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रविवार, 27 सितंबर 2009

हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम 'विजयादशमी'


त्योहारों के अपने महत्त्व, अपने इतिहास हैं, अपनी संस्कृति हैं मगर क्या हम वाकई में अच्छाई और बुराई की इन लीलाओं को पूरे मनोयोग से जानते-मनाते हैं! इनके महत्त्व को अपने आचरण में लाते हैं. इन्हीं सब अहम् सवालों-जवाबों पर पढ़िये विजयादशमी के मौके पर यह एक महत्वपूर्ण लेख व् रचना. [उल्टा तीर]

विजयादशमी हमारे आत्म-मंथन का दिन है. हम पराजित किस्म के लोग विजयादशमी मना कर खुश होने का स्वांग भरते रहते हैं. बहुत-कुछ सोचना-विचारना है हमको. कुछ लोग तो यह काम करते है. लेकिन ज्यादातर लोग क्या कर रहे हैं..? ये लोग उत्सव प्रेमी है. उत्सव मनाने में माहिर. खा-पीकर अघाये लोग... उत्सव के पीछे के भावः को समझाने की कोशिश ही नहीं करते.  कोइ भी त्यौहार हो, उसके बहाने छुट्टी का मज़ा लूटेंगे, लेकिन मन को निर्मल करने का कोइ जतन नहीं करेंगे. मन में नफ़रत, घृणा, दुराचार-अत्याचार सब कुछ व्याप्त रहेगा. रावण मारेंगे साहब. उसे ऊंचा भी करते जा रहे है, लेकिन राम बेचारा बौना होता जा रहा है. राम याने मर्यादा पुरषोत्तम. अच्छे लोग हाशिये पर डाल दिए गए है. गाय की पूजा  करेंगे औए गाय घर के सामने आ कर खड़ी हो जायेगी तो गरम पानी डाल कर या लात मार कर भगा देंगे. बुरे लोग नायक बनते जा रहे है. नई पीढी के नायक फ़िल्मी दुनिया के लोग है. राम-कृष्ण, महावीर, बुद्ध, गाँधी आदि  केवल  कैलेंदरो में ही नज़र आते है. यह समय उत्सव्जीवी समय है, इसीलिए तो शव होता जा रहा है. अत्याचार सह रहे है लेकिन प्रतिकार नहीं. प्रगति के नाम पर बेहयाई बढ़ी है. लोक तंत्र असफल हो रहा है. लोकतंत्र की आड़ में राजशाही फ़ैल रही है. देखे, समझें. और महान लोकतंत्र के लिए जनता को तैयार करें. विजयादशमी के अवसर पर एक बार फिर चिंतन करना होगा कि हम और क्या होंगे अभी..? एक लम्बा लेख भी मै लिख सकता हूँ, लेकिन इससे फायदा? लेखक-चिन्तक अपना खून जलाये, लेकिन आम लोग हम नहीं सुधरेंगे की फिल्म देखते रहे...? खैर...फ़िलहाल दशहरे के खास मौके पर प्रस्तुत है एक विचार-गीत. देखे, मेरे मन की पीडा क्या आप के मन की भी पीडा बन सकी है?




बहुत हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम,
मेरे देश की उत्सव-प्रेमी जनता तुझे प्रणाम.
नाचो-गाओ, मौज मनाओ, कहाँ जा रहा देश,
मत सोचो, कहे की चिंता, व्यर्थ न पालो क्लेश.
हर बस्ती में है इक रावण, उसी का है अब नाम....
नैतिकता-सीता बेचारी, करती चीख-पुकार,
देखो मेरे वस्त्र हर लिये, अबला हूँ लाचार.
पश्चिम का रावण हँसता है, अब तो सुबहो-शाम...
राम-राज इक सपना है पर देख रहे है आज,
नेता, अफसर, पुलिस सभी का, फैला गुंडा-राज.
डान-माफिया रावण-सुत बन करते काम तमाम...
मंहगाई की सुरसा प्रतिदिन, निगल रही सुख-चैन,
लूट रहे है व्यापारी सब, रोते निर्धन नैन.
दो पाटन के बीच पिस रहा. अब गरीब हे राम...
बहुत बढा है कद रावण का, हो ऊंचा अब राम,
तभी देश के कष्ट मिटेंगे, पाएंगे सुख-धाम.
अपने मन का रावण मारें, यही आज पैगाम...
कहीं पे नक्सल-आतंकी है, कही पे वर्दी-खोर,
हिंसा की चक्की में पिसता, लोकतंत्र कमजोर.
बेबस जनता करती है अब केवल त्राहीमाम..
बहुत हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम,
मेरे देश की उत्सव-प्रेमी जनता तुझे प्रणाम.  
-
[गिरीश पंकज]
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
  

*-*-*

आप सभी को दुर्गा नवमी और दशहरा की बहुत-बहुत शुभकामनाएं.
[उल्टा तीर] पर १ अक्टूबर ०९ से भाग लीजिए एक नई सामाजिक ज्वलंत बहस में...  दीजिए अपनी राय! आप भी हो सकते हैं उल्टा तीर के लेखक/लेखिका! बस हमें जल्दी से जल्दी मेल करें या फोन करे.

10 टिप्‍पणियां:

  1. गिरीश जी,
    सही लिखा आपने, काहे की चिन्ता व्यर्थ न पालो कलेश.....
    आज के दौर में यह रचना दशहरा पर एकदम उचित है त्यौहार सिर्फ छुट्रटी मनाने भर के लिए रह गये है। बहुत खुब लिखा है बहुत उंचा हो गया है रावण बौना होता राम........

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही कहा है आपने रावण का कद राम के कद से बडा होता जा रहा है.
    कुछ इसी तरह की बात मैने भी लिखी है अवसरानुकूल अवलोकित करे :
    http://verma8829.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html

    उत्तर देंहटाएं
  3. "काहे की चिंता व्यर्थ न पालो क्लेश..."

    धन्यवाद आपका!

    उत्तर देंहटाएं
  4. Amitji,
    Vijaya dashmee ke parv pe dheron shubhkamnayen sweekar karen!
    Nahee, Ravan chahe lahe oonchaa hua ho, ho nahee sakta...Gaandhee maare gaye, satya ke liye ladte ladte, qeemat eemaankee chukayee...jeet unhen kee huee..Godse kee nahee...
    Maine pichhale 3 dinose 'ek chitthee deshke naam' pe comment denekee viphal koshish kee...
    Aaj aakharee chitthee hai..raat phir ek pryas karoongee..

    Is tarah ke kaam jaree rahen...anek duayen aapke saath hain..

    उत्तर देंहटाएं
  5. Ek aur baat poochhna chaah rahee thee...kya aap ' ek sawal tum karo' is prashn manch pe sahyogee lekhan kar payenge?Yaa chand sawal utha sakenge?
    Jitna samay utna sahee..

    उत्तर देंहटाएं
  6. Amit jee,
    Raam jee ek bar jale.raawan har saal jale.raam jee kabhi waapas na aaye.raawan jindaa ho har saal aaye.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहूत बढिया कहा आपने गिरीश भैइया,रावणो की तादात देश मे बढती ही जा रही है,सारी समस्याओ से जुझता मध्यम वर्ग,अब फ़िर से एक बार आना होगा किसी को जो हमेशा के लिए रावण का नाश कर के हमे इन समस्याओ से निजात दिलाए,

    उत्तर देंहटाएं
  8. गिरीश भाई राम और रावन के इन प्रतीकों के माध्यम से आपने पूरी व्यस्था को बेनकाब कर दिया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपके लिए एक बात सटीक सी
    "उसे रोको वो सच बोल रहा है
    पुख्ता मकानों की छतें खोल रहा है"
    बधाइयां

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत है आसाँ भाषण देना ,कवि महाराज प्रणाम ,
    किन्तु बताओ यह भी ,कैसे ऊँचे हों श्री राम |
    कुछ सुझाव हों कुछ आचरण ,कुछ उदाहरण रखें ,
    तबउद्देश्य पूर्ण हो कविता मधुरभाव सब चखें |
    कैसे रावण गिरे गर्त में , कैसे सुधरें हम सब,
    अपने-अपने को ही सुधारें ,तब सुधरेंगे हम सब |

    उत्तर देंहटाएं

आप सभी लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया जो आप अपने कीमती वक़्त से कुछ समय निकालकर समाज व देश के विषयों पर अपनी अमूल राय दे रहे हैं. इस यकीन के साथ कि आपका बोलना/आपका लिखना/आपकी सहभागिता/आपका संघर्ष एक न एक दिन सार्थक होगा. ऐसी ही उम्मीद मुझे है.
--
बने रहिये हर अभियान के साथ- सीधे तौर से न सही मगर जुडी है आपसे ही हर एक बात.
--
आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं!
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आभार
[उल्टा तीर] के लिए
[अमित के सागर]

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