* उल्टा तीर लेखक/लेखिका अपने लेख-आलेख ['उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ'] पर सीधे पोस्ट के रूप में लिख प्रस्तुत करते रहें. **(चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक, ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिखें ) ***आपके विचार/लेख-आलेख/आंकड़े/कमेंट्स/ सिर्फ़ 'उल्टा तीर टोपिक ऑफ़ द मंथ' पर ही होने चाहिए. सधन्यवाद.
**१ अप्रैल २०११ से एक नए विषय (उल्टा तीर शाही शादी 'शादी पर बहस')के साथ उल्टा तीर पर बहस जारी...जिसमें आपका योगदान अपेक्षित है.*[उल्टा तीर के रचनाकार पूरे महीने भर कृपया सिर्फ और सिर्फ जारी [बहस विषय] पर ही अपनी पोस्ट छापें.]*अगर आप उल्टा तीर से लेखक/लेखिका के रूप में जुड़ना चाहते हैं तो हमें मेल करें या फोन करें* ULTA TEER is one of the well-known Hindi debate blogs that raise the issues of our concerns to bring them on the horizon of truth for the betterment of ourselves and country. आप सभी लोगों को मैं एक मंच पर एकत्रित होने का तहे-दिल से आमंत्रण देता हूँ...आइये हाथ मिलाएँ, लोक हितों की एक नई ताकत बनाएं! *आपका - अमित के सागर E-mail: ocean4love@gmail.com, ultateer@gmail.com, Mob: +91- 9990 181944

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

ज़ख्म ताज़ा रखो, कुछ कर गुज़रो

घटना चाहे मुंबई की हो या फ़िर दिल्ली की या देश के किसी भी कौने की, लोग ४ दिन के बाद आया-गया कर देते हैं या फ़िर कर देंगे. ख़ुद सरकार भी. आख़िर क्यों हम अपने इस खोखले तंत्र को और अपनी झूंठी शान को कायम रखते हैं हमेशा...क्यों तभी भड़कते हैं जब कोई अमानवीय हादसा हो ही जाता है. क्यों लोग इस कदर अपने-अपने में खो गए हैं कि उनके दिलों में दूसरों का दर्द महसूस करने की शक्ती नहीं रही. क्या हम तभी बौखलाते हैं जब हमारा कोई अपना या फ़िर जानकार या रिश्तेदार उस हादसे का शिकार होता है. और उससे पहले हमारे लिए सब कुछ इक तमाशे की तरह होता है। मैं मानता हूँ कि अगर हमें बेहतर आज और कल चाहिए, तो दुनिया के हर एक नागरिक के साथ साथ जो इस देश को चला रहे हैं, जिनके कन्धों पर आम आदमी की हिफाज़त का बोझ है...सभी को ईमानदार रहना होगा हर एक काम में. बेमानी जहाँ भी होगी, वहाँ के हालत बद से बदतर ही रहेंगे हमेशा ही. मुझे ये बात कहने में कोई शर्मिंदगी नहीं कि हमारे तंत्र की जड़ें ही बेकार हैं, जिन्हें या तो नए सिरे से उगाया जाए या फ़िर इनकी ऐसी मरम्मत की जाए कि हमेशा के लिए लोहा बन जाएँ अमानवीय क्रतों के ख़िलाफ़. हर आदमी को निस्वार्थ होना होगा, यह एक बड़ी शर्त होनी चाहिए स्वंय आदमी के लिए. यहाँ बहुत कुछ सिर्फ़ इसलिए बुरा घटित होता ही रहता है चूँकि उसमें किसी न किसी का स्वार्थ छुपा रहता है. इस तरह मुमकिन नहीं कि हम इक स्वच्छ समाज और देश की बात करें. सब ढोंगी पाखंडियों की भाती क्यों हो चले हैं?...इक पत्रकार इस बात में खुश रहता है कि वो सबसे पहले पहुंचकर घटनाक्रम को कैमरे में उतार रहा है, इक-इक बात को बयां कर रहा है. इसके लिए उसे बड़ा इनाम भी मिलेगा और साथ ही उसका नाम भी बढेगा. वो पत्रकार ये नहीं करता कि जितना सम्भव हो सके उसमें उस घटना को शांत करे, उसे होने से बचाए, अपना योगदान इस बात के लिए दे कि वो इक इंसान है, और जिसका भी जिस भी प्रकरण में लहू बह रहा है वही लहू उसके ख़ुद के अन्दर भी है. एक पुलिस वाला सिर्फ़ कुछ मामलों को इसलिए दवा देता है चूँकि उसे रिश्वत में कुछेक हज़ार रुपये मिल जाते हैं. एक secuirty गार्ड किसी को भी अन्दर इस लिए जाने देता है क्योंकि उसे टिप में ५० या १०० रुपये मिल जाते हैं. पेट की भूंख इतनी क्यों है...कि वो कैसे भी बुझती ही नहीं. दुनिया की बड़ी बड़ी खुफिया एजेंसियां दुनिया के विचित्र और बड़े-बड़े केसों को सिर्फ़ इसलिए फाइलों में ही अंततः बिना अपराधी को सजा दिए इसलिए बंद कर देतीं हैं चूँकि उन्हें करोड़ों में धन-राशि मिल जाती है. और आम जनता कभी उससे सवाल-जवाब करने की हिमाकत नहीं करती. शेष बचे अमीर, उनके पास समय नहीं। वाकी के बचे हुए लोगों के बीच निश्चित ही यह धन राशि बंटती हो (jo baudhik paksh bhi hai), तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। और राजनेताओं की तो बात ही निराली है. इनको सबसे पहले अपनी जीत प्यारी है. राजनीति में ये मौतों पर भी राजनीति करने से नहीं चूकते वाकी का हाल क्या होगा...कहना ज़रूरी नहीं. यकीनन....लोगों का लोगों से यकीन गायब है. क्या सब इसी तरह चलता रहेगा...इसकी हम उम्मीद न करें...मगर किस और दूसरी खोखली बिना पर...और कब तक?

मुंबई में जो कुछ भी बुरा घटित हुआ है. मुमकिन है सिर्फ़ एक तारीख बन जाना. मगर अब भी जल रहे हैं दिल और आंखों में नाच रहे हैं मौतों के मंज़र और तबाहियों की तस्वीरें अब भी हैं आंखों में तो वक़्त है अभी कि आँसू पोंछ हम वो काम करें जिससे आगामी हो सकने वाली इस तरह की घटनाओं पर इस बात का यकीन फरमा सकें कि अब ये मुमकिन नहीं चूँकि हम ईमानदार हैं एक-दूसरे के लिए. हम इतने अपाहिज तो नहीं कि ये मातम कुछ-कुछ महीनों बाद अक्सर ही देखते रहें. अब हमें घटना का खंडन नहीं करना चाहिए बल्कि अमल कर अपने दुश्मन से लड़ना चाहिए. बहुत हो गया. यही वक़्त सही है (जैसा कि हर घटना के बाद होता है...पर वो भी जाया ही होके रह जाता है) जब हम सब संगठित होकर कर दें आगाज़ क्रान्ति का...यही वक़्त है जब हम अपने हरे ज़ख्मों के साथ दुगनी शक्ती के साथ लड़ सकते हैं दुशमनों के ख़िलाफ़...आतंकवाद के खिलाफ़. और अगर अभी नहीं तो शायद कभी नहीं!

"संगठित हों, बुराई के ख़िलाफ़ ताकत बनें. एक-दूसरे के साथ हों, महफूज़ हर कदम चलें."
जय हिंद
अमित के. सागर
---
सभी सुधी पाठकों व लेखकों सूचित किया जाता है कि जनवरी माह में "उल्टा तीर पत्रिका" आंतंकवाद पर एक विशेष "वेब पत्रिका" प्रकाशित करने जा रहा है. आप सभी से अनुरोध है कृपया अपने लेख-आलेख, गीत, कवितायें, ग़ज़ल, शायरी इत्यादि 25 दिसम्बर 08 तक "उल्टा तीर" पर अपनी एक तस्वीर व संक्षिप्त परिचय के साथ मेल करें. आपका अनमोल सहयोग व मार्गदर्शन अपेक्षित है. आओ हम सभी मिलकर आतंकवाद से लड़ें. आभार; "उल्टा तीर" E-Mail: ultateer@gmail.com, ocean4love@gmail.com


शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

इस बार बहस नहीं !



आंतकवाद से लडाई में हम सब साथ हैं। यही वो समय है जब हम सबको एकजुटता के साथ मजबूती से इस समस्या से मिलकर लड़ना होगा । कहते हैं "युद्ध के समय शान्ति की बात बेमानी हो जाती है " आतंकवादियों का कोई मजहब कोई दीन ईमान नही है। इनकी फितरत केवल हिंसा दहशत गर्दी और मौत का तांडव करना है । इस बार "उल्टा तीर" सम्पादकीय बोर्ड ने तय किया है कि आंतकवाद के मुद्दे पर अब हम कोई भी बहस नही करेंगे। क्योंकि उल्टा तीर की नज़र में आंतकवाद जेरे बहस का मुद्दा नही। बल्कि एक ऐसा नासूर है जिसका इलाज हर कीमत पर होना चाहिए। इस बार हम पूरे महीने आंतकवाद से कैसे लड़े इस बिन्दु पर आपके साथ विमर्श करेंगे। हम सभी मिलकर इस लड़ाई में अपनी अपनी भूमिका तय करेंगे। नो डिबेट ओनली एक्शन के मूल मंत्र के साथ आप भी हमसे अपने विचार अपने तरीके हमारे देश विदेश में बैठे सभी सुधि पाठकों के साथ बाटें। उल्टा तीर आपका अपना मंच है। हम सभी मिलकर आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर लडेंगे।

"ये बात समस्या केवल विचारों की नही
इस लड़ाई को हमें आचरण में लाना होगा "

आपकी भावनाओं का इस मंच पर हार्दिक स्वागत है
एक अच्छा कल लाने के लिए हम सब मिलकर लड़े

चलते चलते आप सभी के लिए "उल्टा तीर" के हमारे सहयोगी "अमिताभ" की मुंबई धमाके पर एक कविता "हम भूले" प्रस्तुत है।


मैं चाहूँगा अब ये दर्द
हम में से कोई भी भूले
तबाही की काली रात का मंज़र
हमारे दिलो में अब जिंदा रहे

एक आग बनकर
एक तड़प एक टीस
दिलों में जिंदा रहे

हम भूले
हम भूले

हमें इस दर्द से ही अब
धधकते अंगारे सीने में जलने होंगे
सीने में आग जले

मैं चाहूँगा अब ये दर्द
हम में से कोई भी भूले
कोई सांत्वना नही
कोई दिलासा नही

घावों पर कोई अब
मरहम भी नही

मैं आँखे खोल के रखना चाहता हूँ
इस दर्द इन घावों से
आँख मिलाना चाहता हूँ

मुझे अब मायूसी में
मातम नही करना है
मुझे अब शोक में
मोमबत्तियों भी नही जलानी

मैं तो आग लगाना चाहता हूँ
अब इस वहशत का अंत चाहता हूँ

सीने में अब ये आग जलती रहे
पीड़ा ये सुलगती रहे
घाव हमें दिखते रहे

ये दर्द अब हौसला बने
ये दर्द अब फ़ैसला बने

इस दर्द से आँख मिलाये हम सभी
इस दर्द को हम भूले अब कभी
इस दर्द को बना ले
अपनी ताक़त हम सभी
!!

(सौजन्य :दिलसेअमित)

उल्टा तीर सम्पादकीय मंडल

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

आओ आतंकवाद से लड़ें!

आतंकवाद. आतंकवाद और सिर्फ़ आतंकवाद. कुछ महीनों से सिर्फ़ यही एक शब्द कानों में घर किए हुए है. जिससे न सिर्फ़ कान हैरान और परेशान हैं बल्कि शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा इसके दर्द और आतंक से डरा हुआ, सहमा हुआ और ज़ख्मों से सरोवर है. और आतंक है कि दिन-ब-दिन फसल की भांति बढता है जा रहा है. कमसे कम मुंबई में हुए इस कृत की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, पर ऐसा मानना अब अतिशयोक्ति नहीं कि अब कहीं भी कभी भी कुछ भी बुरा घटित हो सकता है. और एक बात जो साफ़ होनी ही चाहिए कि आतंकियों के निशाने पर अब सिर्फ़ आम आदमी ही नहीं बल्कि हरेक वर्ग का आदमी है. वो चाहे अमीर हो या फ़िर गरीब. आतंकवादियों का निशाना और लक्ष्य सिर्फ़ तबाही और आतंक फैलाना है. दूसरी अहम् बात; आतंकवाद को सिर्फ़ सरकार ही ख़तम कर सकती है, यह हमारी बड़ी भूल हो सकती है. वैसे भी सरकार ही हर मसले की जिम्मेदार नहीं हो सकती. लेकिन सरकार का एक भी मुलाजिम अगर आतंकवादियों का साथ देता है, वो फ़िर चाहे किसी भी रूम में क्यों न हो; वो भी आतंकवादी ही कहलाया जाना चाहिए. यह वक़्त अब ही नहीं आया है...बल्कि यह वक़्त अविरल धारा की तरह बह रहा है...जब हम कुछ कर सकते हैं...आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमन और चैन के लिए. हमें ज़रूरत है सोये हुए लोगों को जगाने की और आतंक के ख़िलाफ़ एक ऐसी मुहिम छेड़नी की जो क्रान्ति ला सके...सचमुच आज हिन्दुस्तान को फ़िर से एक बड़ी क्रांती की जरूरत है जबकि आतंकवाद न तो पुराना मुद्दा है और नाहीं सिर्फ़ हिन्दुस्तान का.

मुंबई के आतंकी हमले से विचलित हुईं बुजुर्ग महिला (हम नौज़वान होकर भी सुस्ता क्यों रहे, जबकि हमें देश का भविष्य और न जाने क्या-क्या नहीं कहा जाता?) "शमा" जी का यह लेख "मेरी आवाज़ सुनो!" आपके लिए जो शायद आपके अन्दर उस भाव को उस बेदना को महसूस करा सके, जिन्हें लोग जी रहे हैं. साथ ही इक जोश भर सके..आतंकवाद के ख़िलाफ़...

बहस अभी भी जारी है...यकीन करें आपका योगदान और बोलना कतई जाया न जायेगा.

"जनमानुष संबंधित हर आग में मुझे भी झुलसाया जाए,
जिधर से भी प्रवाह हो लपटों का,
आग के उस मसीहा से मुझको भी मिलाया जाए।"

अमित के. सागर

मेरी आवाज़ सुनो!

अपनी आवाज़ उठाओ....कुछ मिलके कहें, एकही आवाज़ मे, कुछ करें कि आतंकवादी ये न समझे, उनकी तरह हमभी कायर हैं.....अपनेआपको बचाके रख रहे हैं...और वो मुट्ठीभर लोग तबाही मचा रहे हैं.....हम तमाशबीनोंकी तरह अपनीही बरबादीका नज़ारा देख रहे हैं !एक भीनी, मधुर पर सशक्त झंकार उठे....अपने मनकी बीनासे...पता चले इन दरिन्दोंको की हमारी एकता अखंड है...हमारे दिलके तार जुड़े हुए हैं....!

एक चीत्कार मेरे मनसे उठ रही है....हम क्यों खामोश हैं ? क्यों हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं ? कहाँ गयी हमारी वेदनाके प्रती संवेदनशीलता??? " आईये हाथ उठाएँ हमभी, हम जिन्हें रस्मों दुआ याद नही, रस्मे मुहोब्बतके सिवा, कोई बुत कोई ख़ुदा याद नही...!अपनी तड़प को मै कैसे दूर दूरतक फैलाऊँ ? ?क्या हम अपाहिज बन गए हैं ? कोई जोश नही बचा हमारे अन्दर ? कुछ रोज़ समाचार देखके और फिर हर आतंकवादी हमलेको हम इतिहासमे दाल देते हैं....भूल जाते हैं...वो भयावह दिन एक तारीख बनके रह जाते हैं ?अगले हमले तक हम चुपचाप समाचार पत्र पढ़ते रहते हैं या टीवी पे देखते रहते हैं...आपसमे सिर्फ़ इतना कह देते हैं, "बोहोत बुरा हुआ...हो रहा...पता नही अपना देश कहाँ जा रहा है? किस और बढ़ रहा है या डूब रहा है?" अरे हमही तो इसके खेवनहार हैं !



अपनी माता अपने शहीदोंके, अपने लड़लोंके खूनसे भीग रही है.....और हम केवल देख रहे हैं या सब कुछ अनदेखा कर रहे हैं, ये कहके कि क्या किया जा सकता है...? हमारी माँ को हम छोड़ कौन संभालेगा? कहाँ है हमारा तथाकथित भाईचारा ? देशका एक हिस्सा लहुलुहान हो रहा है और हम अपने अपने घरोंमे सुरक्षित बैठे हैं ?

कल देर रात, कुछ ११/३० के करीब एक दोस्तका फ़ोन आया...उसने कहा: तुम्हारी तरफ़ तो सब ठीक ठाक हिना ? कोई दंगा फसाद तो नही?
मै :" ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप ? कहीं कुछ फसाद हुआ है क्या?"
वो :" कमल है ! तुमने समाचार नही देखे?"
मै :" नही तो....!
वो : " मुम्बईमे ज़बरदस्त बम धमाके हुए जा रहे हैं...अबके निशानेपे दक्षिण मुंबई है....."
मैंने फ़ोन काट दिया और टीवी चला दिया...समाचार जारी थे...धमाकोंकी संख्या बढ़ती जा रही थी ...घयालोंकी संख्यामे इज़ाफा होता जा रहा था, मरनेवालों की तादात बढ़ती जा रही थी....तैनात पोलिस करमी और उनका साक्षात्कार लेनेके लिए बेताब हो रहे अलग, अलग न्यूज़ चॅनल के नुमाइंदे...पूछा जा रहा था रघुवंशीसे( जिन्हें मै बरसों से जानती हूँ...एक बेहद नेक और कर्तव्यतत्पर पोलिस अफसर कहलाते हैं। वर्दीमे खड़े )...उनसे जवाबदेही माँगी जा रही थी," पोलिस को कोई ख़बर नही थी...?"

मुझे लगा काश कोई उन वर्दी धारी सिपहियोंको शुभकामनायें तो देता....उनके बच्चों, माँ ओं तथा अन्य परिवारवालोंका इस माध्यमसे धाडस बंधाता...! किसीकेभी मन या दिमागमे ये बात नही आयी॥? इसे संवेदन हीनता न कहें तो और के कहा जा सकता है ? उन्हें मरनेके लिए तनख्वाह दी जा रही है तो कोई हमपे एहसान कर रहें हैं क्या??कहीँ ये बात तो किसीके दिमागमे नही आयी? गर आयी हो तो उससे ज़्यादा स्वार्थी, निर्दयी और कोई हो नही सकता ये तो तय है।

गर अंदेसा होता कि कहाँ और कैसे हमला होगा तो क्या महकमा खामोश रहता ?सन १९८१/८२ सीमे श्री. धरमवीर नामक, एक ICS अफसरने, नेशनल पोलिस कमिशन के तेहेत कई सुझाव पेश किए थे....पुलिस खातेकी बेह्तरीके लिए, कार्यक्षमता बढानेके लिए कुछ कानून लागू करनेके बारेमे, हालिया क़ानून मे बदलाव लाना ज़रूरी बताया था। बड़े उपयुक्त सुझाव थे वो। पर हमारी किसी सरकार ने उस कमिशन के सुझावोंपे गौर करनेकी कोई तकलीफ नही उठाई !सुरक्षा कर्मियोंके हाथ बांधे रखे, आतंकवादियोंके पास पुलिसवालोंके बनिस्बत कई गुना ज़्यादा उम्दा शत्र होते, वो गाडीमे बैठ फुर्र हो जाते, जबकि कांस्टेबल तो छोडो , पुलिस निरीक्षक के पासभी स्कूटर नही होती ! २/३ साल पहलेतक जब मोबाईल फ़ोन आम हो चुके थे, पुलिस असफरोंको तक नही मुहैय्या थे, सामान्य कांस्टेबल की तो बात छोडो ! जब मुहैय्या कराये तब शुरुमे केवल मुम्बईके पुलिस कमिशनर के पास और डीजीपी के पास, सरकारकी तरफ़ से मोबाइल फोन दिए गए। एक कांस्टबल की कुछ समय पूर्व तक तनख्वाह थी १५००/-.भारतीय सेनाके जवानोंको रोजाना मुफ्त राशन मिलता है...घर चाहे जहाँ तबादला हो मुहैय्या करायाही जाता है। बिजलीका बिल कुछ साल पहलेतक सिर्फ़ रु. ३५/- । अमर्यादित इस्तेमाल। बेहतरीन अस्पताल सुविधा, बच्चों के लिए सेंट्रल स्कूल, आर्मी कैंटीन मे सारी चीज़ें आधेसे ज़्यादा कम दाम मे। यकीनन ज्यादातर लोग इस बातसे अनभिद्न्य होंगे कि देशको स्वाधीनता प्राप्त होनेके पश्च्यात आजतलक आर्मीके बनिस्बत ,पुलिस वालोंकी अपने कर्तव्य पे तैनात रहते हुए, शहीद होनेकी संख्या १० गुनासे ज़्यादा है !आजके दिन महानगरपलिकाके झाडू लगानेवालेको रु.१२,०००/- माह तनख्वाह है और जिसके जिम्मे हम अपनी अंतर्गत सुरक्षा सौंपते हैं, उसे आजके ज़मानेमे तनख्वाह बढ़के मिलने लगी केवल रु.४,०००/- प्रति माह ! क्यों इतना अन्तर है ? क्या सरहद्पे जान खोनेवालाही सिर्फ़ शहीद कहलायेगा ? आए दिन नक्षल्वादी हमलों मे सैंकडो पुलिस कर्मचारी मारे जाते हैं, उनकी मौत शहादत मे शुमार नही?उनके अस्प्ताल्की सुविधा नही। नही बछोंके स्कूल के बारेमे किसीने सोचा। कई बार २४, २४ घंटे अपनी ड्यूटी पे तैनात रहनेवाले व्यक्तीको क्या अपने बच्चों की , अपने बीमार, बूढे माँ बापकी चिंता नही होती होगी?उनके बच्चे नही पढ़ लिख सकते अच्छी स्कूलों मे ?

मै समाचार देखते जा रही थी। कई पहचाने और अज़ीज़ चेहरे वर्दीमे तैनात, दौड़ भाग करते हुए नज़र आ रहे थे...नज़र आ रहे थे हेमंत करकरे, अशोक आमटे, दाते...सब...इन सभीके साथ हमारे बड़े करीबी सम्बन्ध रह चुके हैं। महाराष्ट्र पुलिस मेह्कमेमे नेक तथा कर्तव्य परायण अफ्सरोंमे इनकी गिनती होती है। उस व्यास्त्तामेभी वे लोग किसी न किसी तरह अखबार या समाचार चनालोंके नुमैन्दोंको जवाब दे रहे थे। अपनी जानकी बाजी लगा दी गयी थी। दुश्मन कायरतासे छुपके हमला कर रहा था, जबकि सब वर्दीधारी एकदम खुलेमे खड़े थे, किसी इमारतकी आड्मे नही...दनादन होते बम विस्फोट....दागी जा रही गोलियां...मै मनही मन उन लोगोंकी सलामतीके लिए दुआ करती रही....किसीभी वार्ताहरने इन लोगोंके लिए कोई शुभकामना नही की...उनकी सलामतीके लिए दुआ करें, ऐसा दर्शकों को आवाहन नही दिया!

सोचो तो ज़रा...इन सबके माँ बाप बेहेन भाई और पत्निया ये खौफनाक मंज़र देख रही होंगी...! किसीको क्या पता कि अगली गोली किसका नाम लिखवाके आयेगी?? किस दिशासे आयेगी...सरहद्पे लड़नेवालोंको दुश्मंका पता होता है कि वो बाहरवाला है, दूसरे देशका है...लेकिन अंतर्गत सुरक्षा कर्मियोंको कहाँसे हमला बोला जाएगा खबरही नही होती..!

मुझे याद आ रहा था वो हेमंत करकरे जब उसने नयी नयी नौकरी जों की थी। हम औरंगाबादमे थे। याद है उसकी पत्नी...थोड़ी बौखलाई हुई....याद नासिक मे प्रशिक्षण लेनेवाला अशोक और दातेभी...वैसे तो बोहोत चेहरे आँखोंकी आगेसे गुज़रते जा रहे थे। वो ज़माने याद आ रहे थे...बड़े मनसे मै हेमंतकी दुल्हनको पाक कला सिखाती थी( वैसे बोहोतसे अफसरों की पत्नियोंको मैंने सिखाया है.. और बोहोत सारी चीजोंसे अवगत कराया है। खैर)औपचारिक कार्यक्रमोंका आयोजन करना, बगीचों की रचना, मेज़ लगना, आदी, आदी....पुलिस अकादमी मे प्रशिक्षण पानेवाले लड़कोंको साथ लेके पूरी, पूरी अकादेमी की ( ४०० एकरमे स्थित) landscaping मैंने की थी....!ये सारे मुझसे बेहद इज्ज़त और प्यारसे पेश आते...गर कहूँ कि तक़रीबन मुझे पूजनीय बना रखा था तो ग़लत नही होगा...बेहद adore करते ।

इन लोगोंको मै हमेशा अपने घर भोजनपे बुला लिया करती। एक परिवारकी तरह हम रहते। तबादलों के वक्त जब भी बिछड़ते तो नम आँखों से, फिर कहीँ साथ होनेकी तमन्ना रखते हुए।

रातके कुछ डेढ़ बजेतक मै समाचार देखती रही...फिर मुझसे सब असहनीय हो गया। मैंने बंद कर दिया टीवी । पर सुबह ५ बजेतक नींद नही ई....कैसे, कैसे ख्याल आते गए...मन कहता रहा, तुझे कुछ तो करना चाहिए...कुछ तो...

सुबह १० बजेके करीब मुम्बईसे एक फ़ोन आया, किसी दोस्तका। उसने कहा: "जानती हो न क्या हुआ?"
मै :"हाँ...कल देर रात तक समाचार देख रही थी...बेहद पीड़ा हो रही है..मुट्ठीभर लोग पूरे देशमे आतंक फैलाते हैं और..."
वो:" नही मै इस जानकारीके बारेमे नही कह रहा....."
मै :" तो?"
वो :" दाते बुरी तरहसे घायल है और...और...हेमंत और अशोक मारे गए...औरभी न जाने कितने..."
दिलसे एक गहरी आह निकली...चाँद घंटों पहले मैंने और इन लोगोंके घरवालोने चिंतित चेहरोंसे इन्हें देखा होगा....देखते जा रहे होंगे...और उनकी आँखोंके सामने उनके अज़ीज़ मारे गए.....बच्चों ने अपनी अंखोसे पिताको दम तोड़ते देखा...पत्नी ने पतीको मरते देखा...माँओं ने , पिताने,अपनी औलादको शहीद होते देखा...बहनों ने भाईको...किसी भाई ने अपने भाईको...दोस्तों ने अपने दोस्तको जान गँवाते देखा....! ये मंज़र कभी वो आँखें भुला पाएँगी??

मै हैरान हूँ...परेशान हूँ, दिमाग़ काम नही कर रहा...असहाय-सि बैठी हूँ.....इक सदा निकल रही दिलसे.....कोई है कहीँ पे जो मेरा साथ देगा ये पैगाम घर घर पोहचाने के लिए??हमारे घरको जब हमही हर बलासे महफूज़ रखना पड़ता है तो, हमारे देशको भी हमेही महफूज़ बनाना होगा....सारे मासूम जो मरे गए, जो अपने प्रियजनोको बिलखता छोड़ गए, उनके लिए और उनके प्रियाजनोको दुआ देना चाहती हूँ...श्रद्धा सुमन अर्जित करना चाहती हूँ...साथ कुछ कर गुज़रनेका वादाभी करना चाहती हूँ....!या मेरे ईश्वर, मेरे अल्लाह! मुझे इस कामके लिए शक्ती देना।
लेखिका का ब्लॉग: "शमा"

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजें

उल्टा तीर पर जारी बहस में एक पाठक लिखते हैं "सभी लोग हिन्दुओ से संयम की अपेक्षा करते है। इसका कारण हिन्दुओ की कमजोरी है या उनकी महानता ?"। वास्तव में यह किसी के लिए भी एक बड़ी चिंता की बात हो सकती हैं कि इस समय आंतकवाद हमारे सामने नए नए रूप में आगे आ रहा है । बहुसंखय्क या अल्पसंख्यक हिंदू या मुस्लिम आंतकवाद सिर्फ़ आंतकवाद ही है ? इसे मज़हबी चश्मे से देखना किसी भी दृष्टि में उचित नही हो सकता । दरअसल आंतकवादी वो अतिवादी लोग है जो समाज राष्ट्र और विश्व के विन्यास को चोट पहुचना चाहते है । ज़रा इन प्रश्नो पर गौर करे :
) क्या बम ये जानता है कि वो जहाँ फटेगा वहां लोग हिंदू हैं या मुसलमान) क्या किसी बहुसंख्यक समाज के आंतकवादी द्वारा बम रखने से सिर्फ़ अल्पसंख्यक ही मारे जायेंगे ?

ऐसा कतई नही हो सकता। क्या ये ज़रूरी नही कि अब आंतकवादियों को केवल आंतकवादी ही माना जाए ?
आतंकवाद से लडाई के लिए ज़रूरी है कि समाज अब अपने नज़रिए में भी बदलाव लाये । सरकार को चाहिए कि वो अधिक अधिक से यूथ वेलफेयर के कार्यक्रम आगे लाये युवाओं को उसमें शामिल करे । युवाओं की ऊर्जा का सृजनात्मक उपयोग करे ताकि युवा समाज की बेहतरी केलिए काम करे । न कि उसके विध्वंस के लिए । आपकी सहभागिता की वजह से ये बहस नए निष्कर्षों पर पहुँच रही है । इस हेतु आप सभी साधुवाद के पात्र है । आंतकवाद केवल बहस का मुद्दा न रहे बल्कि कुछ समाधान हम भी मिलकर सोचे । आतंकवाद से कैसे लड़ा जाए?

संदर्भ: "धार्मिक कट्टरता और आंतकवाद"

इस विषय पर अपने अमूल्य विचार अवश्य देक्योंकि अब बहस नही हल चाहिए एक बेहतर कल चाहिए मेरे दोस्त !!

शनिवार, 1 नवंबर 2008

धार्मिक कट्टरता और आंतकवाद

इसमें कोई संदेह नही कि इस समय हमारे देश में आंतकवाद सबसे बड़ी चुनौती बनके उभर रहा है। आंतकवाद के विषय में हमारी पूर्व धारणाएं अब ग़लत साबित होती जा रही है। आंतक का रोज़ नया चेहरा हमारे सामने रहा है। हाल ही में मध्य प्रदेश की साध्वी की मालेगांव ब्लास्ट के मामले में गिरफ्तारी हुई है। सेना के पूर्व अधिकारीयों का नाम भी उभरकर सामने आया है। धर्म की आड़ में आतंकवाद की नई पौध तैयार हो रही है तो क्या अब ये ज़रूरी नही कि देश में चल रहे सभी कट्टर उन्मादी धार्मिक संगठनों पर रोक लगे?


"उल्टा तीर" पर इस पूरे महीने हमारी बहस का विषय है "आंतकवाद को रोकने के लिए सभी कट्टरधार्मिक संगठनों पर रोक लगाना उचित है?" कृपया बहस में भाग लीजिये, अपनी आवाज मुखर कीजिये, दिल खोलकर लिखिए, अपनी बात बेबाक कहिये। बहस में भाग लीजिये। साथ ही "उल्टा तीर निष्कर्ष" पर "क्या आज़ादी अपने आप में एक बड़ी बहस है?" बहस पर बहस का निष्कर्ष भी आज ही पढ़ें अपनी राय दें
उल्टा तीर

बुधवार, 24 सितंबर 2008

उल्टा तीर पत्रिका का द्वितीय अंक


'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर" प्रकाशित हो चुका है । उल्टा तीर अपने सभी सुधि पाठकों और "दिनकर" में रचनात्मक व प्रेरणात्मक योगदान देने वाले रचनाकारों, टिप्पणीकारों का दिल से आभार व्यक्त करता है। "जश्न-ए-आज़ादी" पत्रिका के बाद अब "दिनकर" पत्रिका पढिये पूरे महीने भर। और भाग लीजिये उल्टा तीर पर जारी बहस में। उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "दिनकर" पर क्लिक कीजिए।


आपके अपने बहस वाले मंच पर इस माह का विषय था; क्या अंग्रेजी से ही हमारा समाज उन्नत हो सकता है?। विश्व हिन्दी दिवस के मौके पर दस्तूर भी था और हमारा विचारणीय चिंतन भी कि हम जानें व बहस करें कि क्या बदलते हुए परिवेश में क्या इतना कुछ बदल गया है कि हमें या हिन्दुस्तान को विकसित श्रेणी में दर्ज होने के लिए बिलायती भाषा 'अंग्रेजी' का इतना सहारा लेना होगा; कि हिन्दुस्तान की मातृभाषा का वजूद खतरे में आजायेगा...और जो सवाल हिन्दुस्तान के लिए मुंह उठाये खडा हो गया है ; कि, क्या अंग्रेजी से ही हमारा समाज उन्नत हो सकता है? बहस के पहलू में सवालों की तमाम गुत्थियां हैं, जिन्हें सुलझना जरूरी है...तो आप तैयार हैं अपने दायित्व के लिए? सितम्बर माह की १ तारीख से शुरू हुई ये बहस अभी भी जारी है...आपके पास 'उल्टा तीर मंच' है अपनी बात को स्वतंत्र रूप से कहने का. तर्क-वितर्क करने का...क्योंकि बहस अभी जारी है मेरे दोस्त...बहस में खुल कर भाग लीजिये । अपनी आवाज़ मुखर कीजिए...
साथ ही कल उल्टा तीर निष्कर्ष पर पिछले माह चली बहस "क्या आज़ादी अपने आप में एक बड़े बहस है" पर निष्कर्ष जरूर पढ़ें अपनी बेबाक राय दें.
उल्टा तीर पत्रिका का यह दूसरा अंक आपको कैसा लगा हमें अपने सुझावों अवश्य भेजिए. ताकि भविष्य में हमआपको और भी अधिक रोचक और पठनीय सामग्री इस पत्रिका के माध्यम से देते रहें।

आभार;
  • अमित के. सागर

सोमवार, 1 सितंबर 2008

सवाल हिन्दी भाषियों की अग्रेजी सोच का!


इसमें कोई संदेह नही कि सम्प्रति हिन्दी का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है. हिन्दी बाज़ार की भाषा भी बन रही है. हिन्दी ग्लोबल भी हो रही है. बावजूद इसके क्या हमारे अपने देश में हिन्दी को बतौर राष्ट्र भाषा समुचित सम्मान मिल पा रहा है? आज भी ख़ुद हिन्दी भाषियों को कहीं न कहीं लगता है कि अगर अंग्रेजी को वो नही अपनाएंगे तो समय की तेज़ रफ्तार- चाल में वे पिछड़ जायेंगे. ऐसा क्यों है कि आज भी हमारा समाज अग्रेजी को ही उन्नति की भाषा मानता है. क्या हिन्दी की दुर्दशा का दोषी ख़ुद हिन्दी भाषी ही है. उल्टा तीर में इस पूरे महीने बहस में भाग लीजिये. इस बार बहस का विषय है- "क्या केवल अंग्रेजी से ही हमारा समाज उन्नत हो सकता है?"


पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि कृपया बहस के मूल विषय के परिप्रेक्ष्य में ही अपनी बात कहे. साथ ही बहस को अपनी दलीलों से सार्थक आयाम दे, क्योंकि बहस शुरू हो चुकी है मेरे दोस्त

आज़ादीपर बहस का निष्कर्ष पढने के लिए "उल्टा तीर निष्कर्ष" पढ़ना भूले


साथ ही अपने लेख आलेख, कवितायें, कहानियाँ, दिनकर जी से जुड़ी स्मृतियाँ आदि हमें कृपया मेल द्वारा 17 सितम्बर -०८ तक भेजें उल्टा तीर पत्रिका के विशेषांक "दिनकर" में आप सभी सादर आमंत्रित हैं


गुरुवार, 21 अगस्त 2008

आमंत्रण (दिनकर: हिन्दी दिवस पर नई पत्रिका)

"दिनकर"
(विश्व हिन्दी दिवस पर "उल्टा तीर" की नई पत्रिका)

सभी सुधि पाठकों रचनाकारों ब्लोग्गेर्स को सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि सामाजिक विचारों के मंच उल्टा तीर द्वारा विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर "दिनकर " पत्रिका का प्रकाशन किया जा रहा है । इस वर्ष राष्ट्र कवि "रामधारी सिंह दिनकर " का जन्म शताब्दी वर्ष भी है । दिनकर पत्रिका में आप सभी के रचनात्मक सहयोग के हम हार्दिक अभिलाषी हैं । विश्व हिन्दी दिवस और दिनकर जी का जन्म शती वर्ष हम सभी साहित्य धर्मियों के लिए एक अवसर है , जहाँ हम सभी मिलके हिन्दी की दिशा दशा पर सामूहिक चिंतन करे ।

अपने लेख आलेख, कवितायें, कहानियाँ, दिनकर जी से जुड़ी स्मृतियाँ आदि हमें कृपया मेल द्वारा 17 सितम्बर -०८ तक भेजें उल्टा तीर पत्रिका के विशेषांक "दिनकर" में आप सभी सादर आमंत्रित हैं

साथ ही उल्टा तीर पर भाग लीजिये बहस में क्योंकि बहस अभी जारी है । "उल्टा तीर पत्रिका" (जश्ने-आज़ादी-) आपको कैसी लगी आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में ;
सादर
अमित के. सागर
(उल्टा तीर)

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

आ गई बहस, आ गई पत्रिका



उल्टा तीर की प्रथम पत्रिका "जश्न--आज़ादी" प्रकाशित हो चुकी है उल्टा तीर अपने सभी सुधि पाठकों और "जश्न--आज़ादी" में शिरकत करने वाले, सभी का दिल से आभार व्यक्त करता है "जश्न--आज़ादी" की किताब पढिये पूरे महीने भर और भाग लीजिये उल्टा तीर पर नई बहस उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "जश्ने-आज़ादी " पर क्लिक कीजिए


उल्टा तीर पर इस महीने बहस का विषय है सम्प्रति "क्या आज़ादी अपने आप में एक बड़ी बहस है? " कानून पर बहस का निष्कर्ष पढने के लिए "उल्टा तीर निष्कर्ष" पर पढ़ना भूले आज़ादी के महान अवसर पर आप सभी को उल्टा तीर की ओर से ढेर सारी शुभकामनायें विचारों और बहस के उत्तेजक मंच पर आप सभी का स्वागत है नई बहस में खुल कर भाग लीजिये अपनी आवाज़ मुखर कीजिए...क्योंकि बहस शुरू हो चुकी है मेरे दोस्त...

शनिवार, 26 जुलाई 2008

सवाल क़ानून की प्रासंगिकता का ?

सवाल क़ानून की प्रासंगिकता का ?
भारत में क़ानून को लेकर आम नागरिकों में जागरूकता की कमी रही है। ये निराशा तब और भी बढ़ जाती है जब हमारे देश में शिक्षित वर्ग भी कानून के विषय में एक तरह से निरक्षर ही नज़र आता है। सम्प्रति ये ज़रूरत है कि देश में कानून के प्रति अब समाज ऐसे मामलों से भरा पड़ा है जहाँ क़ानून में जागरूकता की कमी के चलते पढ़े लिखे लोग भी कानून के पेशेवरों के हाथों की कठपुतली बने है लोगो को सजग और जागरूक किया जाए। ऐसा कतई नही है कि क़ानून की पेचीदगियों का शिकार केवल अशिक्षित वर्ग ही बनता है

दरअसल, ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हमारे देश में कई ऐसे क़ानून है जो समय के साथ अपनी प्रासंगिकता को खो चुके है। बावजूद इसके ये आज भी बदस्तूर क़ायम है। समय में बदलाव के साथ क़ानून में भी बदलाव किए जाने चाहिए

उन क़ानूनों को सिरे से रद्द कर दिया जाए जो आज के परिप्रेक्ष्य में सार्थक नही है। लेकिन होता क्या है नए नए क़ानून बनते है, क़ानून की धाराएं बढ़ जाती है, किताबे मोटी हो जाती है। और घूम फिर के क़ानून फिर लोगो के बीच में एक अभूझ पहेली बन जाता है

क़ानून जिनके लिए है , जो क़ानून से प्रभावित होते है। उनमे मैं आप हम सभी आते है। तब क्या

ये ज़रूरी नही हो जाता कि क़ानून की भाषा इसके क़ायदे हमें उस रूप में उपलब्ध हो जिसे हम सब सरलता से समझ सके।
उल्टा तीर पर कानून की प्रासंगिकता को लेकर शुरू की गई बहस इसलिए भी प्रासंगिक लगती है। सवाल ये भी है क़ानून की प्रासंगिगता को चुनौती देगा कौन! निसंदेह ये भी हम सभी को समाज को मिलकर तय करना होगा। सवाल हमें ही उठाने होंगे, इसलिए भी क्योंकि बहस अभी बाकी है मेरे दोस्त !!!

अपनी राय प्रतिक्रियाएँ भेजते रहिये क्योंकि बहस अभी जारी है मेरे दोस्त!!!
बहस में भाग लेने वाले सभी प्रिय पाठकों, सहभागियों को मेरा शुक्रिया व् आभार;
खुल कर भाग लीजिये। निसंकोच अपनी बात कीजिये.
आपकी राय अमूल्य है! आपकी चीख़ तर्क है! न्याय शून्य है! हम सबको बेहतर समाज बेहतर जिंदगी पुन्य तुल्य है!
शेष हैं आख़री दिन, "उल्टा तीर" के मंच पर दिल खोलकर शिरकत कीजिये (जश्ने-आजादी-०८) में अपने अमूल्य विचारों के साथ; जश्ने-आजादी के पत्रिका में;
साथ में अपनी तस्वीर व् संक्षिप्त परिचय जरुर भेजें।

Related Posts with Thumbnails
"एक चिट्ठी देश के नाम" (हास्य-वयंग्य) ***बहस के पूरक प्रश्न: समाधान मिलके खोजे **विश्व हिन्दी दिवस पर बहस व दिनकर पत्रिका १५ अगस्त 8th march अखबार आओ आतंकवाद से लड़ें आओ समाधान खोजें आतंकवाद आतंकवाद को मिटायें.. आपका मत आम चुनाव. मुद्दे इक़ चिट्ठी देश के नाम इन्साफ इस बार बहस नही उल्टा तीर उल्टा तीर की वापसी एक चिट्ठी देश के नाम एक विचार.... कविता कानून घरेलू हिंसा घरेलू हिंसा के कारण चुनाव चुनावी रणनीती ज़ख्म ताजा रखो मौत के मंजरों के जनसत्ता जागरूरकता जिन्दगी या मौत? तकनीकी तबाही दशहरा धर्म संगठनों का ज़हर नेता पत्नी पीड़ित पत्रिकारिता पुरुष प्रासंगिकता प्रियंका की चिट्ठी फ्रेंडस विद बेनेफिट्स बहस बुजुर्गों की दिशा व दशा ब्लोगर्स मसले और कानून मानसिकता मुंबई का दर्दनाक आतंकी हमला युवा राम रावण रिश्ता व्यापार शादी शादी से पहले श्रंद्धांजलि श्री प्रभाष जोशी संस्कृति समलैंगिक साक्षरता सुमन लोकसंघर्ष सोनी हसोणी की चिट्ठी amit k sagar arrange marriage baby tube before marriage bharti Binny Binny Sharma boy chhindwada dance artist dating debate debate on marriage DGP dharm ya jaati Domestic Violence Debate-2- dongre ke 7 fere festival Friends With Benefits friendship FWB ghazal girls http://poetryofamitksagar.blogspot.com/ my poems indian marriage law life or death love marriage mahila aarakshan man marriage marriage in india my birth day new blog poetry of amit k sagar police reality reality of dance shows reasons of domestic violence returning of ULTATEER rocky's fashion studio ruchika girhotra case rules sex SHADI PAR BAHAS shadi par sawal shobha dey society spouce stories sunita sharma tenis thoughts tips truth behind the screen ulta teer ultateer village why should I marry? main shadi kyon karun women

[बहस जारी है...]

१. नारीवाद २. समलैंगिकता ३. क़ानून (LAW) ४. आज़ादी बड़ी बहस है? (FREEDOM) ५. हिन्दी भाषा (HINDI) ६. धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद . बहस नहीं विचार कीजिये "आतंकवाद मिटाएँ " . आम चुनाव और राजनीति (ELECTION & POLITICS) ९. एक चिट्ठी देश के नाम १०. फ्रेंड्स विद बेनेफिट्स (FRIENDS WITH BENEFITS) ११. घरेलू हिंसा (DOMESTIC VIOLENCE) १२. ...क्या जरूरी है शादी से पहले? १३. उल्टा तीर शाही शादी (शादी पर बहस- Debate on Marriage)