हों, बुराई के ख़िलाफ़ ताकत बनें. एक-दूसरे के साथ हों, महफूज़ हर कदम चलें."
जय हिंद
अमित के. सागर
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सभी सुधी पाठकों व लेखकों सूचित किया जाता है कि जनवरी माह में
"उल्टा तीर पत्रिका" आंतंकवाद पर एक विशेष "वेब पत्रिका" प्रकाशित करने जा रहा है. आप सभी से अनुरोध है
कृपया अपने लेख-आलेख, गीत, कवितायें, ग़ज़ल, शायरी इत्यादि 25 दिसम्बर 08 तक "उल्टा तीर" पर अपनी एक तस्वीर व संक्षिप्त परिचय के साथ मेल करें. आपका अनमोल सहयोग व मार्गदर्शन अपेक्षित है. आओ हम सभी मिलकर आतंकवाद से लड़ें. आभार;
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