* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. सधन्यवाद.
**१ अप्रैल २०११ से एक नए विषय (उल्टा तीर शाही शादी 'शादी पर बहस')के साथ उल्टा तीर पर बहस जारी...जिसमें आपका योगदान अपेक्षित है.*[उल्टा तीर के रचनाकार पूरे महीने भर कृपया सिर्फ और सिर्फ जारी [बहस विषय] पर ही अपनी पोस्ट छापें.]*अगर आप उल्टा तीर से लेखक/लेखिका के रूप में जुड़ना चाहते हैं तो हमें मेल करें या फोन करें* ULTA TEER is one of the well-known Hindi debate blogs that raise the issues of our concerns to bring them on the horizon of truth for the betterment of ourselves and country. आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं! *आपका - अमित के सागर E-mail: ocean4love@gmail.com, ultateer@gmail.com, Mob: +91- 9990 181944

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

ये अंधा क़ानून है!




ये अंधा कानून है, 
ये अंधा कानून है,
ये.... अंधा....कानून....है....

जी हां आप सही सोच रहे हैं. ये लाईनें न्याय की देवी जो आँख पर पट्टी बांधे हैं उनके लिए है. जो न्याय की देवी दूध का दूध और पानी का पानी वाला फैसला देने के जानी जाती है, उस देवी के दर से आज एक देवी के आबरू से खेलने वाले और उसे आत्महत्या के लिए जिम्मेदार डीजीपी को पर्याप्त सबूत होने के बावजूद ६ महीने की साधारण सज़ा और एक हज़ार रुपये जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया.

१९ साल 
१९ साल से रुचिका गिरहोत्रा काण्ड का केस चल रहा था. पर्याप्त सबूत होने के बावजूद केस की सुनवाई में इतना लम्बा समय दर्शाता है कि हमारी न्याय प्रणाली कितनी लाचा और लाचार हो चुकी है. इसी कारण ऊंचे रसूख वाले न्याय को अपने हाथ की कठपुतली बना रखे हैं.

हाईस्कूल में पढ़ रही रुचिका गिरहोत्रा के यौन उत्पीड़न के लिए दोषी पूर्व डीजीपी एसपी सिंह राठौर को कोर्ट ने १९ साल बाद ६ महीने की सामान्य सज़ा और एक हज़ार रुपये जुर्माना लगाकर छोड़ दिया ? इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. १४ वर्षीय टेनिस खिलाड़ी के साथ राज्य का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी बलात्कार का दोषी पाया गया ? रुचिका की आपबीती हलफ़नामे को कोर्ट ने नज़रंदाज़ कर दिया ? यह मुकदमा आम आदमी और खास आदमी के बीच न्यायसंगत था ? यह मुकदमा पुलिस के सचरित्र को दर्शाता है ?

बिना कारण रुचिका पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर स्कूल से निकाल दिया जाता है. भाई को पुलिस डराती है, धमकाती है, पीटती है, झूठे केस में फंसाती है. पूरा परिवार सदमें में जीने को अभिशप्त होता है. यह सब देखकर अल्पवयस्क रुचिका जहर खाकर अपनी जीवन लीला ख़त्म कर लेती है, ताकि उसके भाई और पिता को कोई परेशानी न हो. कब तक ऐसा होता रहेगा ? कब तक लड़कियों और महिलाओं को दूसरे की करनी भुगतनी पड़ेगी ? पुरुष प्रधान समाज में महिला सिर्फ उपभोग की वास्तु रह गई है ? " यत्र नार्यस्तु पूज्यते तत्र रमन्ते देवता ",  उक्ति वर्तमान में अपना अस्तित्व खो चुकी है ? घर - परिवार, देश और समाज संभालने वाली महिला की सुरक्षा किसी की नहीं है ? नारी को स्वतंत्रता का कोई अधिकार नहीं है ?

इन सवालों के जवाब हमें और आपको ही देने है. तभी एक स्वस्थ और विकसित समाज की कल्पना साकार होगी.
रुचिका मामले में गवाह बने उसकी सहेली के माता - पिता आनंद प्रकाश और श्रीमती मधु प्रकाश की जितनी तारीफ की जाए कम है. तमाम धमकियों के बावजूद पुलिस प्रशासन के प्रभाव में न आकर उन्होंने अपनी गवाही दी. जहां गवाह खरीदे और बेचे जाते हों, जहां गवाही को धनबल और बाहुबल से बदला जाता हो , वहां इन दोनों के हौसलों को सलाम...!!

न्याय की विडम्बना 
१. १४ साल की नाबालिग लड़की के साथ अधेड़ डीजीपी ने बलात्कार किया.
२. १९ साल बाद फैसला, वह भी न्यायसंगत नहीं.

३. तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख डलवाकर पूर्व डीजीपी राठौर ने अपने पद और पावर का बेहिसाब इस्तेमाल करते हुए  केस को १९ साल तक खींचा. पीड़िता के भाई और पिता को प्रताड़ित किया गया. गवाह बने आनंद प्रकाश और श्रीमती मधु प्रकाश को डराया, धमकाया गया.

४. बलात्कार पीड़िता ने आत्महत्या कर लिया.

५. पर्याप्त सबूत होने के बाद भी बलात्कारी राठौर को कोर्ट ने सामान्य सी सज़ा सुनाई.

६. कोर्ट का यह कहना बहुत ही हास्यास्पद है कि इतने लम्बे समय तक चले केस के कारण राठौर को लम्बी सज़ा नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी उम्र ६८ वर्ष हो चुकी है और हृदय की सर्जरी भी हो चुकीहै.

७. १९ साल तक चले केस से जिस परिवार को जो मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और सामजिक नुकसान हुआ उसकी भरपाई कौन करेगा ?

८. महिलायें कब तक अन्याय का शिकार होती रहेंगी ?

९. आम आदमी न्याय से हमेशा वंचित रहा है. इस फैसले ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है.

१०. यह फैसला लोकतंत्र की न्याय प्रणाली पर अनास्था और विद्रोह की भावना पैदा करता है.

११. किसी नाबालिग लड़की की आबरू  को धूमिल करना और उसे ख़ुदकुशी के कगार पर पहुंचाने वाले राठौर की इतनी कम सज़ा काफी है ?

१२. अप्रासंगिक हो चुके भारतीय कानून को बदल देना चाहिए.

जो सज़ा पूर्व डीजीपी राठौर को कोर्ट ने सुनाई है, उस सज़ा से कौन अपराधी खौफ खायेगा ? ऐसे अपराधी की सज़ा मौत से कम स्वीकार नहीं, ताकि कोई बेटी, बहिन , बहू, बीवी की अस्मत पर बुरी नज़र डालने से पहले उसके अंजाम को सोचकर थर्रा उठे.

एक सवाल जज से
"जिस जज ने यह फैसला सुनाया है 
क्या उसके बेटी, बहिन , बहू या बीवी
के साथ ऐसा हादसा हुआ होता तो वे 
यही फैसला सुनाते ??"

प्रबल प्रताप सिंह

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

पत्नी पीड़ित! चिट्ठाकार क्षमा करें- घरेलू हिंसा- ६


घरेलू हिंसा का मुख्य कारण पुरूषवादी सोच होना है और स्त्री को भोग की विषय वस्तु बनाना है। सामंती युग मेंराजा-महाराजाओं के हरम या रनिवास होते थे जिसमें हजारो-हजारो स्त्रियाँ रखी जाती थी । पुरूषवादी मानसिकता मेंस्त्री को पैर की जूती समझा जाता है इसीलिए मौके बे मौके उनकी पिटाई और बात-बात पर प्रताड़ना होती रहती है . समाज में बातचीत में स्त्री को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती की संज्ञा दी जाती है किंतु व्यव्हार में दोयम दर्जे का व्यव्हारकिया जाता है कुछ देशों की राष्ट्रीय आय का श्रोत्र देह व्यापार ही है ।

मानसिकता बदलने की जरूरत है भारतीय कानूनमें 498 आई पी सी में दंड की व्यवस्था की गई है किंतु सरकार ने पुरुषवादी मानसिकता के तहत एकनया कानून घरेलु हिंसा अधिनियम बनाया है जिसका सीधा-सीधा मतलब है पुरुषों द्वारा की गई घरेलू हिंसा से बचावकरना है इस कानून के प्राविधान पुरुषों को ही संरक्षण देते हैं.

समाज व्यवस्था में स्त्रियों को पुरुषों के ऊपर आर्थिक रूप से निर्भर रहना पड़ता है जिसके कारण घरेलू हिंसा का विरोधभी नही हो पाता है आज के समाज में बहुसंख्यक स्त्रियों की हत्या घरों में कर दी जाती है और अधिकांश मामलों मेंसक्षम कानून व पुरुषवादी मानसिकता के कारण कोई कार्यवाही नही हो पाती है । स्त्रियों को संरक्षण के लिए जितने भीकानून बने हैं वह कहीं न कहीं स्त्रियों को ही प्रताडित करते हैं , जब तक 50% आबादी वाली स्त्री जाति को आर्थिक स्तरपर सुदृण नही किया जाता है तबतक लचर कानूनों से उनका भला नही होने वाला है ।

किसी भी देश का तभी भला हो सकता है जब उस देश की बहुसंख्यक स्त्रियाँ भी आर्थिक रूप से सुदृण होहमारे देश को बहुत सारे प्रान्तों में स्त्रियाँ 18-18 घंटे तक कार्य करती हैं और पुरूष कच्ची या पक्की दारूपिए हुए पड़े रहते हैं उसके बाद भी वो कामचोर पुरूष पुरुषवादी मानसिकता के तहत उन मेहनतकशस्त्रियों की पिटाई करता रहता है । घरेलु हिंसा से तभी निपटा जा सकता है जब सामाजिक रूप से स्त्रियाँमजबूत हों ।

यह पोस्ट उल्टा तीर पर चल रही बहस घरेलू हिंसा के लिए लिखी गई है और इसका शीर्षक यह इसलिए रखा गया है कीमुझे इन्टरनेट पर पत्नी पीड़ित ब्लागरों की यूनियन बनाने की बात की पोस्ट दिखाई दी थी इसलिए पत्नी पीड़ितचिट्ठाकारों से क्षमा मांग ली गई है ।

उल्टा तीर के लिए
[सुमन]

सोमवार, 9 नवंबर 2009

घरेलू हिंसा के कारण- कब तक और क्यों ? Violence Debate- 5



महिलाओं पे घरेलु हिंसा का इतिहास पूरी दुनिया मे पुराना है। भारत में शायद अन्य मुल्कों से कुछ अधिक (पाकिस्तान में उससे भी अधिक हो सकता है)

कई कारण रहे हैं इसके। जैसे-

Ø      सबसे मुख्य कारण: पितृप्रधान व्यवस्था लडकी ब्याह के बाद ससुराल आती है। ( केरल तथा गुजरात में कुछ टपके हैं, जहाँ लड़का ससुराल आता है, माता पिता की देखभाल करनेकी ज़िम्मेदारी लडकी पे होती है.)

ससुराल आते ही उसपे उस घर के रीती रिवाज तुंरत अपनाने के लिए थोपे जाते हैं.। उसका अलग अस्तित्व किसी को मंज़ूर नही होता।

Ø      औरत का आर्थिक दृष्टी से आत्म निर्भर ना होना एक और कारण बन जाता है। उसे शारीरिक मानसिक हिंसा को भयंकर से रूप बर्दाश्त करना पड़ता है।

अक्सर मानसिक हिंसा को हिंसा माना ही नही जाता। लडकी को समर्पण भाव का उपदेश दिया जाता है। बचपन से यही बात सिखाई जाती है कि वो 'पराया धन' है। जहाँ वो पली बढ़ी वही घर उसके लिए पराया बन जाता है। ऐसे हालातों में पति और उसके परिवार को यकीन होता है कि उसे कहीं पनाह नही मिलनेवाली। माता पिता की आर्थिक हालत तथा सामजिक प्रतिष्ठा पे आँच आने की संभावना से ही उसके मायके वाले डर जाते हैं। अन्य भाई बहन के ब्याह में मुश्किल होगी ये डर रहता है। पढ़े-लिखे और आर्थिक रूपसे मज़बूत परिवारों मेभी यही विकृत मानसिकता दिखाई देती है। (एक सवाल तुम करो' इस ब्लॉग पर पढें " अर्थी तो उठी' इस शीर्षक तहत लिखा हुआ आलेख. गर अमित जी इजाज़त दें तो उसे उल्टा तीर पे पोस्ट कर दूँगी)

Ø      सवाल ये उठता है कि औरत की सुरक्षाके लिए क़ानून बने हैं, फिर भी हिंसा पे कोई रोक नही। जवाब यह है कि हिंसा का बयाँ गर पुलिस ठाणे में दर्ज कराया जाता है (लडकी द्वारा), तो उसके लिए ससुराल के दरवाज़े तो तुंरत बंद हो जाते हैं. मायकेवाले भी समझौता करवाने में अधिक विश्वास रखते हैं। साठी औरत गर कमाती ना हो, तो बच्चों के लालन पालन की ज़िम्मेदारी कौन निभाएगा, ये बड़ा सवाल होता है। ज़ाहिरन, ससुराल वाले इस बात का दुरूपयोग करते हैं। लडकी को घर छोड़ना है तो छोडे, बच्चे नही मिलेंगे, ये धमकी दी जाती है। ये इमोशनल blackmail ही तो है! बच्चों की खातिर एक माँ बहुत कुछ बर्दाश्त कर जाती है।

            थाने में जब तक रिपोर्ट नही लिखवाई जाती, आगे की कोई कार्यवाही मुमकिन नही। इसी कारण, पुलिस थानों में कौटुम्बिक सलाह मशविरा भी दिया जाता है।

Ø      दहेज़ की खिलाफत करता हुआ कठोर क़ानून है, लेकिन फिर वही बात! तेरी भी चुप मेरी भी चुप ! गर ब्याह के बाद रिपोर्ट लिखवायें तो मुश्किल, ब्याह के पहले लिखवायें तो  भविष्य में संभावित अन्य रिश्तों को लेके परेशानी..!
           
Ø      दहेज़ को लेके लडकी को कई बार जला दिया जाता है। मृत्यु पूर्व ज़बानी में उसपर दबाव डाला जाता है कि गर वो पति के ख़िलाफ़ कुछ कहेगी तो बच्चे पूरी तरह अनाथ हो जायेंगे. उनके सर से पिता का साया भी उठ जाएगा! वो जलने को अपघात की तौर पे दर्ज कराने के लिए मजबूर की जाती है।

Ø      गर उसे सत्य भी बताना हो तो, अस्पताल में महिला संगठना की कोई सदस्या हाज़िर हो तभी ये तकरार दर्ज की जा सकती है ! रातके समय गर उसे जलाया जाय और महिला संगठना की कार्यकरता/ सदस्य को भनक लग जाय तो वो या तो छुप जाती हैं, या बीमार होने का नाटक कर लेती हैं (ये असली जीवन में देखी घटनाओं का बयाँ दे रही हूँ)

ऐसी हालत में केवल पुलिस के समक्ष दी बयानी न्यायलय में ग्राह्य नही होती। ऐसे कई केस देखे गए हैं, जहाँ, पड़ोसी पोलिस और न्यायाधीश तक को पता होता है कि कसूरवार कौन है, क़ानून सुबूत मानता है। औरत की ज़बानी जो वो मृत्युपूर्व देती है, गवाही के बिना अवैध मानी जाती है !

Ø      मानसिक अत्याचार के जिस्म पे निशाँ तक नही होते ! कौन गवाही देगा...और वही सवाल, औरत जाए तो कहाँ जाय?

इन हालातों को मद्देनज़र रखते हुए, ऐसे ग्रहों/संस्थाओं की बेहद ज़रूरत है जहाँ महिलाओं, उनके बच्चों समेत, आश्रय मिल जाए। वरना गर साल बाद बच्चे को रिमांड में भेज दें तो वहाँ उसकी क्या हालत होगी ये सोचके डर लगता है!
उल्टा तीर के लिए
[शमा]
***
स्त्री प्रधान इस बुराई के विषय में जब तक महिलाओं खुलकर सामने नहीं आयेंगी, बहुत से सच सामने नहीं आयेंगे, बहुत सी बातें, कई तरह की मानसिकताएं कभी भी सामने नहीं आ सकेंगीं.  यह हिंसा सहना और हमेशा सहते रहना आपको आदत में तो डाल सकता है मग़र आप अपनी आने वाली पीढी को भी यही हिंसा परम्परागत जाने-अनजाने सौंप ही देंगे! मैं नहीं कहता कि यह इक़ दिन में कह्तम हो जाने वाली समस्या है, मैं मग़र यह जरूर कहता हूँ कि यह एक बड़ी बुराई है, हिंसा है, महिलाओं के साथ इंसानियत का रवैया नहीं है घरेलू हिंसा, यह महिलाओं की आज़ादी और संभावनाओं पर तमाचा है, जो हर रोज ही महिलाओं को अपने घर में सहना पड़ता है! बुराई करते-करते या सहते-सहते अभ्यस्त होने से अच्छाई के लिए इक़ बार अच्छा होना जादा अच्छा है.
[अमित के सागर]

शनिवार, 7 नवंबर 2009

शिखर पुरुष को श्रद्धांजली



पत्रिकारिता जगत के जाने-माने सशक्त हस्ताक्षर "प्रभाष जोशी" अब हमारे बीच नहीं रहे. बहुत से नए शब्द देने वाले जोशी जी अब शब्दों के रूप में हम सबके पास यादें बनकर ही रहेंगे. मग़र शिखर पुरुष प्रभाष जोशी का चले जाना हिन्दी पत्रिकारिता के लिए बहुत बड़ी क्षत्ति है. एक ऐसा शून्य जिसे कोई नहीं भर सकेगा. हिन्दी पत्रिकारिता के आधारभूत स्तम्भ का एक सशक्त खम्बा टूट गया. जिसकी जगह अब कोई नहीं ले सकेगा.

बीते गुरुवार देर रात मैच देखते-देखते व सचिन तेंदुलकर के आउट होने के बाद उनकी तबियत बिगड़ी व दिल का दौरा पड़ने से अपने पसंदीदा खिलाडी और खेल की रोमांचक खबर लिखने से महरूम जोशी जी हम सबको हमेशा के लिए अलविदा कह गए.

गांधीवादी विचारधारा में रचे-बसे, १५ जुलाई १९३६ को इंदौर के निकट स्तिथ बडवाहा  में जन्मे जोशी जी ने हिन्दी दैनिक अखबार "नई दुनिया" से अपनी पत्रिकारिता का आरम्भ किया. खेल से श्री जोशी को जैसे मुहब्बत रही. खेल में सचिन शिखर खिलाडी रहे हैं तो श्री जोशी खेल पत्रिकारिता के शिखर स्तंभकार. हर विषय पर अपनी सशक्त और जागरूक टिपण्णी देने वाले जोशी जी ने "जनसत्ता" अखबार को सम्पादक के पद पर रहते हुए इक नई ऊंचाई दी. 1995 में संपादक के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे मुख्य संपादकीय सलाहकार के तौर पर जनसत्तासे जुड़े रहे। आम जन की भाषा में निर्भीक और धारधार लेखन के जरिये की गई उनकी समाजसेवा अमूल्य है. जिसे सदियाँ याद रखेंगीं.

-कुछ मैं कहूं-
अखबार मुझे जादा अच्छे कभी नहीं लगे. पर देश-विदेश में घटने वाली घटनाओं और नई-नई सूचनाओं, जानकारियों से रू-ब-रू होने के लिए मन में एक ख़याल आया कि क्यों न १-१ सप्ताह तक हर अखबार पढा जाए. और फिर यही किया. देश के प्रतिष्ठित अखबारों से लेकर स्थानीय अखबारों तक की ख़ाक छानने के बाद मुझे मिला "जनसत्ता" जिसमें खासतौर से रविवार को होता था श्री जोशी जी का "कागद कारे". बस यही अखबार लगा कि मैं शायद इसे ही तलाशता रहा था. चूँकि यह अखबार गिनती में कम ही होता है और कम ही लोगों को पढ़ते देखा है. इसलिए कभी-कभी इस अखबार को पढने के पीछे ५-५ फोन करने भी पड़ते (जब भी हॉकर 'जनसत्ता' नहीं लाकर देता) या कई-कई स्टॉलों पर घूमना पड़ता. जनसता के प्रति जैसे इक दीवानगी सी है.

श्री जोशी की सप्रथम जब टीवी पर खबर देखी तो यकीन ही नहीं हुआ कि मैं रविवार को जनसत्ता में उनका "कागद कारे" नहीं पढ़ सकूंगा. दिमाग जैसे स्तब्ध हो गया. मन अन्दर से भर गया. दिल में लग रहा है जैसे आंसू बनने तैयार हो गए हैं. और मैं रो पडूंगा. मैंने टीवी बंद की, पर मन नहीं माना, फिर चालू की! बड़ी अजीब सी स्तिथि में मन आ पहुंचा था. जनसत्ता पढ़ते-पढ़ते जैसे श्री जोशी से कोई भावनात्मक रिश्ता सा हो गया था. और अब जोशी जी नहीं रहे! मैंने कभी ऐसी कल्पना नहीं की थी. पर इस सच का सामना करना दुर्लभ सा हुआ.

कल रविवार को जब मैं जनसत्ता देखूंगा तो मैं निश्चित ही आपको बहुत करूंगा, शायद उस कागज़ पर आपके लेखन वाली जगह पर किसी और का कुछ लिखा होगा, मगर मैं आपको ढूंढूंगा, आपके शब्दों और 'अपुन' वाली बेबाकी पढ़ना चाहूँगा...मगर यह सब नहीं होगा...फिर भी आप यादों में मुक़म्मल रहोगे, अपने होने से जादा!

उल्टा तीर परिवार की और से 'श्री प्रभाष जोशी को' हार्दिक श्रंद्धांजलि.
[अमित के सागर]

घरेलू हिंसा के मनोविज्ञान को समझना होगा - घरेलू हिंसा बहस - 4

प्राणीशास्त्रीय सम्बन्धों के आधार पर बने हुए समूहों में परिवार को सबसे छोटी इकाई के रूप में जाना जाता है। इस परिवार रूपी इकाई का निर्माण सम्भवतः सामाजिक सुरक्षा के लिए हुआ होगा। समय के साथ परिवार की अवधारणा में विकास हुआ और परिवार का ढाँचा बदला। संयुक्त परिवार से एकल परिवार, एकल परिवार के बाद नाभिक परिवार और अब नाभिक परिवार के बाद व्यक्तिवादी परिवार का निर्माण होने लगा।

परिवार के विविध स्वरूपों के निर्मित होने के बाद भी उसमें हिंसा का स्वरूप नहीं बदला। घरेलू हिंसा का स्वरूप अलग-अलग परिवारों में अलग-अलग रहा है, होता है। परिवार में होने वाली हिंसा के अध्ययन से पूर्व हमें इस बात को समझना होगा कि घरेलू हिंसा को केवल और केवल महिलाओं से सम्बन्धित हिंसा से न जोड़ा जाये।

आज घरेलू हिंसा के निराकरण में सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे सिर्फ स्त्री से सम्बन्धित कर देने से समाज में उसके निराकरण को लेकर सोच और समझ का नजरिया बदलने लगता है।

बहस से न भटकते हुए पहले घरेलू हिंसा के स्वरूप को समझना होगा। इस हिंसा के दो स्वरूप आसानी से देखने में आते हैं। एक तो घरेलू हिंसा महिलाओं के प्रति और दूसरा घरेलू हिंसा पुरुषों के प्रति। चूँकि समाजशास्त्रीय आधार पर तथा कानूनी एवं संवैधानिक आधार पर घरेलू हिंसा को महिलाओं से सम्बन्धित करते ही देखा जाता है। इस आधार के स्वीकार्य होने के बाद घरेलू हिंसा का रूप मारपीट से ही लगाया जाता है।

देखा जाये तो कानून की परिभाषा में घरेलू हिंसा केवल मारपीट ही नहीं है। गालीगलौज, धक्कामुक्की, मानसिक प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न आदि भी घरेलू हिंसा की परिधि में शामिल माने जाते हैं।

अब सवाल खड़ा होता है कि आज जब महिलाओं में शिक्षा का प्रसार भी हो गया है, रोजगार के क्षेत्र में भी महिलाओं ने अपनी धमक को दिखाया है तब महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा क्यों? घरेलू हिंसा को समझने के लिए उसके मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है।

महिलाओं के साथ होती हिंसा के पीछे कौन है, क्या कारण हैं, इन बातों के आधार पर घरेलू हिंसा को आसानी से समझा जा सकता है। घरेलू हिंसा केवल पुरुषों द्वारा ही होती है, इस बात को आधार बनाने की धारणा को त्यागना होगा। बिना किसी पूर्वाग्रह के हमें इस बात को भी स्वीकारना होगा कि यदि महिलाओं के प्रति हिंसक रवैया पुरुष का है तो स्त्रियाँ भी इसमें पीछे नहीं हैं।

घरेलू हिंसा के मारपीट वाले रूप को घर के पुरुषों द्वारा किया जाना माना जा सकता है। इसके पीछे पुरुष की सम्प्रभु होने की धारणा काम करती है। हमें स्वयं अपने घर के माहौल को समझना होगा और देखना होगा कि हम अपने बच्चों में बचपन से ही लिंग भेद को पैदा करवा देने हैं। घर के कठिन काम लड़के ही करेंगे, लड़कों की बात को लड़कियों को माननी ही चाहिए, लड़कों ने जो कहा है वह सही ही होगा की धारणा को अभिभावक ही अपने बच्चों में भरते हैं। इसके पीछे यदि पिता का हाथ होता है तो माता भी कम दोषी नहीं होती है।

यही बच्चे जब बड़े होकर किसी के पति-पत्नी के रूप में परिवार से जुड़ते हैं तो पुरुष प्रवृत्ति के सभी कुछ सही होने की अवधारणा शक्ति प्रदर्शन का केन्द्र बन जाती है। कुछ भी करने की, जो किया वो सही है की यही मानसिकता पुरुष को स्त्री पर, अपनी पत्नी पर, बहिन पर, बेटी पर हाथ उठाने को उकसाती है। कुछेक उदाहरण तो समाज में ऐसे देखने को मिले हैं जहाँ कलयुगी पुत्र ने माता के ऊपर भी हाथ उठाने में संकोच नहीं किया।

इसके साथ ही परिवार में आधिपत्य की धारणा भी हमें घरेलू हिंसा के दृश्य दिखाती है। कोई इसे सहज रूप में भले ही न स्वीकार करे किन्तु घर-परिवार में एक प्रकार का शासन काम करता है, आधिपत्य करने की भावना यहाँ भी काम करती है। पिता द्वारा अपने बच्चों पर रोबदाब दिखाना, पत्नी को अपने अधिकार में रखने की भावना को इसी रूप में देखा जा सकता है।

यही आधिपत्य की भावना सास में बहू के प्रति भी होती है। अपने शुरुआती दिनों से अपने लड़के को अपनी बात मानते देखना और शादी के बाद उसे पत्नी के साये में बढ़ते देखना किसी-किसी सास को सहज स्वीकार नहीं हो पाता है। यह स्थिति भी घरेलू हिंसा का कारण बनती है। कभी-कभी यह स्थिति गालीगलौज से प्रारम्भ होकर मारपीट तक आ जाती है।

नाभिक परिवारों के निर्माण के प्रति समाज में बढ़ रही आसक्ति, घर के अन्य सदस्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति भी परिवार में तनाव पैदा करती है और यही तनाव घरेलू हिंसा की ओर ले जाता है। सास-बहू की आपसी तकरार, बहू-ननद की नोंकझोंक से पैदा हुए तनाव को घर का पुरुष अपनी शक्ति के माध्यम से समाप्त करने का प्रयास करता है। परिणामतः घरेलू हिंसा के विविध रूप सामने दिखाई देते हैं।

घरेलू हिंसा बहुत ही व्यापक विषय है और आज यदि इसका निदान चाहिए है तो हमें परिवार की अवधरणा को समझना होगा, टूटते परिवारों को रोकना होगा। बात बे बात तुलसीदास को दोष देने के स्थान पर हमें अपनी सोच को दोष देना होगा जो एक महिला को महिला नहीं मानती। ये बात स्त्री और पुरुष दोनों पर लागू होती है। ‘‘बेटी को प्यार, बहू को अधिकार’’ के सूत्रवाक्य को अपनाकर हम समाज में महिलाओं के प्रति सकारात्मक सोच को बढ़ा सकते हैं, घरेलू हिंसा को बढ़ने से रोक सकते हैं।
उल्टा तीर के लिए
[डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर]
Related Posts with Thumbnails
"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका १५ अगस्त 8th march अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti Binny Binny Sharma boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage DGP dharm ya jaati Domestic Violence Debate-2- dongre ke 7 fere festival Friends With Benefits friendship FWB ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex SHADI PAR BAHAS shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)