* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. सधन्यवाद.
**१ अप्रैल २०११ से एक नए विषय (उल्टा तीर शाही शादी 'शादी पर बहस')के साथ उल्टा तीर पर बहस जारी...जिसमें आपका योगदान अपेक्षित है.*[उल्टा तीर के रचनाकार पूरे महीने भर कृपया सिर्फ और सिर्फ जारी [बहस विषय] पर ही अपनी पोस्ट छापें.]*अगर आप उल्टा तीर से लेखक/लेखिका के रूप में जुड़ना चाहते हैं तो हमें मेल करें या फोन करें* ULTA TEER is one of the well-known Hindi debate blogs that raise the issues of our concerns to bring them on the horizon of truth for the betterment of ourselves and country. आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं! *आपका - अमित के सागर E-mail: ocean4love@gmail.com, ultateer@gmail.com, Mob: +91- 9990 181944

सोमवार, 30 जून 2008

बहस के प्रश्न- समलैंगिकता- बहस वही


चूँकि भारत में समलैंगिकता कानूनन अपराध है, मगर समलैंगिक लोगों की वो जमात कहाँ जाके इन्साफ मागे...जिसके आगे-पीछे कई सवाल जो समाज के लिए मुंह उठाये खड़े हैं वहीं क़ानून के लिए भी! यधपि भारत के बाहर यानी विलायत में ये मसले जहाँ आम होते देखे-सुने-पढ़े जा रहे हैं. हैं, वहीं कानून में इन्हें जगह देते हुए अपनी मर्जी के मुताबिक जीने का अधिकार भी दिया जाने लगा है. भारत के महानगरों में आए दिन समलैंगिक जमात इकत्रित होके अपने हक की लड़ाई में मोर्चा निकालती है. जैसा की मुद्दे पर पैनी नज़र डाली जाए तो ये सिर्फ़ महानगरों की ही बात नहीं है...इक्का-दुक्का ही सही पर छोटे-छोटे गाँव से भी इस तरह की खबरें मिल रही हैं. साथ ही अगर पुरातत्व की भांती गौर-अध्ययन किया जाए तो समलैंगिकता आज की बात नहीं

आज ये मसला इसलिए भी ख़ास बन पढा है चूँकि अब समलैंगिक लोग इक बड़े समाज से हटके, उन्हीं के पड़ोसी बनके इक नई रूप-रेखा में रहने का हक भी माँगने लगे हैं. इक नए समाज का निर्माण होने को है?

समलैंगिकता को कहीं बहस का मुद्दा बनाके हम लोगों को समलैंगिकता की तरफ़ आकर्षित तो नहीं कर रहे? यह भी एक सवाल है. समलैंगिकता की ख़ास वजह कहीं नर और नारी का इक- दूसरे के प्रति अविश्वाश तो नहीं? क्या वाकई परवारिक संस्था को समलैंगिकता से ख़तरा है? यदि पुरूष-स्त्री अनुपात में असंतुलन आता है तब क्या समाज ऐसे रिश्तों को मान्यता नहीं देगा? जैसे सवाल कई और भी हैं।

बहस की शुरुआत से अब तक मिले प्रतिसादों को ध्यान में रखें तो समाज की नज़र में समलैंगिकता अभी विचाराधीन है? मगर कब तक?

अपनी राय प्रतिक्रियाएँ भेजते रहिये क्योंकि बहस अभी जारी है मेरे दोस्त...

गुरुवार, 12 जून 2008

आ गई नयी बहस !!



"उल्टा तीर पर एक और साहसिक बहस"


जड़ता-मूढ़ता में जकडे हमारे भारतीय समाज को उल्टा तीर की एक और चुनौती। उत्तेजक बहस के इस मंच पर बहस का एक और जलजला। इस बार की बहस समलैंगिकता पर" क्या परदों में बंद समलैंगिक रिश्तों को समाज स्वीकृति दे दे ?" इस बार उल्टा तीर पर समाज में तेज़ी से बढ़ रहे इस चलन पर पूरे महीने बेबाक चर्चा और बहस। बहस में भाग लीजिए। अपने विचार खुल कर रखिये, क्योंकि बहस शुरू हो चुकी है मेरे दोस्त

आपका;
अमित के सागर
(उल्टा तीर)

बुधवार, 4 जून 2008

कहाँ -कहाँ चले उल्टा तीर के तीर-बहस वही (५)


कहाँ कहाँ चले "उल्टा तीर" के तीर
बहस उत्तेजक थी तो ये तो होना ही था .उल्टा तीर कमाल कर गया निशाने पर लग गया .और हमारी बहस के तीर पहुँच गये अन्य ब्लॉग पर भी समुन्दर की तरह है इंटर नेट की दुनिया, इसलिए मैं भी नही जानता ये बहस और कहाँ कहाँ चल रही है .जितने तीर मेरे हाथ आए पेश है आपके लिए साभार उन सभी का जिन्होंने अपने ब्लॉग पर इसे जगह दी .आभार उनका भी जो सीधे मुझ तक नही पहुँच पाये या फ़िर मैं उनतक नही पहुँच पाया .बहस तो बहस है जीतनी चले उतना ही अच्छा होगा निष्कर्ष निकल आएगा एक दिशा भी मिल जायेगी .आप सभी से निवेदन है उल्टा तीर में आपका भी स्वागत है
आपका* अमित के सागर
रंजू ranju ने कहा
अमित जी आपके सवाल का जवाब मैंने यहाँ दिया है। क्यूंकि वाकई अभी बहस जारी है।
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ज़रा सोचिये !! पर
http://ultateer।blogspot.com/
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जरा यूं भी सोचिये...
परिवार टूटने
लगे हैं बिखरने लगे हैं? महिला घर पर रहे, क्या इस से समस्या सुलझ जायेगी?. और ना सिर्फ़ वक्त बेवक्त की मुसीबत के लिए उसके अपने लिए भी अपने पेरों पर खड़ा होना सवालंबी होना जरुरी है बात महिला के घर पर रहने की या न रहने की नही है असल में बात है माता पिता दोनों को वक्त देने की अपने बच्चो को अब घर पर माँ है तब भी बच्चे टीवी देखेंगे और नही है तब भी देखेंगे. नेतिकता का पतन उतनी ही तेजी से हो रहा है जितनी तेजी से हम तरक्की की सीढियाँ चढ़ रहे हैं. हर कोई अब सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है. संस्कार माँ बाप दोनों मिल कर बच्चे को देते हैं. जीवन के इस अंधाधुंध बढ़ते कदमों में जरुरत है सही दिशा की सही संस्कारों की ...और सही नेतिक मूल्यों को बताने की .. हर अच्छे बुरे की पहचान पहले उसको अपने माँ बाप दोनों के आचरण से होती है आज के बदलते हालात का मुकाबला माता पिता दोनों को करना है और अपने बच्चो को देने हैं उचित सही संस्कार..यह हालात हम लोगो के ख़ुद के ही बनाए हुए हैं नही तो यूं ही अरुशी केस होते रहेंगे और इंसानियत शर्मसार होती रहेगी ...आप इसको जरा यूं भी सोचिये...
रंजू ranju-:
Comments:

*DR.ANURAG ARYA said...
मैंने अमित जी का लेख नही पढ़ा है पर आपकी बातो से कुछ कुछ अंदाजा लगा सकता हूँ दरअसल इस घटना मे माँ का बाहर कम करना या नही करना उत्तरदायी नही है....कई पहलू है ,दरअसल हमारे सामाजिक के नैतिक मूल्य गिर रहे है ,आम व्यक्ति का चरित्र पतन पर है
*कुश एक खूबसूरत ख्याल said...
माँ अगर घर में रहे तो बच्चे एम टी वी रोडीज में जाकर खुले आम गालिया निकलते है.. नेतिकता मर रही है.
*बाल किशन said...
अभी तो मैं सिर्फ़ यही कह सकता हूँ कि एक सार्थक बहस है. और जितनी बढे उतना ही सबके लिए अच्छा है आख़िर हम सब इन मुद्दों से किसी ना किसी रूप मे जुड़े हैं.
*शोभा said... मैं रंजना जी आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। नारी का नौकरी करना और ना करना इस तरह की समस्याओं का कारण नहीं है। आज के युग में नारी का नौकरी करना युग की आवश्यकता है। किसी भी घटना के लिए किसी एक को दोष देना मूर्खता है। मुझे अमित जी की सोच बहुत बचकानी लगी या ये भी हो सकता है कि अमित जी इस तरह अपने ब्लाग को लोकप्रिय बना रहे हों।
*डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said... मित जी और रंजू जी की टिप्पणियां पढीं. दोनों ही ने अपनी अपनी तरह से इस दुखद प्रकरण पर अप्नी चिंताएं ज़ाहिर की हैं. यह शुभ है. ज़माना बदलता है, पुराना बहुत कुछ जाता है, नया आता है. हर नया सदा खराब नहीं होता और सारा पुराना अच्छा ही था. दर असल महत्वपूर्ण यह है कि हम जिसे अपनाते हैं, उसका उपयोग करते हैं या दुरुपयोग. स्त्री का नौकरी करना, तकनीक, आधुनिकता, समृद्धि इन सब पर ये बात लागू होती है. सरलीकरण से बात बनती नही बिगडती है.

पल्लवी जी ने उठाया एक और मुद्दा
चल गया एक नई दिशा में तीर

चौथी घटना इन सभी घटनाओं में जो बात कॉमन है वो ये की सभी अच्छे घरों के बच्चे थे और सभी के माता पिता उनकी गतिविधियों से अनजान! आज एक ब्लॉग पर पढा की आरुशी हत्याकांड को देखते हुए अब वह वक्त आ गया है की नारियों को घर की और रुख कर लेना चाहिए!

समस्या इतनी गंभीर है! यदि माँ घरेलू महिला है तो स्वाभाविक रूप से वह ज्यादा वक्त दे सकती है.. और यदि दोनों ही कामकाजी हैं तो ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है!क्योकी पैरेंट्स की एब्सेंस में बच्चे ज्यादा छूट पा जाते हैं और यदि किशोर होते बच्चों पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया गया तो जिम्मेदार भी पैरेंट्स ही होंगे!

Comments:

ब्लोगर:- एकल परिवारों में ज्यादातर पिता के पास ही समय नहीं होता, और माँ के लाड़ प्यार और गलतियाँ नज़रंदाज़ करने से बच्चे अक्सर गुमराह हो जाते हैं. और फ़िर अगर माता-पिता दोनों ही के पास सीमित समय हो तो बच्चे को न तो अपनापन मिलता है और न ही अनुशासन के संस्कार. ऐसे बच्चे आगे जीवन में बीमार मानसिकता वाले न निकलें तो यह चमत्कार ही माना जाएगा. May २५,८ Blogger
*रंजू-said...आज हमारे समाज में जो भी घट रहा वह हमारा ही किया धरा है .परिवर्तन वक्त की मांग है पर यह इतना भी न हो कि हम इंसान से हेवान बन जाए और आस पास होने वाले हालात से कुछ महसूस करने वाले हालात में ही न रहे. May 25, २००८
*-said...अगर आप अपने बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखायेंगे तब कोई और उन्हें ग़लत बातें सिखा देगा. 'बच्चे आपके हैं तो जाहिर है जिम्मेदारी भी आप की है'. इन सब से एक ही निष्कर्ष निकलता है की माता पिता दोनों को बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और उसे पूरा करने के लिए समय निकालना होगा.May 25, ०८
*विचार-said...एक एक पेड़-पत्ते को गिनने के बजाय पूरे जंगल का परिदृश्य देखना होगा. फ़िर भी, एक ऐसे इन्सान की मानसिकता देखें, जिसके जीवन में किसी एक अभिभावक की कमी शुरू से रही हो या जो कलही-तनावपूर्ण वातावरण में बड़ा हुआ हो.अब किसी ऐसे इन्सान के बारे में सोचें जिसकी परवरिश एक सामंजस्यपूर्ण परिवार में हुई हो, अन्तर अपने आप सामने आ जाएगा. अक्सर ऐसा भी देखने में आता है की पिता भले ही अपराधी ही क्यों न हो, अगर माँ सौम्य स्वाभाव की है तो संतान काफी सभ्य-सुशील निकलती है (पर व्यक्तित्व मे कोई न कोई ग्रंथि-कुंठा अवश्य ही छिपी रह जाती है).
पर अगर माँ ग़लत राह पर हो तो बच्चे का भविष्य निश्चित ही बर्बाद है. क्योंकि फ़िर ही बात, की माँ से बढ़कर कोई गुरू नहीं हो सकता और पिता कभी चाहकर भी माँ की जगह नहीं ले सकता.
*आशा जोगलेकर-said...अच्छी बहस है । तो निर्णय तो यही हुआ न कि जिम्मेदारी दोनो की है । माँ से बच्चे ज्यादा घुले मिले होते हैं और पिता का अनुशासन और थोडा बहुत डर भी बहुत जरूरी है । May 26, 2008
*यक्ष-said...आपने जो किया प्राकृतिक न्याय के सिध्दांत से बिलकुल सही किया।वरना कितनो को अपराधी बनने से रोका जा सकता था। मै आपकी प्रक्रिया और चिंतन की दाद देता हूँ।बहूत सी बाते घटनाए जानता हूँ,लिख सकता हूँ,किंतु आपकी पोस्ट से जाहिर है, आपका दृष्टिकोण अपराध रोकना,अपराधी होने से रोकना है। माता पिता से आपकी अपेक्षा सही है। May 26, 2008
*डुबेजी-said...ब्लॉग पर आजकल जिस तरह की बहसबाज़ी छिड़ी रहती है दरअसल उसमें विचारों को उद्भासित होने का अवसर कम मिलता है और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ज़्यादा। दूसरों को गालियॉ देकर दिल को तसल्ली देने वालों कीभी जमात कम नहीं है।

सोमवार, 2 जून 2008

मिल ही गये ख़त !! बहस वही (४)

चूंकि नारीवाद पर "उल्टा तीर" पर जारी ये बहस उत्तेजक है, और शायद हमारा समाज अभी इस तरह की उत्तेजक बहसों के लिए पूरी तरह तैयार नही है. इसलिए मैंने बीते कुछ दिनों से ये आस छोड़ दी थी कि कोई इस बहस में भाग लेगा भी तो क्यों? हाँ, मगर इस तरह की बहस आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है बावजूद इसके समाज की असहभागिता हैरत की बात है. मैंने इस बहस को उल्टा तीर के खुले मंच पर रखा...ताकि लोग खुलकर अपने विचार रखें. लेकिन हुआ क्या? उल्टा तीर की बहस का ये मुद्दा दूसरे ब्लॉग पर परचम की मानिंद लहराने लगा। दूसरे ब्लॉग पर चर्चा आम हो गई (लेकिन साथ ही एक तरफा भी) उल्टा तीर नेपथ्य में चला गया। किंतु अब इस बहस के बाबाद आपकी ओर से लेख-ख़त-प्रतिकिरियाँ मिलने लगीं। एक साथ चार-चार कमेंट भी. मैं ग़लत था, समाज इन मुद्दों पर वाकई चर्चा करना चाहता है. पेशे-खिदमत है, उल्टा तीर को मिले खतों का नज़राना'
जिनके माध्यम से इस बहस को समझने-समझाने में और भी आसानी होगी. बहस को भी नई दिशा मिलेगी.
इस आभार के साथ आपका; *अमित के. सागर
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(१)

मैं आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ कि "नारीवाद मक्कार पुरुषों की देन है".

और कुरान अल्लाह के अनुसार; हमने मर्द को औरत पर हाकिम बनाकर पैदा किया है।
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"अय्युर मालिक" (कतर, दोहा सिटी) के द्वारा -June 1, 2008 2:22 AM
-मेल- gayyurmalik74@gmail.com (No Blog)

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(२)
जो कुछ हो रहा है; सिर्फ एक पोलिटिकल स्टंट है!....इससे आम लोगों को- न स्त्रिओं को और न ही पुरुषों को- कोई फयदा पहुंचने वाला है!...बढिया सब्जेक्ट है।
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"जायका" (दिल्ली) के द्वारा -June 2, 2008 11:53 पम
http://jayaka-rosegarden.blogspot.com
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(३)
जो नर नक्कारा, बदचलन और कामचोर होते है वह नारी को बहला फुसला कर उसके परिवार और समाज से उसका नाता ख़त्म करते फिरते -बाद मैं उसका शोषण करते हैं। उसके बाद अक्सर नारी के पास कोई अन्य उपाए नहीं होता वह वही करती जो नर चाहता है वह रात दिन मेहनत करती है लेकिन और वह नर उसकी मेहनत की कमाई से मौज लूटता है आराम से लेटे लेटे नारी के जिस्म को नोचता है पशु के समान उसे कार्य लेता है और नारी जब आराम करना चाहती है तो नर उसे पिछड़ जाने का डर दिखा कर काम करते रहने के लिए विवश करता है।

ये एक नारी के लिए बहुत बड़ी चुनोती होती है. ओरत परिवार की जिम्मेदारी जिस उतम तरीके से निभाती है. वह सराहनीय है।... बल्कि वह उसे अपने हितपूर्ति के लिए काम करने की प्रेरणा देगा अक्सर आपने अपने आसपास देखा भी होगा ओरत को सभी जगह चाहे वह राजनीति हो अथवा अर्थनीति नारी को केवल मुखोटा बना कर इस्तेमाल किया जाता है और वह सभी फायदा उठाने का प्रयाश किया जाता है जिससे नक्कारा, बदचलन और कामचोर पुरुष नेतृत्व को लाभ हो ? कुछ स्वार्थी तत्व हमेशा इसी तरह हर जगह नारी को बरगलाकर उनसे फायदा उठाते है लकिन इसका नुकशान आप आज समाज मैं गिरते हुए नारी सम्मान के रूप मैं देख सकते हो।

"उल्टा तीर" ब्लोग पर जारी बहस को पढ़ने पर मुझे लगा की इस पर बहस जा रहें और यदि कोई हल मिले तो इसे नर और नारी, जो एक दुसरे के पूरक हैं, को जरूर बताया जाये। इस बहस के लिए धन्यवाद लेखक महोदय।
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"करमबीर पंवार" (नई दिल्ली) के द्वारा -June 1, 2008 5:57 PM
karmkarnkamal@gmail.com(NoBlog)
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(४)
नारीवाद का विचार सिर्फ़ पुरुषों की देन है यह आपसे किसने कह दिया
. आप फ्रांस मशहूर लेखिका सिमोन डि बेवर को शायद जानते होगें. नारीवाद का विचार उन्हीं की देन है. उनकी किताब द सेकंड सेक्स पढ़ें.सिमोन द बोउआ का यह कथन दुनिया भर में उद्धृत किया जाता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। अर्थात आज हम जिस स्त्री को जानते हैं, वह जैविक से अधिक सांस्कृतिक इकाई है। स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। इस बात को याद किया जाना चाहिए
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"राम कृष्ण डोंगरे" (नॉएडा) के द्वारा-June 2, 2008 1:36 PM
http://dongretrishna.blogspot.com
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(५)
इस बहस से कुछ मामलों मे नारी होते हुए भी सहमत हूँ.यकीनन ये बात सौलह आने सच है कि समाज में संस्कारों अच्छे विचारों और मानवीय मूल्यों की जननी सिर्फ और सिर्फ नारी ही है.बहस के सूत्रधार से मैं इस बात पर भी सहमत हूँ कि प्रकृति ने नारी जाति को भावनाओं से भरकर समाज को एक नया अर्थ प्रदान किया है.अब सवाल उठता है कि क्या केवल नारी की ही ये जिम्मेदारी है.दरअसल, पुरुष और नारी ये रथ के वो पहिये है जो साथ साथ चलकर ही समाज को परिवार को नयी दिशा दे सकते हैं. परिवार को बचाने के लिए नारी इस त्याग के लिए भी तैयार हो भी जाये और घर मे बैठ जाये तब भी क्या पुरुष उसे वो सम्मान और हक देगा मेरा यही सवाल है. ये बहस वाकई में गंभीर है. इसकी गंभीरता बनी रहे मेरी यही राय है।
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"सुप्रिया" (मुम्बई) के द्वारा-May 24, 2008 4:36 AM
http://supriya08.blogspot.com
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(६)

आज न तो संयुक्त परिवार हैं और न किसी के पास समय जोकि वो अपने परवर को ढंग से देख सके। मेरे विचार से तो इसके लिए उपभोक्तावादी संस्कृति जादा जिम्मेदार है।
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"शिवम शुक्ला" (भोपाल) के द्वारा-May 25, 2008 8:34 AM
http://grooghantaal.blogspot.com/
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(७)
पुरुष अगर खुद के दम पर कुछ हासिल नहीं कर पा रहा है तो इसमें दोष पुरुष का ही है नारी का नहीं। २१वीं सदी में नारी घर बैठ जाए, क्या ये संभव है? ये वक़्त के दरकार है कि नारी को बराबरी का हक मिले. ये मुद्दा समाज को बहुत पीछे लेजाने की बात कहता है.
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"अमिताभ फौजदार" (दिल्ली) के द्वारा-May 19, 2008 8:30 AM
http://dilseamit.blogspot.com
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(८)
नारी को कमजोर समझना,स्तिथी के पीछे पुरुष का बड़ा हाथ है। तब शायद नारी ने पुरुष के हर काम को कर दिखाने की ठानी. अब भी कुछ निठल्ले पुरुष अपनी निठाल्लता को छुपाने केलिए आज भी स्त्री पर जोर आजमाते हैं. जिसके चलते वो नारीवाद को भला-बुरा कहने लगे. जहाँतक नारियों के चलते बेरोजगारी की बात है तो सितारे रौशनी के मौह्ताज़ नहीं.
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"बंटी" के द्वारा-May 19, 2008 9:02 PM
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(९)
नारियाँ दोहरी जिंदगी जीती हैं बेशुकून। बदले में क्या मिलता है समाज से; उपेक्षा, तिरस्कार, व्यंग. जबकी वो घर-वार से लेके सामाजिक तक सभी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वाह करती है.
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"सुरभी" के द्वारा-May 20, 2008 1:04 AM
http://kamhaiaapse.blogspot.com/
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(१०)
नारीवाद का विचार पुरुषों की दें नहीं है। ये तो नारियों ने खुद ही पैदा किया है. नारियाँ खुद ही पुरुषों से खुद को आगे देखना चाहती हैं. और शायद नारी अपना अस्तित्व भूलती जा रही है, कि वो कभी सीता के रूप में भी इस धरती पे आई थी, और उनको आज समझ देवी की तरह पूजता है. इसलिए अगर आज की नारी भी चाहती है कि वो भी पूज्यनीय बने तो उसे पुरुषों स होड़ कर सीता की तरह रहना सीखना होगा.
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"मयंक" के द्वारा-May 20, 2008 2:15 AM
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(११)
बात से कुछ हद तक सहमत हुआ जा सकता है यह सच है की ओरत को जीवन मैं दोहरी जिम्मेदारी इसे नर के कारण ही उठानी पड़ती है नही तो ओरत परिवार की जिम्मेदारी जिस उतम तरीके से निभाती है उसे देखते हुए ही उसे अन्य जिम्मेदारी नौकरी या राजनीती के श्चेत्र मैं दी है जिसे उसने पूरी सिद्त से साबित भी किया है लकिन कहीं न कहीं इस कारण परिवार और समाज मैं नारी का समान खो गया है क्योकि नारी नर से आगे निकलने के चक्कर मैं इन्ही लोगो के हाथ की कटपुतली बन गयी है जिसे आप आरक्षण की राजनीती और इसे ही रिज़र्व स्थानों पर देख सकते हो अगर आप देखना चाहते हो कोई भी स्त्री अपने पिता, भाई और पति को घर मैं नक्कारा बैठा नहीं देखना चाहेगी इसलिए नर को अपनी जिम्मेदारी और ओरतो को उनके लिए काम का मौका देना होगा
अंत मैं मैं आपसे इस तरह के उन्मुक्त और जिम्मेदारी वाले विचारो के प्रसार को हर तरह से आगे बढाने का अनुरोध करुगी और इसे केवा बहस का रूप ही मत दीजिये बल्कि एक जन आन्दोलन का रूप देने का अथक प्रयास करे.
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"बबीता" के द्वारा-May 22, 2008 2:36 AM
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(१२)
इक्दम सही लिखा है। नारी घर-परिवार की सुन्दरता है. नारी को बराबरी का दर्जा मिलाना चाहिए. लेकिन येसा नहीं जैसा राजनितिक दल देना चाहते हैं. शिक्षा में आगे व सम्म्पत्ति में ५० प्रतिशत का हक मिलना चाहिए और राजनीति व फिल्मों नहीं नारियों को नहीं जाना चाहिए.
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"गिरिराज अग्रवाल" (जयपुर) के द्वारा-May 22, 2008 10:11 AM
http://naaradvani.blogspot.com/
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(१३)

ख़त और भी हैं..जारी...
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अगली
पोस्ट में पढ़ें ...
"दूसरे ब्लॉग पर भी
"उल्टा तीर" के तीर "

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"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका १५ अगस्त 8th march अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti Binny Binny Sharma boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage DGP dharm ya jaati Domestic Violence Debate-2- dongre ke 7 fere festival Friends With Benefits friendship FWB ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex SHADI PAR BAHAS shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)