* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. सधन्यवाद.
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मंगलवार, 1 जुलाई 2008

किस काम के क़ानून ?

किस काम के क़ानून?

"उल्टा तीर" इस बार फ़िर हाज़िर है एक नई बहस के साथ। 'क़ानून' जिससे हम सब का वास्ता है, कानून जिससे हमारा सीधा सम्बन्ध है। लेकिन येसे ही कितने क़ानून हैं जो समय के साथ अपना अर्थ खोते जा रहे हैं।

नए समय में क्या ये ज़रूरी हो चला है कि क़ानून में भी आमूल-चूल बदलाव हों?
उल्टा तीर पर इस बार पूरे महीने उन नियमों की, उन कायदों की खुली बहस जो आज के परिप्रेक्ष्य में आप्रसंगिक हो चुके हैं लेकिन फ़िर भी कायम हैं क़ानून की किताबों में, हमारे जीवन में।
पिछली बहस की बाबत उल्टा तीर (निष्कर्ष) जरुर पढिये। और भाग लीजिये इस नई बहस में खुलके। क्योंकि बहस अब शुरू हो चुकी है मेरे दोस्त...
आपका;
अमित के. सागर
(उल्टा तीर)

18 टिप्‍पणियां:

  1. शुभकामनाऐं एक सफल और सार्थक बहस के लिए. शुरुवात आप ही करें.

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  2. चलिए में शुरुआत करता हूँ. पहले लोगों की जिंदगी निकल जाती थी पर कभी कानून का सामना नहीं किया होता था. मेरी अपनी जिंदगी में, मैं केवल दो बार अदालत में गया हूँ. एक बार जब मेरा इसलिए तबादला कर दिया गया था क्योंकि में अधिकारी संघ का अध्यक्ष था. दूसरी बार यह गवाही देने कि एक विवाह हुआ था क्योंकि में भी उस में शामिल हुआ था. दोनों केसों में जिस तरह फ़ैसला हुआ मेरा विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ गया. आंखों पर पट्टी बांधे, हाथ में तराजू लिए न्याय की देवी अब मुझे जनता का मजाक उड़ाती उई नजर आती है. न्याय न तो अँधा है न बहरा. न्याय बखूबी देखता है और कौन सामने खड़ा है यह देख कर न्याय होता है. न्याय सुनता भी है, पर केवल ताकतवर की आवाज. गरीब और कमजोर की आवाज न्याय को कम ही सुनाई देती है.

    एक फ़िल्म देखी थी. सन्नी देओल ने उस में एक वकील का अभिनय किया था. लोगों को उस के वह डायलोग बहुत पसंद आए थे जिस में वह अदालत से अगली तारीख न देने की जिरह करता है. फ़िल्म थी सो अदालत ने मान लिया. असली जिदंगी में ऐसा नहीं होता. लोगों की जिंदगी अदालतों में ही कट जाती है और न्याय नहीं मिलता.

    न्यायविद कहते हैं कि बहुत से कानून बदले जाने चाहियें, पर बदलने की शुरुआत नहीं होती. हाँ जब अपना फायदा होता है तो कानून तुंरत बदल दिया जाता है. कानून बनाने वालों और उसे लागू करने वालों ने कानून को एक धंधा बना रखा है.

    बचपन में एक कहावत सुनी थी. खुदा डाक्टर, वकील और अदालत से बचाए. आज भी यह कहावत उतनी ही सार्थक है.

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  3. main aapki baat se sahmat hun ....ab kanoon usi ko bachta hai jise khud ko bachna aata hai ...vaise bhi aap kitne bhi kanoon badal lo jb tk vo lagu hi nhi honge unke badlaav se kya fark padta hai .....main sirf 2 baat poochhna chahunga ....

    "soochna ka adhikar " kitne log hain jo ki 10 rupaye kharch krke poochna chahte hain ki ye sb jo gol maal ho rha hai aakhir vo kyu ....jis din hindustaan ki janta swaal poochhne lg jayegi kanoon badlne ki jaroorat hi nhi padegi ......

    WAT lagoo to huaa lekin kis had tk ?
    aam grahaq pahle bhi lut rha tha ab bi lut rha hai ........ab pahle se jyada lut rha hai ....

    mujhe to lgata hai kanoon bdlne se achchha hai ki jo kanoon hai vo hi aml mein laye jaye .......
    aaj kal kanoon sirf aur sirf matlab ke liye use hote hain ....aam aadmi hi nhi sarkaar bhi yahi krti hai.....

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  4. pata nahi hum kyo har chij ka rona rote hai kanun vaisa hi hota hai jaisa us desh ke log chahete hai .sach to ye hai hum hi apne fadiye ke liye us ko kamjor banate hai ..phir rona hote hai .......hal ke kuch kesho me janta ne awaaj uthai aur naye mila ........hum aapni jumedari se ya to bhag rahe hai....ya kisi ka intejaar kar rahe .woh aap ke liye lade ......vaise bhi yaah to bhagvaan avtaar lena padta hai sachchi ki rach ke liye kyoki hum kuch karte hi nahi hai....(to kariye bhagvaan ka intejaar ) aur hum kar bhi kya sakte hai.......sukriya

    उत्तर देंहटाएं
  5. उक्त बहस आज की सबसे बड़ी ज्वलंत समस्या पर आधारित है इसलिए बहस की शुरुआत के लिए धन्यवाद .

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  6. विधि, कानून,नियम इन सबकी उत्त्पत्ति मनुष्य ने सुचारू व्यवस्था बनाने के लिए की थी,लेकिन ये सब मोटी मोटी किताबो मे ठीक लगते है व्यावहारिक रूप मे देखा जाये तो आम जनता जिनके हितों की रक्षा के लिए इन सबका निर्माण होता है वही इन सबसे पीड़ित होता है ,अदालतों मे जाने के लिए हिम्मत चाहिए , जिरह के लिए वकील चाहिए, वकील को मोटी फीस चाहिए, और गरीब कहा से फीस लायेगा ,कहने को तो विधिक सहायता का प्रावधान होता है, पर क्या ये सच मे गरीब को मदद दिला पाती है . अपील दर अपील.............. और अंत मे उसके हाथ क्या आता है एक बड़ा सा शून्य ...जो पहले से सुने जीवन मे शुन्यता भर देता है. अदालतों के इतने रूप हो गए है कि कौन सा प्रकरण किस कोर्ट मे चलेगा किस कोर्ट को क्षेत्राधिकार है यही तय करते करते कई अदालतों के चक्कर हो जाते है मामूली तकनिकी त्रुटी के आधार पर केस को फिर से रिमांड पर भेजना, फैसले को बदल देना ,.....................इन सबमे आदमी पीस जाता है, मामूली यातायात नियमो के उल्लघन के लिए अछे भले आदमी को अपराधी की तरह अदालतों के चक्कर लगाया जाता है और बड़े अपराधिक प्रकरण मे साक्ष्य के आभाव मे प्रकरण खारिज हो जाता है, कई बार समाचारों मे पता चलता है कि विदेश मे इस यातायात उल्लघन नशाखोरी या इस जैसे जैसे छोटे मोटे केस मे कुछ सामुदिक कार्य करने या यातायात से सम्बंधित कोर्स ,ड्रग से निजात पाने का कोर्स ,या अन्य उससे सम्बन्धित कोर्स करने का दंड दिया जाता है वह यहाँ क्यों नहीं है ,क्या सब अपराध का इलाज जेल या अर्थदंड होता है ? क्यों नहीं कुछ रचनात्मक दंड विधान हो ,क्यों बड़े बड़े टैक्स चोर तो बच जाते है लेकिन गरीब आदमी जेल की हवा खाता है, सच कहा जाये तो जितने ज्यादा कानून है लोगो को न्याय मिलने मे उतनी ही ज्यादा परेशानी हो रही है, कुछ लोग जब चाहे किसी भी अदालत मे किसी भी बड़े आदमी के विरुध्द नाम कमाने के लिए केस दर्ज करा देते है अब वो घूमता रहे पुरे देश के अदालतों मे , ............वैसे ही सरकारी अधिकारी कर्मचारियों का स्थान्तरण दूर दूर होता है और उसे अपने सर्विस काल मे कई केस सरकारी अधिकारी कर्मचारी के रूप मे दर्ज करना होता है जब वह अन्य जगह चला जाता है फिर भी उसे उस प्रकरण मे उपस्थिति के लिए पुराने जगह के कोर्ट मे जाना होता है, उसे न जाने अपने सर्विस काल मे कितने प्रकरणों मे घूमना होता होगा अपनी वर्तमान पदस्थापना स्थान से पुरानी जगह के कोर्ट मे घम घूम कर दिमाग ही घूम जाता होगा, फिर वह क्यों किसी प्रकरण मे अपराध दर्ज कराएगा इसलिए वास्तविक अपराध मे भी अपराधी को इस स्थिति का फायदा मिल जाता होगा,
    थानों मे देखा जाता है कि जब्ती के कितने ही वाहन सड़े गले पड़े रहते है केस के निराकरण के इंतजार मे , क्या ये सब संसाधनों का अपव्यय नहीं है कि कितनी ही सम्पत्ति यु ही जप्त व्यवस्था मे पडा रहे जो भी साक्ष्य लेना हो तुंरत लेकक्र उसे नीलामी सुपर्दगी जन्हा भी देना हो क्यों नहीं दिया जाता क्यों उसे सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है , अब इस बहस पर जितना लिखा जाए उतना ही कम है इसलिए आज बस इतना ही ...............

    उत्तर देंहटाएं
  7. mitra, 2500 se jyada act hain is desh me, lekin poora paalan ek ka bhi nahi ho pata, aakhir kyon?? jo log yahan kanoon todte hain ve videshon me jaakar bilkul theek tarah se unka paalan karte hain, baat sirf itni hai ki ganga ka pravaah oopar se neeche ki taraf hota hai, log oopar dekhkar apni shuraat karte hain, jaisa top par hoga vaisa bottom wale karne lagege, yahan bade log kaanoon ka ullanghan karne me apni shaan samajhte hain aur jo unke khilaaf chalne ki koshish karte hain unhe baahar ka rasta dikha diya jaata hai?? desh ki har vyavastha tabhi theek ho sakti hai jab sansad me kam se kam 350 ghor deshbhakt chun kar aayen?

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  8. सुरेश गुप्ता जी की टिप्पणी के इन सब्दो से ही सुरुआत करना चाहुगा . भगवान डाक्टर, वकील और अदालत से बचाए. आज भी यह कहावत उतनी ही सार्थक है.जितनी पहले कभी थी उन सभी लोगो ने कानून का मजाक और अपनी दूकानदारी बना रखी है जिन के कंधो पर इसकी जिम्मेदारी थी जो सीधी-साधी जनता को कानून का डर दिखा कर अपने अनेक काम करा लेते है कानून भी देखो जैसे कुछ समय पहले अनधिकृत निर्माण का मुद्दा ,सरकार और पहुच वाला तबका अपने लिए सर्वपर्थम छूट पाने मैं सफल रहा दिखाने भर के लिए एक दो बड़ी इमारतो को भी तोडा गया लेकिन सचाई सभी को पता है की इतनी बड़ी बड़ी कालोनी रातो रात तो नहीं बनी होगी
    महिला सम्बन्धी कानूनों ने तो समाज को पूरी तरह से भयक्रांत कर रखा है क्युकि केवल एक महिला के कहने भर से उसके पूरे परिवार को बंद कर दिया जाता है कोई क्यों किसी कानून का पालन कर यदि उसने कुछ नहीं किया और बरसो केवल अपने आप को निर्दोष साबित करने मैं बीत जाये ?
    इसके अलावा बहुत से अन्य कानून जैसे नशीले पदार्थो का व्यापर (दारू का ठेका , तम्बाकू से बने अन्य उत्पाद ) जब सरकार करती है तब तक सब ठीक है कानूनी है लेकिन अन्य लोग बगैर कर के कर तो गैर कानूनी.वेश्यावर्ती के अड्डे पुरे देश मैं मशहुर है और कानूनी अपराध भी है लेकिन तब भी जारी है कैसे ?
    आप आजाद है आपको ये फला फला अधिकार है ये सब बाते बकवाश लगती है जब आप कही आने जाने लगते हो बल्कि एक देश मैं अलग अलग राज्यों मे उनके कुछ अपने कानून है v.i.p और अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए अलग कानून और सुविधा .हर साल अनेक राज्य कभी गन्ना मिल का क़र्ज़ माफ़ करते तो कभी बिजली ,पानी के बिल, और पूजीपति लोगो के कित्ने कर्जे माफ़ होते है इसका कभी जिक्र भी नहीं होता कानून भी अजीबोगरीब होते है उनके लिए तो मुझे पूरा ब्लॉग भी कम लगता है बल्कि इन पर तो कोई होनहार, मेधावी शोध कर सकता है
    खास बात ये की
    “नमक पर जब अग्रेज कर वसूलते थे तो वो गलत थे लेकिन आजाद भारत मैं हमारी सरकार कर ले तो सही जबकि देश मैं हर साल हजारो लोग भूख से मरते है”
    कानून केवल ताकतवर के लिए ही होता है लाखो मैं एक दो अपवाद ही होते है या राजनीती होती है लोग को कानून का सम्मान करना चाहिए लेकिन जब न्याय अन्याय प्रतीत होता हो तब उसका सम्मान कर पाना मुश्किल होता है इस बात को उन सभी लोगो ने कहा है जिन्हें किसी फैसले पर जीत मिली
    और भी बहुत कुछ है कहने को लेकिन अभी सिर्फ इतना ही………………

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  9. कानून नाम की कोई चीज़ आज समाज मे नहीं है बल्कि समाज मे कानून के जानकर लोग ही सबसे ज्यादा कानून तोड़ते है क्योकि उनको मालूम होता है की किस कानून मे क्या छूट है बहुत सारे मुकदम्मे तो देश का प्रतिनिदित्व करनेवाले लोगो और उस प्रशासन के अधिकारियो पर चल रहे है जिनके ऊपर इनको लागू करने की जिम्मेदारी होती है और वह खुद कानून को ठेंगा दिखाते है तो आम जनता क्यों पालन करे? पुलिश वालो को किसी भी आदमी को सरे आम पिटते हुए आप मे से अनेक लोगो ने देखा होगा बल्कि कानून कहता है किसी को भी पीटना गैरकानूनी है एक कानून है की आप कही भी कूड़ा नहीं फैक सकते लेकिन सबसे ज्यादा गंदगी आपको M.C.D. के कार्यालयों मे मिलेगी अवेध पार्किंग का कानून भी कुछ ऐसा ही है पुलिश थानों और सरकारी कार्यालयों के आसपास सबसे ज्यादा अवेध पार्किंग होगी सार्वजनिक जगहों पर शराब पीना और हुड्धंग मचाना भी ऐसा ही अपराध है लेकिन आज कल कानून खुले आम लोग को शराब पीने की इजाज़त देता लगता है क्योकि लोगो को शाम होते ही अनेक जगहों पर विशेष कर गाँव और कालोनी मे सडको पर शराब पीते देखा जा सकता है अभद्र भाषा का प्रयोग कही भी आप को लोगो करते देख सकते है चाहे वह सड़क हो ,बस ,रेल या बाज़ार अथवा गली मे हर जगह महिला अंगो को टिप्पणी बना कर गली देते लोग दीख जाते है सडको पर कही भी खडे होकर पेसाब करना और भी बहुत से कानून है लेकिन कहा तक लिखा जाये सही कानून को अब लागु नहीं किया जाता बल्कि नए नए बनाते रहते है सच कहा जाये तो जितने ज्यादा कानून है लोगो को न्याय मिलने मे उतनी ही ज्यादा परेशानी हो रही है
    अब कानून को पूरी तरह बदल देना चाहिए या कम से कम कानून का निर्माण करना चाहिए जिससे कानून का पालन करने वालो के मन मे उसके लिए और उस संस्था के प्रति सम्मान पैदा हो सके जिसे हम “सविधान” कहते है

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  10. अगर अपराधों की बात करें तो मेरा यह विश्वास है की ९०% आपराध पुलिस को बताये ही नही जाते , आम आदमी में , दुनिया की इस सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में, इतनी हिम्मत नही है की वो अपने साथ हुए अपराध की शिकायत करने पुलिस थाने जा सके !
    और अगर गलती से चला गया तो ३ घंटे बैंच पर बैठ कर इंतज़ार करने के बाद.... पुलिस के शक भरे जवाबों का उत्तर... और किस्मत से केस रजिस्टर होने के बाद, क्रिमिनल के खिलाफ गवाही, बार बार पुलिस के पास खतरे उठा कर जाने..... कोर्ट के सम्मन... अगर पोस्ट आफिस की गलती के कारण सम्मन नही मिला तो वॉरंट, .....
    अमित ! मैं बचपन से ही एक निडर व्यक्ति हूँ फिर भी अपने साथ घटे अपराध को मैंने रजिस्टर नहीं कराया क्योंकि मैं और अधिक परेशान होना नही चाहता ....अगर मेरे जैसे आदमी ने यह कार्य किया है तो साधारण व्यक्ति .....बहस बहुत लम्बी है फिर किसी और दिन सही.....

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  11. "उल्टा तीर" के जागरूक पाठक ज़नाब "पवनेश मिश्रा" के द्वारा "उल्टा तीर" को मेल के जरिये जारी बहस "कानून..."के सन्दर्भ में भेजी गई राय; सादर प्रस्तुत:

    “कानून किस काम के"
    दोस्तों सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि हर उस इंसान को ये जानकर खुशी हुई होगी जो कानून के बारे में कुछ सोचता, या जानता है, इस विषय को पढ़कर.
    "अमित" भाई ने वास्तव में अच्छा विषय चूज़ किया है, नाम तो और अभी अच्छा है, "कानून किस काम के", आप में से लगभग सभी ने कानून की खिलाफत करते हुए अपने तर्क रखे हैं, जो वास्तव में तारीफ़ के काबिल हैं, और अगर उन पर कम हो जाए तो निश्चित ही हमारे कानून अपने बाशिंदों को हिफाज़त और सुकून दोनों ही देने में सफल होंगे.

    हम बताते हैं कानून किस के!

    ०१- आज हम हिन्दुस्तान के किसी भी कोने में हों (जम्मू और कश्मीर को छोड़कर) जाकर रह सकते हैं, वहाँ अपनी मर्जी का व्यापार कर सकते हैं, मेरे हिसाब स ये हमारे कानून की पहली अच्छाई है.

    ०२- हम किसी भी धरम या जाती से ताल्लुक क्यों न रखते हों, दुसरे आम देशों की तरह हारे पास दोयम दर्जे की नागरिकता नहीं है, हमारे हिसाब स ये हमारे कानून की दूसरी अच्छाई है.

    ०३- आज हम अपने परिवार के साथ हम खुली हवा में सांस लेते हैं, हमारे ऊपर हमारे दायरे में कोई बंदिश नहीं है, ये हमारे हिसाब स इस कानून की तीसरी अच्छाई है.

    ०४- आज सबको शिक्षा, काम, धर्म का हक है, ये हमारे कानून की चौथी अच्छाई है.

    ०५- आज हम और आप इसी कानून के दायरे में आते हुए भी इसी कानून पर प्रश्न उठा रहे हैं मगर हम आजाद ही नहीं सकुशल है ये हमारे कानून की सबसे अहम् और सबसे बड़ी अच्छाई है.

    दोस्तों, किसी ने तर्क दिया की हमारे कानून में समय बहुत ज्यादा लग जाता है, हम भी मानते हैं हाँ, लग जाता है, कीस ने कहा की वक़्त बे वक़्त गलत को सही और सही को गलत ठहरा दिया जाता है. हम भी मानते हैं की ऐसा होता है, मगर इसमें कानून कहाँ दोषी है.

    आखिर कानून क्या है? ये सबसे बड़ा प्रश्न है. हम सबके लिए, शायद इसको किसी परिभाषा में बांधना संभव ही नहीं होगा, क्योंकि कानून इक़ जगह जहां सुरक्षा की वजह है. वहीं दूसरी जगह, उठ्पिदन का कारन है. फिर भी हम कोशिश करते हैं इसको परिभाषित करने की.

    "दोस्तों कानून ऐसा नियम है जो हम सब पर सामान रूप स लागु है, कानून ऎसी नित्यं है जो हम सबकी प्रगति के लिए बनाई जाती है, इसलिए इन नियमों के दायरे स बहार अआने वाले इंसान को सज़ा दी जाती है, उसको करार दिया जाता है."
    अगर साफ साफ शब्दों में कहा जाए तो कानों को जीवित इंसान नहीं, जो अपने आप स न्याय या अन्याय का निर्णय कर दे, कानून कोई चलता फिरता आदमी नहीं जो अपने आप से यह बता दे की सही क्या है और गलत क्या है, भाई, भाई कानून हम अपने उन हाथों के साथ काम करता अहि, जो हम और तुम इंसान मिलकर बनाते हैं.
    अगर किसी अदालत में भ्रस्ताचार के सहारे गलत निर्णय होता है तो उसमें सही मायनों में दोषी वह इंसान है जो कानून का पहरेदार होते हुए भी अपने जमीर को बेचता है. अगर किसी थाने में कोई उत्त्पीदन होता है तो उसको जिम्मेदार वह इंसान होता है जो वह काम कर रहा है, अगर गुंडे बदमाश आज की तारीख में आतंक का नंगा नाच खेल रहे हैं तो उसको जिम्मेदार कानून नहीं, उसके जिम्मेदार उन आतंक के पुतलों सरपरस्ती देनेवाले सफेदपोश भेदिये हैं.

    दोस्तों आज हमारा कानून इसलिए लाचार है क्योंकि हमने इसको मनमाफिक प्रयोग करने की मशीन बना दिया है. आज अगर कानून के नाम पर मनमानी हो रही है तो उसके लिए कहीं न कहीं इंसान जिम्मेदार है.

    और सबसे आखिर बात, अगर हम चाहते हैं की कानून सही काम करे तो पहले अपने गिरेवान में झांकर देखना होगा, की हम इक़ दिन में कितनी बार कानून तोड़ते हैं, मगर बचते रहते अहं क्योंकि हमारे ऊपर यही कानून है. जो हमें नागरिक स्वतंत्रता का हक देता है. सच कहा जाए तो गलत कानून नहीं है, गलत इंसान है. अरे दोस्तों ऐसा कानून किस मुल्क में मिलेगा जो इक़ बेगुनाह को बचाने के लिए १०० गुनाहगारों को माफ़ करने को तैयार होता है. कानून को समझने की कोशिश करें और इसे बनाये रखें. (पवनेश मिश्रा)pavnesh1981@gmail.com

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  12. सुरेश गुप्ता जी की टिप्पणी के इन शब्दों से ही शुरुआत करना चाहुगा . भगवान डाक्टर, वकील और अदालत से बचाए......ऐसा क्यों है हम हमेशा पलायनवादी सोच का ही सहारा लेते है .......हम हमेशा बचते है ...कानून से पुलिस से केश करने से ....क्योकि क्यों ली जाये मुसीबत ..सब कुछ सहते हुवे हम चुप है क्यों .......हम इतने नामर्द हो गए है क्यों ....... क्योकि हम लड़ना नहीं चहेते है ......हम पूरी तरह दोगले है .......हम इन्तजार में है कोई आये हमारी लडाई लड़े ......लेकिन हम कुछ नहीं करेगे न समाज के लिए न आने वाले कल के लिए ........कमी हमारी है हम ने सवाल पूछना बंद कर दिया है .......आपने हक़ के लिए लड़ना छोड़ दिया है ..........आने वाली नसले हम कैसे जाने इस का फैसला हमें आज कर न हो गा ...बाबा शाहेब ने कहा था की हामारे कानून में अब कोई कमी नहीं .. अगर कोई कमी होती है तो इसका मतलाब ये नहीं है की हमारा कानून कम्जूर हो बल्कि उस को लागु करने वाले निकम्मे है ...............शुक्रिया

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  13. http://rajeshghotikar.blogspot.com23 जुलाई 2008 को 11:56 am

    bahas ki apni jagah hai aur kam ki apni
    apko shubhkamnayen ki aap IAS shighra bane

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  14. Kaanoon ? Aisi koi cheez bhi hai is desh mein. Ho sakta hai ki aapko yah haasyaspad baat lage , per saty yahi hai. Rozana ki zindagi mein bahut kareeb se dekha hai maine ki kis tarah se kaanoon ke sath khilwaad kiya jata hai. Kya aaj jo kaanoon ke numaainde jo kursiyon per baithe hain unhe pata bhi hai ki kaanoon hai kya bala? Kya wo itne saksham hain ki kaanoon ko hi samajh sake? Nahi aaj jo kaanoon ke numainde hain wo kaanoon ke paalan ke liye nahi usse todne ke raaste bataane ke liye kursiyon per baithe hain. Kaanoon ke sath khilwaad ka nanga naach charo taraf ho raha hai..

    Aaj kaanoon hai to sirf Paisa. Har cheez bikti hai chaahe wo gawaah ho, chahe suboot, chaahe janta ke rakshak, chahe kaanoon banaane wale ya chahe kaanoon padhane wale.

    Ye to electronic media ke chalte thoda bahut kaanoon ko bachaane ka prayaas kiya ja raha hai.

    Paiso ka nanga naach to ham Apne Desh Ki SANSAD mein kai baar dekh chuke hain... kya fark padta hai? kya bigaad leta hai koi inka? Kitne hi kaanoon iske liye bante hain aur kitne hi nirbheek dhang se tod diye jaate hain sab jaante hain.

    Adaalato mein kis tarah dhan ke zor per nirnay karaaye jate hain sab jaante hain per fir bhi agar kahte hain ki iss desh mein koi kaanoon vyavstha hai to mujhe unki is soch per hansi aati hai. Kyon ki ye to wahi baat hui ki jaan kar anjaan banna.

    Ant mein Main Yahi Kahunga ki Kaanoon hai dhan walo aur bahubaliyon ke hath ki kathputli. Jo sach hai usse kisi bhi soorat mein nakaara nahi ja sakta.

    Deepak Gogia.

    उत्तर देंहटाएं
  15. कानून एक ऐसा शब्द जो प्रयोग तो किया जाता है इन्साफ दिलाने के लिए और किसे इन्साफ दिलाना है उसे भी नहीं पता कौन मुज्लिम है वो जो गरीब है या वो जो पाप करता है और नोटों के बल पर कानून को खरीद लेता है सजा किसे मिलती उस गरीब को उस लाचारी को वो दोनों तरफ से शिकार ही बनता है पहेले उस अंधी अमीरी का फिर उस अंधे कानून का इन्हें कौन निशाना बनाये इस अंधे कानून के लिए कौन सा कटघरा बनाया जाये बता सकते हैं आप?अक्षय-मन

    उत्तर देंहटाएं
  16. उल्टा तीर चला के हम तो घायल हो बैठे,
    ख़ुद अपने ही से लड़ने के कायल हो बैठे।

    -मन्सूर अली हाशमी

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. kanoon nahi kisi kaam ke ,aisaa nahi sochiye,
    apne under ghankiye, apni jimmedari
    nibhaiye,
    ang hum bhi isi samaj ke svayam pe sharm khaiye,
    khud ki dikkat hi dekhi,ab apne kaam bhi bataaiye||
    kanoon nahi kisi kaam ke us pe ungli na uthaiye ||

    उत्तर देंहटाएं

आप सभी लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया जो आप अपने कीमती वक़्त से कुछ समय निकालकर समाज व देश के विषयों पर अपनी अमूल राय दे रहे हैं. इस यकीन के साथ कि आपका बोलना/आपका लिखना/आपकी सहभागिता/आपका संघर्ष एक न एक दिन सार्थक होगा. ऐसी ही उम्मीद मुझे है.
--
बने रहिये हर अभियान के साथ- सीधे तौर से न सही मगर जुडी है आपसे ही हर एक बात.
--
आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं!
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आभार
[उल्टा तीर] के लिए
[अमित के सागर]

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"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका १५ अगस्त 8th march अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti Binny Binny Sharma boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage DGP dharm ya jaati Domestic Violence Debate-2- dongre ke 7 fere festival Friends With Benefits friendship FWB ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex SHADI PAR BAHAS shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)